शोला का डन्का : Shola Ka Danka by Deva Thakur
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Description
आंधियों, तूफानों अपनी औकात में रहो!
वो शोला क्या बुझेगा जिसकी हिफाजत हवा करे!!
- अफ्रीका का एक आदमखोर कबीला!
- कबीले में देवी सुरखाब की पूजा! सुरखाब अपने पुजारियों से नरबलि मांगती है।
- बारह साल बाद यहां दुनिया के तमाम काले जादूगरों का मेला लगता है, जो सुरखाब की पूजा करता है।
- इस बार मेले की रौनक बढ़ाने के लिए कुछ सुपरस्टार तशरीफ ला रहे हैं—चंद सुपरस्टार्स के नाम इस प्रकार हैं—
- वृन्दास्वामी—अपने पूरे लश्कर के साथ !
- गोली—अपने फेवरेट बॉडीगार्ड होहारा के साथ !!
- निनजा—अदृश्य शस्त्रों के जखीरे के साथ !!!!
- शोला—अण्डीलो का लेकर आया है !!!!
यूं समझ लीजिये मेले में कयामत आने वाली है, और इस कयामत का नाम है— शोला का डंका
देवा ठाकुर की जादूगरी की एक बेमिसाल पेशकश
शोला का डन्का : Shola Ka Danka
Deva Thakur
प्रस्तुत उपन्यास के सभी पात्र एवं घटनायें काल्पनिक हैं। किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से इनका कतई कोई सम्बन्ध नहीं है। समानता संयोग से हो सकती है। उपन्यास का उद्देश्य मात्र मनोरंजन है। प्रस्तुत उपन्यास में दिए गए हिंसक दृश्यों, धूम्रपान, मधपान अथवा किसी अन्य मादक पदार्थों के सेवन का प्रकाशक या लेखक कत्तई समर्थन नहीं करते। इस प्रकार के दृश्य पाठकों को इन कृत्यों को प्रेरित करने के लिए नहीं बल्कि कथानक को वास्तविक रूप में दर्शाने के लिए दिए गए हैं। पाठकों से अनुरोध है की इन कृत्यों वे दुर्व्यसनों को दूर ही रखें। यह उपन्यास मात्र 18 + की आयु के लिए ही प्रकाशित किया गया है। उपन्यासब आगे पड़ने से पाठक अपनी सहमति दर्ज कर रहा है की वह 18 + है।
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शोला का डन्का
देवा ठाकुर
शोला को मौत से भी खौफ महसूस नहीं होता था। अगर कोई चीज उसे खौफजदा कर सकती थी तो वह होहारा था और होहारा इस वक्त उसके कमरे के दरवाजे पर खड़ा था। होहारा की वहां मौजूदगी का साफ अर्थ था वृन्दास्वामी ने उसे तलाश कर लिया है। होहारा ने सफेद चोला पहना हुआ था। कन्धे पर जंजीर बंधी थी, जिसका एक सिरा कमर से नीचे घुटने तक लटक रहा था और उसके छोर पर होहारा का सबसे प्रिय हथियार एक घण्टा लटक रहा था। वह उस वक्त भी उस घण्टे की जंजीर को पकड़े हुए था, जिसका सीधा-सा मतलब था कि अगर शोला ने कोई ऐसी-वैसी हरकत की तो होहारा उस पर हमला कर सकता था।
शोला इस घर में महज अपने आप को वृन्दास्वामी की नजरों से छिपाए रखने के लिए पनाह लिए था। वृन्दास्वामी का खात्मा उसकी जिन्दगी का मकसद था और उसकी अब तक की हर कोशिश नाकाम हुई थी। वह वृन्दास्वामी को तो खत्म नहीं कर पाया अलबत्ता अपना बहुत कुछ गंवा चुका था। वृन्दास्वामी ने उससे उसकी आतिशी ताकत छीन ली थी, सिब्लीसी ताकत छीन ली थी। उसके मन्त्रों की शक्ति को खत्म कर डाला था और अब वृन्दास्वामी चाहता था कि शोला अपने आप को उसके चरणों में डाल दे। वह शोला को अपने किसी बहुत बड़े मकसद के लिए जिन्दा रखना चाहता था। असल में वृन्दास्वामी ने जब शोला की शक्तियों को समाप्त किया था तो वह भी अपना बहुत कुछ गंवा चुका था—वृन्दास्वामी को शोला ने एक अपाहिज के रूप में देखा था। वह खुद एक कर्बनाक जिन्दगी जी रहा था लेकिन काले जादू के इल्म ने उसे शोला से बचाकर रखा हुआ था। शोला के मददगार अण्डीवो को भी वृन्दा ने कैद कर लिया था। अण्डीवो का बिल्ले वाला जिस्म उसकी कैद में था लेकिन बकौल अण्डीवो के वह अपने बिल्ले वाले शरीर को छोड़ चुका था और बिना जिस्म के ही भटक रहा था।
होहारा भी एक जिन्न था। सर्पयोनि का जिन्न, गोली का अंगरक्षक। लेकिन अब शायद गोली इस दुनिया में नहीं रही थी—इसलिए वृन्दास्वामी ने होहारा की खिदमत हासिल कर ली थी—या यह भी हो सकता है कि गोली को वृन्दा ने कहीं सुरक्षित छिपा दिया हो। शोला, गोली, होहारा, वृन्दास्वामी के बारे में पूर्ण विवरण जानने के लिए पढ़ें—देवा ठाकुर के उपन्यास—।. शोला 2. गोली 3. ज्वालामुखी 4. पावर हाउस।
