मनहूस : Manhus
Ebook ✓ 48 Free Preview ✓
48
100
Description
आपके हाथों में है 'अर्जुन त्यागी' सीरीज पर आधारित उपन्यास इस में वो सब लटके झटके हैं जिनका आप बड़ी शिद्दत से इंतजार करते हैं— और कहानी तो माशाअल्ला है ही। ऐसे-ऐसे मोड़ों से गुजरी है कि खुद मेरे दिमाग की चक्कर घिन्नी बन गयी।
Manhus
Shiva Pandit
प्रस्तुत उपन्यास के सभी पात्र एवं घटनायें काल्पनिक हैं। किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से इनका कतई कोई सम्बन्ध नहीं है। समानता संयोग से हो सकती है। उपन्यास का उद्देश्य मात्र मनोरंजन है। प्रस्तुत उपन्यास में दिए गए हिंसक दृश्यों, धूम्रपान, मधपान अथवा किसी अन्य मादक पदार्थों के सेवन का प्रकाशक या लेखक कतई समर्थन नहीं करते। इस प्रकार के दृश्य पाठकों को इन कृत्यों को प्रेरित करने के लिए नहीं बल्कि कथानक को वास्तविक रूप में दर्शाने के लिए दिए गए हैं। पाठकों से अनुरोध है की इन कृत्यों व दुर्व्यसनों से दूर ही रहें। यह उपन्यास 18 + की आयु के लिए ही प्रकाशित किया गया है। उपन्यास आगे पढ़ने से पाठक अपनी सहमति दर्ज कर रहा है की वह 18 + है। प्रूफ संशोधन कार्य को पूर्ण योग्यता व सावधानीपूर्वक किया गया है, लेकिन मानवीय त्रुटि रह सकती है, अत: किसी भी तथ्य सम्बन्धी त्रुटि के लिए लेखक, प्रकाशक व मुद्रक उत्तरदायी नहीं होंगे।
Free Preview
मनहूस
शिवा पंडित
“हो-हो-हो....। यह.....यह है वह मच्छर........जो........जो ततैया के डोगा को डंक मारने की फिराक में था.....हो-हो-हो....।”
वह बिल्कुल पागलों की तरह हंस रहा था। कभी वह अपने सिर पर हंसते हुए हाथ मलने लगता तो कभी अपनी जांघों को पीटने लगता। ऊपर से उसका चेहरा भी ऐसा था।
बिल्कुल बुलडॉग नजर आ रहा था.....। उसके गाल लटक रहे थे। आंखों के नीचे काले बाल उगे हुए थे....। भवें इंच-इंच मोटी थीं.... कानों से बाल बाहर लटक रहे थे, और दाढ़ी जो कि सिर्फ मूंछों से मिल रही थी, उलझी हुई थी।
जैसी शक्ल, वैसा ही नाम....। डोगा।
अब उसके कपड़ों पर नजर डालें तो, जो उसे नहीं जानता, वह उसकी ड्रेस देखकर हंस पड़ता।
बैंड वाले की, फौजी की और राजाओं की ड्रेसों का कम्बीनेशन थे उसके कपड़े।
नीले-लाल रंग की पैंट, जिसके पाऊचों के दोनों तरफ दो-दो पतली लंबी समांतर पट्टियां लगी थीं, जैसे वह ट्रैक ट्राउजर पहने हो....। ऊपर उसने जरी की कमीज पहनी थी, जो की उसके घुटनों के ऊपर तक पहुंच रही थी।
सीने पर दस-बारह मेडल लगे थे, जो पता नहीं उसे कौन-सी वीरता दिखाने के मिले थे, और सिर पर मिलिट्री की कैप थी। कमीज के कंधों पर सोल्डर लगे थे, जिनके सिर ऊपर रेशम के दो-दो इंच लंबे धागे लटक रहे थे।
अंडरवर्ल्ड में खौफ का दूसरा नाम डोगा था। उसके खौफ का आलम यह था कि विराटनगर की पुलिस भी उससे थर्राती थी।
बस यूं समझ लो कि भारत का हिस्सा होने के बावजूद वहां कानून का नहीं, डोगा का हुक्म चलता था। पुलिस तो जैसे वहां कानून की रक्षा के लिये नहीं, डोगा की सेवा के लिये रखी मालूम होती थी।
उसके पालतू गुण्डे अगर थाने में घुसकर इंस्पेक्टर की आंखों के सामने किसी का कत्ल कर दें, तब भी पुलिस अंधी बनी रहे....। सरे बाजार अगर किसी लड़की का रेप हो जाये, तो किसी की क्या मजाल जो विरोध में एक शब्द भी बोल जाये, और रेप होने के बाद अगर पीड़िता शिकायत लेकर थाने पहुंच जाये तो वहां उसकी सुनवाई होनी तो दूर रही, उल्टे थाने वाले ही फिर से उसकी इज्जत लूट लें।
ऐसा हाल था विराटनगर का और ऐसा खौफ था डोगा का।
चांदी के सिंहासन पर रखे लाल रंग के गद्दे पर बैठा था वह....। सिंहासन की बैठक भी गोलाई में ही लाल रंग रागद्दा चिपका हुआ था और सिंहासन की पुश्त के ऊपर छत की तरफ मुंह उठाए कुत्ते की आकृति बनी हुई थी....।
सिंहासन के दाएं-बाएं दो लड़कियां खड़ी थीं। दोनों बाइस-तेइस साल की, हद से बढ़कर हसीन थीं। उनके बाल लड़कों की तरह कटे हुए थे, जो उनके पहले से ही खूबसूरत चेहरों को और भी खूबसूरत बना रहे थे।
गले में स्लीवलैस स्कीवी भी डाल रखी थी, जो कि उनकी जांघों के ऊपरी हिस्से तक पहुंच रही थी। नीचे बस अंडरवीयर ही डाल रखा था उन्होंने। सफेद रंग का अंडरवियर।
उनकी केले के तने-सी चिकनी जांघें देखकर ही आदमी हाय-हाय करने लगे। ऐसा शबाब था उनकी जांघों में।
कैमरा और पीछे हटा तो वह जगह पूरी तरह नजर आने लगी, जहां डोगा का सिंहासन लगा था।
अब उसका पूरा दरबार नजर आ रहा था।
उसके ऐन सामने सिंहासन से करीब दस फुट दूर फर्श पर एक फूलदार चक्र बना हुआ था, जिस पर करीब छह फुट लंबा अच्छी खासी सेहत वाला आदमी खड़ा था। उसकी बाजुंओं के मसल्स उसकी ताकत का परिचय दे रहे थे...। जबड़ों के उभरे मसल्स बता रहे थे कि वह जबड़ों को शक्ति से भींचे हुए है। उसके चेहरे पर खौफ का एक छोटा-सा भी शिकन मात्र नहीं था, और वह डोगा को ऐसे आग उगलती आंखों से देख रहा था मानो वह उसे नजरों से ही जला कर भस्म कर देगा।
उसके दोनों हाथ उसकी पीठ पीछे हथकड़ियों से बंधे हुए थे.... और दो क्रूर चेहरे वाले आदमी ऐन उसके पीछे खड़े थे।
साफ नजर आ रहा था कि वह शख्स डोगा पर टूट पढ़ने को बेकरार था....। मगर अपने हाथ बंधे होने तथा पीछे खड़े दो आदमियों की वजह से वह मजबूर था।
हॉल के दाएं-बाएं की दीवारों के साथ लगभग दस-दस आदमी खड़े थे, और सभी के सभी चेहरों से ही खतरनाक नजर आ रहे थे।
हॉल में कोई रोशनी नहीं थी। बस फूल पर खड़े आदमी के सिर के पांच-छह फुट ऊपर एक बल्ब जल रहा था, उसी की रोशनी हॉल में फैली हुई थी।
पागलों की तरह हंसता हुआ डोगा एकाएक ही अपने सिंहासन से उठा और आगे बढ़कर उस आदमी के सामने आ खड़ा हुआ।
अपनी हंसी को रोककर उसने अपनी गर्दन दाईं तरफ झुकाई और आंखें फाड़कर उसे देखने लगा। फिर गर्दन को बाईं तरफ टेढ़ा करके उसे देखा, और फिर गर्दन सीधी कर उसके कॉलर का कोना पकड़कर उसे खींचते हुए बोला—
“तेरे को पहली बार देख रहा हूं मैं....। मैंने तेरा कुछ बिगाड़ा भी नहीं, फिर भी तूने मेरे एक गुलाम को मार डाला। इतनी हिम्मत कहां से आ गई तेरे में कि तू डोगा के आदमी का कत्ल कर दे। क्या तेरे को डर नहीं लगा, या तू डोगा के बारे में जानता ही नहीं था?”