शोला ने पलक झपकते ही फैसला कर लिया कि उसे अब क्या करना है। होहारा ने अपने कमर से लटका घण्टा बजाया—यानी खतरे का घण्टा बजाया फिर अपना रटारटाया जुमला—“मैं आ गया हूं होहारा।” दोहराया और इससे पहले कि होहारा शोला को दबोचता, शोला ने उछलकर डबल किक का स्टेट प्रहार कर दिया। दोनों लातें होहारा के सीने पर पड़ी, होहारा एक कदम लड़खड़ाया। प्रहार किसी और के सीने पर पड़ा होता तो उसकी पसलियों के अनगिनत टुकड़े हो गए होते, शोला मार्शल आर्ट का जबरदस्त हिटर था आमतौर पर सामान्य लोगों पर अपनी महारत का प्रदर्शन नहीं करता था लेकिन यहां मामला शैतान के डैडी का था। आठ फुट लम्बा कालिया-मसान सफेद दांतों वाला होहारा शोला कि इस बदतमीजी से बुरा मान गया और उसने अपना घण्टा घुमा दिया। ठनाक की आवाज के साथ घण्टा कमरे की एक दीवार से टकराया। शोला ने तो वार बचा लिया था लेकिन दीवार इस वार को बचा नहीं सकती थी। नतीजा यह हुआ कि दीवार में ही सुराख हो गया और फिर शोला उछलता रहा और होहारा का घण्टा दीवार से टकराता रहा—शोला ने देखा कि दीवार में इतनी जगह बन गई है कि वह बाहर निकल सकता था तो उसने दीवार में बने उसी सुराख में सर घुसा दिया। होहारा ने एक और प्रहार उस दीवार पर किया और फिर पूरी ही दीवार भरभराकर नीचे बिखर गई—लेकिन तब तक शोला पार हो चुका था और इसी दीवार के मलबे को हटाता होहारा भी बाहर आ गया। उसने शोला को बाउंड्री वॉल की तरफ भागते देखा—होहारा भी उसके पीछे दौड़ पड़ा।
दौड़ते-दौड़ते ही शोला ने जम्प ली और बाउण्ड्री वॉल का ऊपरी हिस्सा पकड़कर सीने के बल ऊपर उठता चला गया। होहारा यह ऊंची कूद हरगिज़ नहीं कर सकता था। वह एक ही काम कर सकता था, जो कि उसने कर भी दिया। वह दीवार फोड़ सकता था और दीवार फोड़कर बाहर निकलने का रास्ता बना सकता था, होहारा के घण्टे के प्रहार बाउण्ड्री वॉल पर होने लगे। इस बीच शोला ने सड़क पर दौड़ लगा दी थी। सड़क पर दूर-दूर तक वीराना था—किसी आदमजात का दूर-दूर तक कहीं पता नहीं था। शोला के पास पीछे मुड़कर देखने का वक्त नहीं था। वह पूरी रफ्तार से दौड़ रहा था।
चारदीवारी तोड़कर होहारा भी बाहर आया और सड़क पर उसी दिशा में दौड़ने लगा जिधर शोला ने रेस लगाई थी। यों लगता था जैसे होहारा दौड़ नहीं रहा हो बल्कि जमीन उसके पैरों के नीचे से खिसक रही हो। वह तोप से निकली गोले की तरह शोला की तरफ लपक रहा था—साथ ही उसका घण्टा टन-टन की आवाज के साथ बज रहा था।
शोला ने गर्दन घुमाकर देखा—दूर से आते घण्टे की टनटन उसके कानों में टकरा रही थी और यह आवाज धीरे-धीरे और अधिक साफ व गुंजीली होती जा रही थी। यह मौत की आवाज थी, जो धीरे-धीरे उसके करीब आती जा रही थी।
शोला ने अपनी रफ्तार और तेज कर दी। होहारा की नजरों से छिप जाना भी असंभव बात थी, क्योंकि वह वायु में उड़ती गन्ध से उसे तलाश कर सकता था। वह किसी शिकारी कुत्ते की तरह आसानी से शोला की गन्ध पा सकता था।
आगे सड़क पर चढ़ाई शुरू हो गई थी—वहां से सड़क एक पहाड़ी की तरफ चली गई थी। पहाड़ी के ऊपर एक देवी मंदिर था जो काफी प्रसिद्ध था—यह सड़क उसी मन्दिर को छूती हुई आगे निकल जाती थी। शोला अगर किसी तरह उस मन्दिर तक पहुंच जाता तो होहारा से बच सकता था क्योंकि होहारा शैतानी जिन्न था और उसका ताल्लुक सांपों से था। यह जिन्न मन्दिरों की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकते।
होहारा और शोला के बीच फासला धीरे-धीरे कम होता जा रहा था। होहारा जंजीर में बंधा घण्टा घुमाता दौड़ रहा था और फिर एक वक्त वह भी आया जब दोनों के बीच चन्द कदमों का फासला रह गया था। किसी भी लम्हें शोला होहारा के हत्थे चढ़ सकता था। अचानक सामने से एक मोड़ से हैडलाइट्स चमकी—कोई कार थी जो तीव्र गति से सड़क पर दौड़ी आ रही थी और फिर कार शोला से टकराने ही जा रही थी कि शोला ने एक छलांग मारी और कार उसके पैरों के नीचे से गुजरती धड़ाक से होहारा से जा टकराई। एक जबरदस्त धमाका हुआ और कार होहारा को लपेटे हुए एक पहाड़ी चट्टान से जा टकराई। टन्न...टन्न...टन्न की आवाज शोला के कानों में पड़ी। उसने घूमकर देखा—कार की हेडलाइट्स अब भी जल रही थी—होहारा चट्टान और कार के बीच फंसा था और इस चक्कर में होहारा की जंजीर वाला घण्टा उसके हाथ से निकलकर दूर सड़क की ढलान पर लुढ़कता चला गया। शोला उसी क्षण पलट पड़ा। उसने एक छलांग लगाई और ढलान पर उसी दिशा में दौड़ने लगा जहां होहारा का हथियार गिरा था। शोला इस बात को जानता था कि एक बार यदि होहारा का यह हथियार उसके हाथ लग गया तो वह होहारा को दुम दबाकर भागने पर मजबूर कर देगा।