उस आदमी के चेहरे पर फैली कठोरता और भी गहरी हो गई। आंखों में फैला खून और भी गहरा हो गया।
“तेरे को क्या पता डोगा कि मैंने तेरे गुलाम को क्यों मारा....। तू तो इतने पाप करता है कि तेरे को सुबह का किया गुनाह शाम तक याद नहीं रहता, फिर दो महीने पहले का गुनाह कहां से याद आयेगा तेरे को?”
वह ऐसे फुंफकारा जैसे अपनी जुबान से शब्द नहीं जहर उगल रहा हो।
“ओह.....।” होठों को गोल करते हुए डोगा ने अपनी गुद्धी पर हाथ मारा—“तो मैंने दो महीने पहले तेरा कुछ बिगाड़ा था?”
“मेरी बहन की इज्जत लूटी थी तूने कमीने....।” दहाड़ उठा वह आदमी—“याद कर मोनिका को, जिसे तेरे कुत्ते जवाहरनगर से उठाकर लाए थे और तूने रात भर उससे बलात्कार किया था....। बेचारी मेरी छोटी बहन सहन नहीं कर पाई, और तूने उसकी लाश को सड़क पर फेंक दिया।”
“ओ.......।” डोगा ने अपने सिर पर चपत मारी—“तो तू उस मोनिका का भाई है।”
उसकी गाली का जरा भी बुरा नहीं मनाया उसने।
“हां.....”उस आदमी ने शब्दों से जहर उगला—“उसी बदनसीब मोनिका का भाई हूं मैं.....और मैंने अपनी बहन की लाश की कसम खाई थी कि मैं तेरे को तेरे निजाम के साथ खत्म करके ही चैन की सांस लूंगा....और मैंने इसकी शुरुआत भी कर दी....तेरे एक कुत्ते को खत्म भी कर दिया मैंने, और अब तेरी बारी है।”
“हो-हो-हो....।” डोगा उछल-उछलकर हंसने लगा—फिर रुककर उसके सीने पर हाथ फेरते हुए बोला—“मुझे खत्म करेगा तू?”
“तू मेरे हाथ तो खोल डोगा.....! फिर देख मैं कैसे तेरे पेट को फाड़कर तेरी आंतें निकालता हूं....। तू समझता क्या है खुद को? चंद गुंडों के बल पर तूने विराटनगर में आतंक का साम्राज्य फैला रखा है, उसे मैं एक ही झटके में खत्म कर दूंगा।”
“अच्छा!” आंखों में आश्चर्य भरते हुए मुस्कुराया डोगा।
“तू है ही क्या डोगा, एक जोकर है तू.....और जोकर राज करने के लिये नहीं, लोगों को हंसाने के लिये होता है। तू मेरे हाथ तो खोल....। फिर देख मैं क्या हालत करता हूं तेरी....।”
गुस्से से नथुने फूल-पिचक रहे थे उसके।
डोगा अपना चेहरा उसके करीब ले आया और उसकी आंखों में आंखें डालते हुए बड़े ही नाटकीय अंदाज में बोला—
“डोगा हूं मैं, डोगा....। सौ खतरनाक नस्ल के कुत्ते मरे थे, तब यह डोगा पैदा हुआ था।” उसने अपने सिर पर हाथ मारा—“डोगा का काटा पानी मांगता जरूर है, मगर उसे पानी नसीब नहीं हो पाता....। उससे पहले ही उसकी मौत हो जाती है।”
“सिर्फ भौंकने वाला डॉग है तू डोगा....! तभी तो भौंके ही जा रहा है.....। काटने की ताकत नहीं तेरे में....। अगर खुद को इतना ही जहरीला समझता है तो खोल मेरे हाथ....। एक ही झटके में तेरे जहर भरे सारे दांत तोड़ कर रख दूंगा।”
डोगा ने अब भी बुरा नहीं मनाया।
वह मुस्कुराते हुए पलटा और अपने सिंहासन पर जा बैठा।
उसने अपने दाईं तरफ खड़ी लड़की की कलाई पकड़ी और इस तरह उसे झटका दिया लड़की उछल कर सिंहासन के हत्थे पर आ बैठी।
डोगा ने उसकी कलाई छोड़ी और उसकी जांघ पर हाथ फेरते हुए सामने खड़े आदमी को देखते हुए मुस्कुराया—
“दो कुतियां पाल रखी हैं मैंने....। इसका नाम बिजली है....।” उसने उस लड़की की जांघ पर हाथ मारा और उसे मुट्ठी में भींचा—“तू मेरे से दस फुट दूर है.....। सिर्फ दो ही कदमों में तू आराम से मेरे तक पहुंच सकता है....। मेरे को मारना चाहता है न तू। तेरे को छूट है। तेरे और मेरे बीच में बस यह दीवार होगी....।” उसने बिजली की जांघ पर पुनः हाथ मारा—“इस दीवार को हटाकर अगर तूने मेरे को छू ही लिया तो तू मेरे को मारने का हकदार होगा। बेफिक्र रह......और कोई भी बीच में नहीं आयेगा। हाथ खोल दो इसके।” वह दहाड़ा।
तुरंत उस आदमी के पीछे खड़े दो गुंडों में से एक ने उसकी हथकड़ियां खोल दीं और तभी बिजली सिंहासन के हत्थे से उतरकर डोगा के आगे आ खड़ी हुई।
उसकी हथकड़ियां खोलते ही उसके पीछे खड़े दोनों गुण्डे वहां से हटकर बाईं तरफ की दीवार के साथ लगकर खड़े हो गये।
उस आदमी ने अपनी दाईं कलाई मसलते हुए बिजली को देखा और एक-एक शब्द को चबाते हुए बोला—
“मेरे मां-बाप ने मुझे जो संस्कार दिये हैं.....उसमें एक यह भी है कि औरत की इज्जत करो और उस पर हाथ मत उठाओ। मगर जो कुछ मेरी बहन के साथ हुआ....उसे याद करते हुए मैं आज तुम पर हाथ भी उठाऊंगा और जरूरत पड़ी तो तेरे को खत्म करने में भी नहीं हिचकूंगा। क्योंकि मेरे को हर हाल में तेरे इस कमीने डोगा को खत्म करना है। इसलिये मैं तेरे से यही कहूंगा कि अगर जान की सलामती चाहती है तो चुपचाप पीछे हट जा....। मेरे सिर पर खून सवार है, और मैं नाहक ही तेरे खून से अपने हाथ नहीं रंगना चाहता।”
जवाब में बिजली ने कदम आगे बढ़ाए और उससे दो-तीन फुट की दूरी पर रुकते हुए बोली—
“तू बकवास बहुत कर रहा है। मेरे पीछे डोगा बैठा है....। मेरे को परे फेंक और जाकर पकड़ ले डोगा को। बातों में वक्त क्यों खराब कर रहा है....।”
गुस्से से पहले से ही शुरु हो रहा उस आदमी का चेहरा और भी सुर्ख हो गया।
“मैं तो एक औरत होने के नाते तेरी इज्जत कर रहा था, मगर अब....अब देख मैं क्या करता हूं।”
कहने के साथ ही वह पगलाये भैंसे की तरह बिजली पर झपटा। मगर यह क्या.....!