होहारा कार को पीछे धकेल रहा था और जब तक वह कार धकेलकर उसकी जद से बाहर आता तब तक उसका हथियार शोला के हाथ लग चुका था। शोला उसे घुमाता सड़क पर आ गया। होहारा ने उसे देखा और ठिठक कर रुक गया। अब शोला होहारा का जंजीर वाला घण्टा घुमाता उसी की तरफ कदम बढ़ाने लगा—और जितने कदम शोला आगे बढ़ाता, होहारा उतने ही कदम पीछे हटता जा रहा था।
“मैं आ गया हूं होहारा।” शोला ने नारा लगाया और होहारा की तरफ दौड़ पड़ा। होहारा अब भाग खड़ा हुआ और फिर देखते-देखते किसी ब्लैकहोल में समाकर गायब हो गया। शोला ने उसकी जंजीर कन्धे पर लटकाकर घण्टा कमर में बांध दिया।
अब उसे कार का ध्यान आया। अगर यह एक्सीडेण्ट न होता तो होहारा आज उसकी तिक्का-बोटी उड़ा देता। इस कार चालक की ही मेहरबानी से होहारा का हथियार शोला के हाथ आ लगा था। शोला कार के पास पहुंचा। कार का इंजन अभी तक घर्र-घर्र कर रहा था और उसका अगला हिस्सा अब भी चट्टान से अड़ा हुआ था। कार की ड्राइविंग सीट पर एक खूबसूरत लड़की मौजूद थी, जिसका सिर स्टीयरिंग से टिका हुआ था। वह बेहोश हो गई थी। कार में उसके अलावा कोई नहीं था।
शोला ने अन्दर हाथ डालकर सबसे पहले कार का इन्जन बन्द किया, फिर कार का दरवाजा खोला, लड़की उसकी बांहों में झूल गई—लड़की को बांहों का सहारा देकर कार का पिछला दरवाजा खोला और फिर उसे पिछली सीट पर लिटा दिया। बेहद कीमती मर्सडीज कार थी। शोला लड़की को लिटाने के बाद अगली सीट पर आ गया। उसने ड्राइविंग सीट सम्भाल ली और कार स्टार्ट कर दी। फिलहाल होहारा का तो कोई खतरा नहीं था, अलबत्ता लड़की को कोई गहरी चोट हो सकती थी। उसे तुरन्त मेडिकल हेल्प की जरूरत थी।
शोला वापस कोठी में भी नहीं जा सकता था, जहां से वह भागा था—क्योंकि इस जगह की निशानदेही हो चुकी थी, वृन्दास्वामी कोई दूसरी कोशिश भी कर सकता था।
इस शहर से जामनगर पच्चीस किलोमीटर दूर था। शोला ने बेहतर यही समझा कि सीधा जामनगर चला जाए। उसने गाड़ी सड़क पर दौड़ा दी। गाड़ी चट्टान से टकराने पर भी ठीक हालत में थी, और शायद वह ठीक हालत में इसलिए थी, क्योंकि उसके और चट्टान के बीच होहारा आ गया था। लड़की का सिर कदाचित स्टेयरिंग से टकराने की वजह से चोटग्रस्त हो गया था और वह बेहोश हो गई थी।
अभी शोला ने चन्द किलोमीटर का फासला ही तय किया था कि उसे पीछे से किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी। शायद लड़की को होश आ रहा था। शोला ने कार की रफ्तार धीमी कर दी। उसने कार के अन्दर की रोशनी नहीं जलाई, क्योंकि वह शहरी आबादी से गुजर रहा था और वह कोठी यहां से ज्यादा दूर नहीं थी, जहां से वह भाग आया था।
“अगर आपको होश आ गया है और चोट ज्यादा घातक नहीं है तो उठकर बैठ सकती हैं।”
एक कराह सुनाई दी फिर पीछे से किसी ने पूछा—“त...तुम कौन हो...और...?”
“घबराइए नहीं...मैं जो कोई भी हूं आपका दोस्त ही हूं।” शोला ने कहा—“आपकी कार का एक्सीडेण्ट हो गया था—कुछ याद आ रहा है आपको?”
“ओ माय गॉड...! कौन लोग थे...एक तो मेरी कार ही टाप गया, उसे देखकर मेरे तो हाथ-पैर ही फूल गए, फिर दूसरा दानव सरीखा मेरी कार से टकरा गया...उसके बाद...।”
“उसके बाद जो आपकी कार से टकराया था, वह तो भाग गया।”
“भाग गया...।”
“हां—आपसे डरकर भाग गया...।”
“क...क्यों...?”
“उन दो में से एक तो बन्दगोभी है और दूसरा फूलगोभी...। वह बन्दगोभी था—देखकर भाग गया और फूलगोभी को आप पर प्यार आ गया।”
“यह फूलगोभी और बन्दगोभी किस खेत से निकलकर सड़क पर आ गए थे?”
“दोनों अलग-अलग खेत के हैं—एक शैतान के मैदान में उगता है, दूसरा मोहब्बत के मैदान में खिलता है। बन्दगोभी शैतान के मैदान का है और फूलगोभी मोहब्बत के मैदान का फूल है।”
“फिर इन दोनों में याराना कैसे हो गया?”