वह उछलकर कई फुट पीछे जा गिरा और उसी के साथ ही उसका सिर ‘धड़ाक’ से फर्श से जा टकराया।
बिजली की लात उसके पेट में इतनी तेजी से पड़ी थी कि उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी लात चली थी।
गिरते ही वह तेजी से उठा और अपने सिर को झटका देकर अपने गुम हो रहे होश को काबू में किया।
बिजली के एक ही वार से वह समझ गया कि वह छुई-मुई-सी नजर आने वाली लड़की साधारण नहीं, बल्कि अपने भीतर सचमुच की बिजली समेटे हुए है।
सो अब वह पूरी तरह से सतर्क था।
उसने अपनी बाहें फैलाईं और बड़े ही खतरनाक भाव से उसकी तरफ बढ़ा।
जैसे ही वह उसके करीब पहुंचा, बिजली ने फिर से अपनी लात चला दी।
लेकिन अब की बार वह आदमी सतर्क था तो उसने टांग के पेट में पढ़ने से पहले ही टांग को पकड़ लिया और उसे झटके से ऊपर उठाते हुए नीचे उछाला।
बिजली का दूसरा पैर जमीन से उखड़ गया और वह उछलकर पीठ के बल नीचे गिर पड़ी।
वह आदमी तेजी से डोगा की तरफ झपटा....। मगर उससे पहले ही बिजली तड़पकर उठी।
अभी वह डोगा से एक फुट ही दूर था कि पीछे से बिजली ने उसके बालों को पकड़ा और भयानक चीत्कार करते हुए उसे इतनी जोरों से पीछे खींचा कि वह पांच-छह फीट दूर जा गिरा।
उस आदमी को ऐसा लगा मानो उसके बाल उसकी चमड़ी को उखाड़कर लड़की के हाथ में पहुंच गये हों।
मगर इस वक्त उस पर जुनून सवार था, इसलिये अपनी पीड़ा को नजरअंदाज करते हुए वह तड़पकर खड़ा हुआ तो सामने लड़की को खड़ा देखा, जो खूनी निगाहों से उसे देख रही थी।
सहसा ही उसके मुंह से तेज हुंकार निकली और उसने अपनी स्कीवी के गले में हाथ डालकर तेज झटका दिया।
‘चर्रर्र.....,की आवाज के साथ स्कीवी आगे से फटती चली गई।
नीचे कुछ नहीं पहना था उसने, सो स्कीवी के फटते ही उसके तने हुए उभार नजर आने लगे।
बिजली ने हुंकार भरते हुए बिल्कुल सलमान खान के इस स्टाईल में स्कीवी को उतारकर उसे एक तरफ उछाल दिया और बाहों को ऐसे फैलाया कि देखने वालों के कलेजे मुंह को आ जायें।
उसकी इस हरकत पर वह आदमी बुरी तरह से बौखला उठा।
कोई और वक्त होता तो अपने सामने सिर्फ अंडरवियर पहने उस हसीन-तरीन युवती को देख उसकी हालत भी खराब हो जाती।
ऐसा हुस्न तो नसीब वालों को ही देखने को मिलता है।
मगर इस वक्त तो उस पर खून सवार था, सो उसने तेजी से अपने आप पर काबू पाया और उसकी तरफ ऐसे झपटा जैसे वह उसके उभारों को उसके सीने से उखाड़ देगा।
मगर ऐसा हो नहीं पाया।
उससे पहले ही बिजली का जिस्म हवा में उछला और उसकी फ्लाईंग किक उस आदमी के मुंह पर पड़ी।
उसके उछलने से उसके उभार इस कदर हिले थे कि देखने वाले की जान ही निकल जाये।
इस बार वह आदमी अपनी चीख को नहीं रोक पाया....। उसके मुंह से दिल दहला देने वाली चीख उबल पड़ी और वह उछलकर पीछे जा गिरा।
बिजली की फ्लाईंग किक इतनी जोरों से उसके मुंह पर पड़ी थी कि उसकी नाक की हड्डी टूट गई थी....।
नीचे गिरते ही उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। उसका चेहरा लहूलुहान हो गया।
बैठते हुए उसने अपने गुम होते होश को संभालने के लिये सिर को जोरों से झटका तो उसके दायें-बायें खून के छींटे उड़े।
मगर उठ नहीं पाया वह....। उससे पहले ही बिजली उसके सिर पर जा पहुंची और एक जबरदस्त घूंसा उसके चेहरे पर दे मारा।
‘ढिशुम....।’
चीखता हुआ वह आदमी पीछे जा गिरा।
बिजली उछलकर उसकी टांगों पर बैठी और उसके दोनों हाथ सीधे हो तेजी से नीचे गिरे और आदमी के पेट में जा घुसे।
वह आदमी ऐसे चीखा कि हॉल की दीवारें तक दहल उठीं।
मगर बिजली के तो जैसे कान ही नहीं थे....।
उसने उसके पेट को फाड़ डाला और हाथ से उसकी आंतें बाहर खींच लीं।
ऐसा वीभत्स और भयानक दृश्य था वह कमजोर दिल वाला तो उस दृश्य को देख कर बेहोश ही हो जाये।
नीचे पड़ा आदमी जोर-जोर से चीखते हुए हाथ-पैर मारने लगा। मगर बिजली को उस पर जरा भी तरस नहीं आया, उसके हाथ को अपने खून से सने हाथों से पकड़े वह उठी और आंतों को बाहर खींचने लगी।
उस आदमी के जिस्म से खून निकल कर बाहर बह रहा था।
बिजली के हाथ, उसके उभार....उसकी टांगें, पेट, खून से रंग गये थे।
उस आदमी के पेट से निकल रही आंतें बिजली के जिस्म से रगड़ खाती हुई नीचे इकट्ठी हो रही थीं।
और फिर खून अधिक मात्रा में बह जाने से आदमी ने दम तोड़ दिया।
बेचारा! बदला लेने की हसरत दिल में ही लिये मर गया।
बिजली ने आंतों को उठाकर उस आदमी के ऊपर फेंका और फिर मुड़कर डोगा के सामने आ खड़ी हुई।
डोगा कुछ पल तो उसके खून से रंगे जिस्म को देखता रहा, फिर उसने बिजली का हाथ पकड़ा और उसे अपने और करीब करके पेट को जीभ से साफ करने लगा।
हॉल में ऐसा सन्नाटा था, कि डोगा के बिजली के जिस्म को चाटने की आवाजें कानों को फाड़ती महसूस हो रही थीं....।
सभी की निगाहें डोगा पर टिकी हुई थीं, जो बिजली के पेट को छोड़ अब उसके उभारों को चाट रहा था, और बिजली के मुंह से उत्तेजना से सिसकारियां निकल रही थीं। वह अपने बदन को ऐसे तोड़-मरोड़ रही थी, मानो उसके अरमान चरम सीमा पर पहुंच गये हों।
अगर उसका बदन खून से न रंगा होता, तो देखने वाले की हालत उस सीन को देखकर खराब होने लगती। मगर अब वो ऐसा नजर आ रहा था मानो कोई पिशाच खून से सनी चुड़ैल को चाट रहा हो।
आखिर बिजली ने डोगा के सिर को पकड़कर अपने उभारों के बीच ऐसे भींच लिया, मानो उसकी बर्दाश्त अब जवाब दे गई हो।