“याराना नहीं जी...बन्दगोभी तो फूलगोभी का जानी दुश्मन है। अगर बीच में आपकी कार न आ जाती तो आज शैतान मोहब्बत को कुचल डालता। वैसे आपकी तारीफ...?”
“पहले अपनी तारीफ तो बतलाइए कुछ?”
“मैं वही फूलगोभी हूं, जो आपकी कार टापकर बच गया और बन्दगोभी जब आपसे डरकर भाग गया तो मुझे आप पर प्यार आ गया। सोचा आपको कहीं बड़ी चोट न आ गई हो...इसलिए आपको लेकर चल पड़ा। आपको ज्यादा चोट तो नहीं आई?”
“आती तो अभी तक बेहोश ही पड़ी रहती है—वैसे मुझे भी आप पर प्यार आ रहा है...।”
“ज...जी...।” शोला हड़बड़ा गया—“अ...आपको मुझ पर क्यों प्यार आ गया है?”
“क्योंकि मैं फूलगोभी को कच्चा ही चबाती हूं। गाड़ी रोको।”
शोला ने गाड़ी रोक दी। वह कार का पिछला दरवाजा खोलकर नीचे उतरी। फिर ड्राइविंग सीट का दरवाजा खोलकर बोली—“नीचे उतरो।”
शोला नीचे उतर गया।
लड़की ने उसे सिर से पांव तक देखा—यकीनन यह वही शख्स था, जो उसकी कार टाप गया था। लम्बे कद का यह आकर्षक नौजवान शानदार पर्सनैलिटी का मालिक था। कन्धे पर जंजीर और जंजीर से लटका घण्टा देखकर वह एकदम हंस पड़ी।
“क्या तुम किसी मन्दिर के पुजारी हो?” उसने पूछा।
“नहीं जी—मैं तो आपका पुजारी हूं।”
“मुझे जानते तक नहीं—और पूजा भी होने लगी।”
“इंसान जिन देवी-देवताओं की पूजा करता है, उन्हें देखा तो नहीं होता।” शोला ने मासूमियत से कहा।
“अभी तो तुम कह रहे थे कि तुम्हें मुझ पर प्यार आ गया था और मुझे लेकर चल पड़े।”
“पुजारी को अपनी देवी पर प्यार नहीं आएगा तो क्या गुस्सा आएगा, आपने उस राक्षस से मेरी जान बचाई—फिर क्या मैं आपको वैसे ही वहां छोड़ देता?”
“अब ठीक बताओ कि तुम कौन हो और क्या माजरा था?” मैं तो मारे डर के बेहोश हो गई थी।”
“वह मुझे मार डालना चाहता था।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसे यह पसन्द नहीं था कि मैं उस कोठी में नौकरी करूं और कोठी के मालिकों की हिफाजत करूं...अब मैं वापस उस जगह भी नहीं जा सकता, जहां नौकरी करता था।” शोला ने उसे एक फर्जी कहानी सुना डाली। इस कहानी के अनुसार यह एक लड़की के आशिक का मामला था—लड़की के बाप ने आशिक से बचाए रखने के लिए उसे लड़की का बॉडीगार्ड बना दिया था। अब हुआ यूं कि लड़की अपने बॉडीगार्ड से ही मोहब्बत करने लगी। यह बात लड़की के बाप को पता लगी तो बाप ने उस शैतान को उसके पीछे लगा दिया।
“क्या तुम भी उस लड़की से मोहब्बत करने लगे थे?”
“नहीं जी! मेरी क्या मजाल। यह तो वही लड़की मुझसे इश्क करने लगी थी। मैं उसे समझाते-समझाते थक गया कि मैं उसका नौकर हूं, बॉडीगार्ड हूं लेकिन वह मेरी कोई बात सुनने को तैयार ही नहीं थी—इश्क—मोहब्बत के जाने क्या-क्या किस्से सुनाती रहती। अच्छा हुआ उससे पिंड तो छूटा।”
“अब कहां जाने का इरादा है?”
“जाना कहां जी! जहां भगवान ले जाएगा।”
“तो फिर चलो, पिछली सीट पर बैठ जाओ—आज से तुम हमारे बॉडीगार्ड रहोगे।”
शोला कार की पिछली सीट पर बैठ गया। लड़की ने ड्राइविंग सीट सम्भाल ली।
“कमाल है—तुमने अभी तक मुझे पहचाना भी नहीं।” लड़की ने कार ड्राइव करते हुए कहा।
“क्या हम पहले भी कहीं मिल चुके हैं मैडम?” शोला ने पूछा।
“नहीं, मगर मुझे तो सारी दुनिया जानती है—क्या तुमने मेरी कोई फिल्म नहीं देखी?”
“मुझे फिल्में देखने का शौक नहीं। मैं नाटक पसन्द नहीं करता।”
“गुड...तुम वाकई मेरी पसन्द की चीज हो...मुझे तो अब भी यकीन नहीं आ रहा है कि तुमने मेरी कार को फलांग लिया था—ऐसे स्टंट सीन तो फिल्मों में फिल्माए जाते हैं, जिनका हकीकत से कोई ताल्लुक नहीं होता, खैर! मैं खुद ही अपना परिचय करा देती हूं—मेरा नाम मूर्ति है और मैं एक फिल्मी हीरोइन हूं। काफी रोज से मुझे एक बॉडीगार्ड की जरूरत महसूस होती थी। आदमी को उसकी शोहरत और दौलत भी उसकी जिन्दगी को खतरे में डाल देती है। घर में नौकर तो हैं मगर वह सिर्फ नौकर भर हैं। तुम यकीन जानो अगर कभी मुझ पर कोई हमला हुआ तो, उनमें से कोई मेरी हिफाजत नहीं कर पाएगा। लेकिन तुममें वह बात है।”
शोला ने सोचा चलो उसे सिर छुपाने के लिए एक दूसरा घर तो मिला। वातावरण एकदम तब्दील हो गया था। अब वह फिल्मी हीरोइन मूर्ति का बॉडीगार्ड बन गया था। यह दौड़-भाग सिर्फ इसलिए हो रही थी कि वह वृन्दास्वामी की निगाह से छिपा रहे।
“तुम्हें मैं फूलगोभी के नाम से ही पुकारूं या कुछ तब्दीली आ गई है?”
“जी—मेरा नाम शोला है।” शोला ने कहा।
“तो फूलगोभी क्यों बन बैठे थे?”
“मैंने सोचा थोड़ी देर का साथ है—आपकी मेडिकल हेल्प के बाद अपना रास्ता अलग हो जाएगा—जब रास्ता छोटा हो तो मुसाफिरों को अपनी असलियत बताने से कोई फायदा नहीं होता। मैं आपको एक फर्जी कहानी सुनाकर चला जाता—इसलिए कोई नाम नहीं सूझा तो यहीं रख लिया। वैसे भी फूल मुझे बहुत पसन्द है...खासकर गोभी का फूल इसलिए भी पसन्द है कि सिर्फ यही फूल ऐसा है जिसे पकाया-खाया भी जाता है।
“यानी कि जरूरत पड़ने पर तुम्हें पकाकर खाया जा सकता है।” मूर्ति ने हंसते हुए कहा।
“जरूरत पड़ने पर आप मुझे कच्चा भी खा सकती हैं।” शोला ने कहा।
दोनों में ऐसी ही बातें होती रही। मूर्ति ने बताया कि यहां करीब ही वह एक फिल्म की आउटडोर शूटिंग पर आई हुई थी, आज वह देवी के मन्दिर में गई थी और वहीं से वापस लौट रही थी, वापसी में देर हो गई, उसके बाद यह घटना घट गई।
यूनिट एक होटल में ठहरी हुई थी और वहां मूर्ति की तलाश के लिए कई गाड़ियां दौड़ाई जा चुकी थी। दिलचस्प बात यह थी कि मूर्ति वहां किसी को बताकर भी नहीं आई थी कि वह कहां जा रही है। इसी कारण वहां भागदौड़ मची हुई थी, शाम पांच बजे शूटिंग का पैकअप होते ही वह अपनी कार से निकल पड़ी थी और रात को एक बजे वापस लौटी थी। जाहिर था कि हीरोइन का इस तरह गायब हो जाना मामूली बात नहीं थी। यह यूनिट जामनगर में ठहरी हुई थी और शूटिंग एक पुराने किले में चल रही थी।
मूर्ति ने प्रोड्यूसर रोहन देसाई को बताया कि वह अन्नपूर्णा देवी के मन्दिर में गई थी।
“मगर आपको बताकर जाना चाहिए था—और फिर अकेले तो हरगिज़ नहीं जाना चाहिए। हम लोग कितने परेशान हो गए। आपका सेक्रेटरी तो अभी भी पुलिस स्टेशन में बैठा हुआ है।”
“उसे फोन कर दो और कह दो कि मैं आ गई हूं।”
“वह तो ठीक है मगर आप अकेली...और यह...।” उसने शोला की तरफ देखा।
“मैं मन्नत मांगने गई थी। सुना है इस मन्दिर में जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह पूरी होती है लेकिन शर्त यह है कि वहां अकेले ही जाना पड़ता है और किसी को बताए बिना जाना पड़ता है। इसलिए यह सब हो गया—और रहा इस नौजवान का सवाल, इसने रास्ते में मुझे एक एक्सीडेण्ट से बचा लिया और मुझे यहां छोड़ने आ गया। इसके लिए एक सैपरेट रूम का प्रबन्ध कर दो, जो मेरे रूम के करीब होना चाहिए।”
प्रोड्यूसर रोहन ने अपने असिस्टेंट को बुलाया और फिर उसे कुछ हिदायत देने लगा। मूर्ति के सेक्रेट्री को थाने में फोन कर दिया गया।
अगली सुबह शूटिंग देर से शुरू हुई। शोला भी मूर्ति के साथ लोकेशन पर पहुंच गया था। मूर्ति को लोकेशन पर छोड़कर शोला यह कहकर वहां से चला आया कि उसे एक जरूरी काम है। उसके पास मूर्ति की कार थी...शोला को यह जरूरी काम निपटाने में तीन घण्टे लग गए। दरअसल उसे होहारा का खतरनाक घण्टा ठिकाने लगाना था, वह हर वक्त तो उसे अपने कन्धे पर टांगकर नहीं रख सकता था और अपने से अलग करने का मतलब था कि होहारा उसे दोबारा हासिल कर सकता था। शोला उस हथियार को एक पुराने मन्दिर में दफन कर आया, जहां होहारा पहुंच ही नहीं सकता था। इस काम में उसे तीन घण्टे लग गए थे।
जब शाम हुई तो अचानक लोकेशन पर एक खुली जीप धूल उड़ाती पहुंची। इस जीप में एक लड़की सवार थी। जीप वही चला रही थी। उसके साथ दो गनमैन भी थे। लड़की ने दोनों गनमैनों को जीप में ही बैठे रहने का संकेत किया और खुद चलती हुई शूटिंग स्पॉट पर आ गई। अभी पैकअप नहीं हुआ था। मूर्ति अगले शॉट के लिए मेकअप दुरुस्त करवा रही थी।
“इधर का सेठ कौन है?” लड़की ने पूछा। उसने एक स्पॉटबॉय से पूछा था। स्पॉटबॉय ने प्रोड्यूसर रोहन की तरफ संकेत कर दिया।