डोगा ने उसे परे कर उसे देखा....। अब डोगा के मुंह, नाक तथा माथे पर खून लग चुका था।
“जाकर नहा....।” डोगा बोला—“हम अभी आते हैं और तेरे भीतर उठ रही आग को शांत करते हैं।”
बिजली का चेहरा खिल उठा। उसकी आंखें ऐसे चमकने लगीं, मानो वर्षों बाद आज उसकी इच्छा पूरी होगी।
वह फौरन वहां से हटी और सिंहासन के पीछे एक बंद दरवाजे को खोल उस में प्रवेश कर गई....।
डोगा ने जुबान निकाल कर अपने होठों को उससे साफ किया और एक चटकारा लेकर ऊंचे स्वर में बोला—
“इसे फेंक दो बाहर.....।”
कहते हुए उसने फर्श पर पड़ी लाश की तरफ इशारा किया।
कुछ ही पलों में वहां न तो लाश नजर आ रही थी, न ही वहां खून का कोई धब्बा दिख रहा था।
बस डोगा का खून से रंगा चेहरा ही नजर आ रहा था, जो उस स्थान को देखते हुए गुर्रा रहा था, जहां कुछ पल पहले लाश पड़ी थी—
“डोगा हूं मैं.....डोगा.....डोगा का काटा पानी मांगता तो जरूर है, मगर उसे पानी नसीब नहीं होता। हरामखोर डोगा को मारने चला था....। नहीं जानता कि तेरे जैसे गुलाम तो डोगा की फोर्थ कैटेगरी में आते हैं। पप्पू....।”
उसने आवाज लगाते हुए बाईं तरफ देखा।
तुरंत बाईं तरफ की दीवार में लगा पहला दरवाजा खुला और उसमें से आंखों पर नजर का चश्मा चढ़ाए एक आदमी निकलकर उसी चक्र वाले फूल पर आ खड़ा हुआ, जहां पहले मरने वाले आदमी ने खड़े होकर डोगा को ललकारा था।
“हुक्म डोगा....!” वह सिर को झुकाते हुए बोला।
“गुल्लू कहां है....?”
“वो अजंता होटल गया है डोगा.....! होटल को महीना भेजे तीन दिन ज्यादा हो गये हैं....। वहां वसूली करने गया है गुल्लू!”
डोगा के होठों पर एक वहशत भरी मुस्कान फैल गई।
“यह साला गुल्लू है ही ऐसा.....। मेरे हुक्म देने से पहले ही काम पर निकल पड़ता है।”
कहकर वह हंस पड़ा और बिना किसी की तरफ देखे सिंहासन के पीछे दरवाजे की तरफ बढ़ गया। उसके पीछे-पीछे उसके बाई तरफ खड़ी युवती चल रही थी। जैसे वह उसका उसकी बॉडीगार्ड हो।
¶¶
1 review for Simple Product 007
Additional information
Book Title | मनहूस : Manhus |
---|---|
Isbn No | |
No of Pages | 318 |
Country Of Orign | India |
Year of Publication | |
Language | |
Genres | |
Author | |
Age | |
Publisher Name | Ravi Pocket Books |
Related products
-
- Keshav Puran : केशव पुराण
-
10048
-
- Changez Khan : चंगेज खान
-
10048
admin –
Aliquam fringilla euismod risus ac bibendum. Sed sit amet sem varius ante feugiat lacinia. Nunc ipsum nulla, vulputate ut venenatis vitae, malesuada ut mi. Quisque iaculis, dui congue placerat pretium, augue erat accumsan lacus