लड़की ने टाइट जींस पहनी हुई थी और ऊपर चमड़े की जैकेट थी। उसके सिर पर एक कैप भी थी और आंखों पर सनग्लास की अमेरिकन ऐनक। वह रोहन के पास पहुंची। रोहन उस वक्त स्क्रिप्ट राइटर से कुछ बात कर रहा था।
“तुममें से सेठ कौन है, शूटिंग वास्ते सबको लेके आया है।”
रोहन इस फिल्म का डायरेक्टर भी खुद ही था।
“जी फरमाइए...।”
“नवाब सलामत अली खान बहादुर ने हमको भेजा है। मैं खान बहादुर की पर्सनल सेक्रेट्री मिस चांदनी हूं...नाम मेरा चांदनी जरूर है, मगर काम अन्धेरा फैलाना है।”
शोला भी वहां पास ही बैठा था। उसने इस हसीना पर उचटती निगाह डाली—वह थी तो जवान और खूबसूरत मगर अंदाज वैम्प जैसा था।
रोहन उठ खड़ा हुआ। वह नवाब का नाम सुनकर लड़की को इज्जत की निगाह से देखते हुए बोला—“तशरीफ़ रखिए।”
“नहीं—मैं तशरीफ़ रखने नहीं आई। तुम्हारा हीरोइन मूर्ति को इनवाइट करने आई हूं, वो क्या है कि कल नवाब साहब की सालगिरह बनाई जा रही है। कुछ खास मेहमान बुलाए हैं—उनमें कुछ फॉरनर्स भी हैं। अब नवाब साहब से एक गलती हो गई। वह डींगे मारने के बड़े शौकीन हैं, फिर परेशानी हम लोगों को खड़ी हो जाती है—क्योंकि हमें उसे निभाना होता है। मसलन अगर नवाब साहब कह दें कि, कल शिकार खेलते वक्त गलती से शेर की जगह मेरे हाथों दो डाकू मारे गए तो हमें दो डाकू खोजकर मारने पड़ते हैं। यह अलग बात है कि वह डाकू नहीं होते, डाकू उन्हें हम बनाते हैं, समझे सेठ...।”
“ज...जी...अभी तो कुछ समझ नहीं आ रही आपकी बात...।”
“मैं समझाती हूं, नवाब साहब ने डींग मारी है की मूर्ति उनकी दोस्त है और उसने नवाब साहब की सालगिरह पर डांस करने का वादा किया है—अब परेशानी हमारे लिए खड़ी हो गई है। हमें मूर्ति को वहां ले जाना है और कल ही महफिल में डांस करवाना है।”
शोला ने पहली बार गौर से उस लड़की को देखा। रोहन देसाई की तो हवा ही शंट हो गई थी यह सुनकर।
“मगर...यह कैसे मुमकिन है...?” रोहन फुसफुसे से अन्दाज में बोला।
“यही तो मुसीबत है कि हम गैर मुमकिन को मुमकिन बनाते हैं। अपनी हीरोइन से तुम बात करते हो या मैं करूं...?”
“मैं ही बात किए लेता हूं...।” रोहन ने बुझे-बुझे स्वर में कहा।
उस लड़की ने इत्मीनान से जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला और एक सिगरेट सुलगाकर उसके गहरे-गहरे कश खींचने लगी। फिर उसकी निगाह शोला पर पड़ी—जो उसे ही घूर रहा था।
“यह मेरी तरफ क्या देखता—तेरी हीरोइन से ज्यादती सुन्दर दिखती क्या मैं?”
शोला ने दूसरी तरफ निगाह घुमा दी।
रोहन मूर्ति के पास चला गया। फिर उसने धीरे-धीरे मूर्ति से कुछ कहना शुरू किया और अचानक मूर्ति ने मेकअप मैन का आईना छीनकर उसे जमीन पर दे मारा।
“मुझे लौण्डी समझा है क्या...अब मैं कोई शाट नहीं दूंगी।” वह उठ खड़ी हुई, मूर्ति ने अपने ब्वाय से सूटकेस पैक करने को कहा।
“अरे सुनिए तो...मैंने यह बात अपनी तरफ से तो नहीं कही...नवाब की सेक्रेट्री आई है। आप उसी से बात कर ले।”
“माय फुट...। शोला...!” मूर्ति ने शोला को आवाज दी।
शोला उठकर मूर्ति के पास पहुंच गया।
“चलो—अब शूटिंग नहीं होगी।”
रोहन वापस चांदनी के पास पहुंच कर गिड़गिड़ाने लगा—“आप नवाब साहब को समझा दें—मेरा लाखों का नुकसान हो जाएगा—प्लीज...यह मुमकिन नहीं—मेरी हीरोइन चली गई तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा—यहां दोबारा तो वह कभी आएगी ही नहीं।”
“ऐसा है क्या...बहुत अकड़ है उसमें—अरे उसको गोली मार—मेरे को हीरोइन ले लेना सेठ।”
“ओ गॉड...आप समझती क्यों नहीं?”
“मैं तो सब समझती हूं—इसी को समझाना होगा।” चांदनी उठकर मूर्ति के पास पहुंच गई—उस वक्त मूर्ति अपना सामान पैक करवा रही थी।
“अरे ए छोरी...।” चांदनी ने देहाती अन्दाज में कहा—“फिल्म में तो तू खूब ठुमके दिखाती है, हमारे नवाब के सामने दो ठुमके लगा देगी तो तेरा क्या चला जाएगा?”
“शट अप।” मूर्ति चीखी।
“मुझे लगे हैं तू कल तक तो यहां से भाग भी लेगी...।” अचानक चांदनी ने अपनी जैकेट के अन्दर हाथ डाला और एक माउजर निकालकर मूर्ति की कनपटी में रख दिया—“सवाल सिर्फ दो ठुमको का है—और कुछ गड़बड़ नहीं होगी—ये हमारी जिम्मेदारी है, जैसे हम तुझे ले जा रहे हैं वैसे ही बाइज्जत पहुंचा देंगे...।”
“मैं भी साथ चलूंगा।” शोला ने कहा।
“क्या...यानी कि तुम...तुम भी चाहते हो कि मैं...।”
“अरे भाई इसमें हर्ज ही क्या है—हमने नवाब साहब का बहुत नाम सुना है—इस बहाने उनके दर्शन भी हो जाएंगे। आप यह समझ लेना मैडम कि शूटिंग हो रही है—कोई सीन या डांस रोल फिल्माया जा रहा है, इस बहाने हम भी आपका डांस देख लेंगे...।”
“यू...।”
“अरे ठीक तो बोलता है।” चांदनी बीच में बोल पड़ी।
“सच बात तो यह है कि चांदनी आपसे ज्यादा खूबसूरत है—अब यह आपका नसीब है—नवाब साहब आपका डांस देखना चाहते हैं—कुछ लोग समुंदर के पास रहकर भी प्यासे रह जाते हैं। अगर जिन्दगी में मुझे कभी फिल्म बनाने का मौका मिला तो चांदनी को हीरोइन लूंगा।”
“इसे कहते हैं मर्दों वाली बात।” चांदनी ने शोला को तारीफ भरी नजरों से देखते हुए कहा—“और उस फिल्म का हीरो भी तू होगा मेरी जान। चल छोरी...गाड़ी में बैठ ले...।”
“अरे कोई मुझे बचाए...पुलिस को फोन करो—यह किडनैपिंग है।” मूर्ति ने शोर मचाया।
“कोई नहीं बचाएगा—पुलिस का सबसे बड़ा ऑफिसर भी कल वहां होगा, चल हल्ला मत मचा वरना गोली मारनी पड़ेगी तेरे को।”
चांदनी मूर्ति को गन पॉइंट पर ले गई। मूर्ति मर्सडीज में बैठी—शोला ड्राइविंग सीट पर बैठ गया और चांदनी पिछली सीट पर। पीछे-पीछे जीप चल पड़ी, जीप की ड्राइविंग अब एक गनमैन ने सम्भाल ली थी।
“हमारे नवाब साहब किसी का बुरा नहीं चाहते।” चांदनी रास्ते में बता रही थी—“मुश्किल यह है कि उनके मुंह से निकली जुबान झूठ नहीं होनी चाहिए, अगर वह झूठ साबित हो गई तो नवाब साहब अपने ही आदमियों में से दो-चार का कत्ल कर डालते हैं। मालूम नहीं किसका नंबर लग जाए और उनकी गप्पों को सच बनाने वाले सैकड़ों कारिन्दे हैं। एक बार लन्दन में उन्होंने कह दिया कि अल्फ्रेड पार्क में विक्टर पैलेस नाम का कोई डिपार्टमेंटल स्टोर नहीं—और यह स्टोर वहां का फेमस स्टोर हुआ करता था जो अब नहीं है।”
“क्यों, अब क्यों नहीं है?” शोला ने पूछा।
“हम लोगों ने उसे रातों-रात बमों से उड़ा दिया था।” चांदनी ने जवाब दिया।
एक घण्टे के सफर के बाद दोनों गाड़ियां एक किलेनुमा हवेली में पहुंच गईं। चांदनी ने बताया कि नवाब साहब की यह खानदानी हवेली है—अक्सर वह बाहर विदेशों में रहते हैं—जब भी अपनी खानदानी हवेली में आते हैं तो खूब दौलत बांट कर जाते हैं। एक बस्ती के पास से गुजरते हुए उसने बताया कि यह पूरी बस्ती नवाब साहब ने अपने पैसे से बनवाई और गरीबों को इसमें बसाया। चांदनी ने बताया कि नवाब साहब की अफ्रीका में कई खाने हैं, हीरों की खानें और उनकी माली सम्पत्ति का कोई अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता।
नवाब की किलेनुमा हवेली में असंख्य गार्डस् नजर आ रहे थे, जो बकायदा वर्दियों में थे। मूर्ति उन्हें गेस्ट हाउस की तरफ ले गई।
“मेरी एक इल्तजा है।” शोला ने चांदनी से कहा।
“बोल यार! तू भी क्या याद रखेगा—तेरे पर अपना दिल आ गया है।”
“क्या हमें इसी वक्त नवाब साहब से मिलवा सकती हो?”
“कोशिश करती हूं—वैसे वह खुद भी मूर्ति से मिलने के लिए बेताब होंगे...।”
चांदनी उन्हें गेस्ट हाउस में छोड़कर चली गई। मूर्ति चुप थी। उसकी आंखों से आंसू आ-आ कर सूख चुके थे। उसने शोला की तरफ नफरत भरी निगाह से देखा, उससे कुछ न बोली—शोला एक बालकनी पर खड़ा होकर बाहर का जायजा लेने लगा।
करीब आधा घण्टा बाद चांदनी दोबारा वहां दिखाई दी।
“नवाब साहब बहुत खुश हुए, यह सुनकर कि मूर्ति यहां पहुंच गई है।” चांदनी ने कहा—“इसे समझा देना कि कोई बदतमीजी ना कर बैठे। हम नवाब साहब की तोहीन बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे।”
“मैंने सब समझा दिया है।” शोला ने कहा।
शोला और मूर्ति को नवाब के आलीशान महल के उस हिस्से में ले जाया गया, जहां उसकी प्राइवेट रिहाइश थी। उन्हें एक शानदार ड्राइंग रूम में बैठा दिया गया—ड्राइंग रूम के ऊपर एक बालकनी थी जहां दो मशीनगनधारी मौजूद थे—दूसरी साइड की बालकनी में भी दो गनमैन मौजूद थे।
पांच मिनट के प्रतीक्षा के बाद नवाब साहब अपनी दो बांदियों के साथ वहां जलवा-अफरोज हुए। शोला अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ—लेकिन मूर्ति तो पहले से ही खड़ी थी। उनके ठीक पीछे चांदनी खड़ी थी। उसी ने बताया था कि नवाब साहब तशरीफ ला रहे हैं।
नवाब ने मूर्ति की तरफ देखकर आदाब किया मगर मूर्ति ने कोई उत्तर नहीं दिया। नवाब शेरवानी पहने था और वह दुबले-पतले शरीर का लम्बा-सा इंसान था। वह क्लीन शेव्ड था और बेहद गोरी रंगत का था, उसके बाल भूरे थे। देखने में वह किसी अंग्रेज की औलाद लगता था।
“नवाब साहब!” शोला ने कहा—“मेरी एक हसरत है, आपसे मुसाफा मिलाने का फख्र हासिल करूं...हमारी हीरोइन का मानना है कि आप बहुत घमण्डी हैं, किसी से हाथ नहीं मिलाते...अभी साबित हो जाएगा कि मूर्ति के विचार आपके बारे में कितने गलत हैं?”
नवाब ने बिना कुछ कहे हाथ बढ़ा दिया। वह बदस्तूर मूर्ति की तरफ एकटक देखता रहा। मूर्ति को देखकर वह जैसे अपनी सुध-बुध ही खो बैठा था। मूर्ति थी भी इतनी हसीन कि कोई छू भी दे तो मैली हो जाए।
शोला ने आगे बढ़कर नवाब से हाथ मिलाया।
हाथ मिलाते समय शोला का एक पांव नवाब के एक पैर की जूती के ऊपर जम गया फिर उसने हाथ मिलाते-मिलाते खुशी में नवाब के हाथ को दो-तीन झटके दिए और फिर उसका हाथ छोड़ दिया। शोला अपना काम करके पीछे हट गया।
नवाब ने मूर्ति की तरफ ज्यों ही बढ़ना चाहा वह एकाएक लड़खड़ा गया। वह फिर चला—फिर लड़खड़ाया-बांदियों ने तुरन्त सम्भाल लिया। अब वह उस हाथ को भी घूर रहा था, जो थोड़ी देर पहले शोला के हाथ में था, वह हाथ ढीला होकर लटक गया था। नवाब इस हाथ को भी उठाने की कोशिश कर रहा था।
“हमारा हाथ...हमारा पैर...एक पैर एक हाथ...काम नहीं कर रहा है...।” नवाब ने बौखलाए के अन्दाज में कहा।
“अभी तो आप ठीक थे महाबली।” एक बांदी ने कहा।
“हम सच कह रहे हैं...डॉक्टर को बुलाओ जल्दी।” नवाब ने कहा।
“डॉक्टर को बुलाने से कुछ फायदा नहीं होगा।” शोला ने कहा—“दवा वही कर सकता है जिसने मर्ज दिया है और यह मर्ज हमने दिया है नवाब सलामत अली खान साहब, हमने आपको सिर्फ छूकर अपाहिज कर दिया है। आप जैसे लोगों से हमारी मुलाकात का कुछ ऐसा ही अन्दाज होता है—ताकि आप हमें उम्र भर याद रख सकें।”
“तुम मूर्ति के क्या लगते हो?” नवाब ने ठहरे-ठहरे स्वर में कहा।
उसी दौरान बालकनी के गनमैनों ने शोला को निशाने पर ले लिया।
“ड्यूटी ज्वाइन किए चौबीस घण्टे भी नहीं हुए हैं—मैं मैडम मूर्ति का बॉडीगार्ड हूं और जब तक मैं इस पोस्ट पर हूं तब तक कोई शख्स इस तरह मैडम मूर्ति को दावत नहीं दे सकता। एक बात और याद रखना नवाब साहब—हम अपनी मर्जी से यहां आए हैं और अपनी मर्जी से जा भी रहे हैं। आपकी कुल कायनात में ऐसा बड़ा अगर कोई है, जो हमें जाने से रोक सके तो उसे हुक्म दें कि वह हमें रोककर दिखाए।”
चांदनी का रिवाल्वर शोला की पुश्त पर आ लगा।
“यह क्या बकवास कर रहे हो?” चांदनी ने गुर्राकर कहा।
“नहीं चांदनी! तुम नहीं रोक पाओगी।” शोला ने कहा—“मैं किसी मर्द की बात कर रहा हूं—तुम्हारी नहीं।” शोला ने उसके रिवाल्वर की परवाह किए बिना कहा—“नवाब साहब शूटिंग खत्म होने के बाद,
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Additional information
Book Title | शोला का डन्का : Shola Ka Danka by Deva Thakur |
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Isbn No | |
No of Pages | 264 |
Country Of Orign | India |
Year of Publication | |
Language | |
Genres | |
Author | |
Age | |
Publisher Name | Ravi Pocket Books |
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