हरामी
दिनेश ठाकुर
कार के इंजन ने बेसुरी-सी आवाज के साथ दम तोड़ दिया।
विजय चौहान ने पुनः कार स्टार्ट करने का काफी प्रयास किया, लेकिन वो कामयाब नहीं हो सका। लगता था कि कार के इंजन में कोई भारी नुक्स आ गया था।
विजय चौहान के चेहरे पर मुस्कुराहट के भाव उभरे।
“सत्यानाश! इस हरामजादी को भी अभी खराब होना था।” वो बड़बड़ाया——“मैं तो पहले ही मुसीबत में हूं। मेरे ऊपर एक और नई मुसीबत आन पड़ी।”
मन ही मन कलपता हुआ विजय चौहान ड्राइविंग डोर खोलकर कार से उतरा। उसने कार का बोनट उठाकर इंजन चेक किया, परंतु उसे कोई खराबी समझ नहीं आई। उसने एक गहरी सांस लेकर बोनट बंद करते हुए लिफ्ट की तलाश में सड़क पर नजर डाली, किंतु फिलहाल उसे कोई वाहन आता नजर नहीं आया था।
सड़क विधवा की मांग की तरह सूनी पड़ी थी।
वो किसी वाहन के आने का इंतजार करने लगा।
जब काफी देर तक इंतजार करने के बाद भी उसे कोई वाहन आता नजर नहीं आया तो वो अपनी फूटी किस्मत को कोसता हुआ एक तरफ बढ़ गया। दरअसल, उसके पास चोरी की कार थी, जिसे वो पंजिम से लेकर भागा था और पंजिम तथा वास्को में उसने काफी हंगामा भी मचाया था। अतः उस कार के करीब ज्यादा देर तक ठहरना उसकी सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता था।
सड़क पर सामने एक मोड़ था।
मगर भागते वक्त हीरों की थैली उसकी जेब से निकलकर कहीं गिर गई थी। इस बारे में उसे उस वक्त मालूम हुआ जब उसने अपनी जेब थपथपाई थी।
(पूर्व विवरण जानने के लिए दिनेश ठाकुर का 'विजय चौहान सीरीज' का उपन्यास 'हिंसक' पढ़ें)
इतनी लाशें गिराने और इतना लहू बहाने के बाद उसके पास सिर्फ इतना ही रुपया बचा था, जो कि फिलहाल उसकी जेब में मौजूद था।
एक बार फिर इतिहास दोहराया गया था। दौलत विजय चौहान के हाथ आकर भी निकल गई थी और अब वो कार भी विजय चौहान को धोखा दे गई थी।
अभी वो गोवा की सीमा में ही था।
विजय चौहान सड़क के मोड़ पर घूमा।
आंखें चमक उठीं उसकी।
मोड़ से थोड़ा आगे सड़क के किनारे पर उसे एक काले रंग की एम्बेसडर खड़ी नजर आई। किंतु उसके आसपास उसे कोई दिखाई नहीं दिया था।
उलझन में डूबा विजय चौहान कार के करीब पहुंचा।
तत्पश्चात उसने कार के भीतर झांक कर देखा, किंतु उसके भीतर भी कोई नहीं था।
विजय चौहान का दिमाग चकरा उठा।
वो समझ नहीं पाया कि यह कार इस वीराने में क्यों खड़ी है? और उसका मालिक कहां चला गया?
विजय चौहान ने सीधा होकर चारों तरफ निगाहें घुमाईं, मगर उसे आसपास चिड़िया का बच्चा भी नजर नहीं आया था।
चारों तरफ मौत जैसा सन्नाटा फैला था।
विजय चौहान ने अजीब अंदाज में कंधे उचकाए और बड़बड़ा उठा——“अच्छा है आसपास कोई नहीं है। मैं इस कार को उड़ा ले जाता हूं।”
अगले क्षण उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। बिना चाबी के वो कार कैसे ले जा सकता था?
तभी!
विजय चौहान के कानों से एक सख्त एवं खुरदुरा स्वर टकराया——“मैं तुम्हें एक फूटी कौड़ी भी नहीं देने वाला हरामजादों।”
और फिर सन्नाटा छा गया।
चौंका विजय चौहान।
उस तरफ का दृश्य ही कुछ ऐसा था।
झाड़ियों के उस पार खुला मैदान था। मैदान के बीचो-बीच चार खतरनाक से लगने वाले व्यक्ति उपस्थित थे। चारों के चेहरों पर कहर नाच रहा था। आंखों से मानो आग बरस रही थी। जबड़े सख्ती से कसे हुए थे। चारों के हाथों में रिवाल्वर दबी थीं, जो उन्होंने एक दूसरे पर तान रखी थीं। उसके बीच में काले रंग से पैंट किया एक बक्सा रखा हुआ था, जिस पर सफेद पैंट से 'भारत बैंक' लिखा हुआ था।
सब कुछ खुली किताब की तरह विजय चौहान के सामने था।
विजय चौहान को अंदाजा लगाने में एक पल से ज्यादा नहीं लगा था कि वो चारों बैंक का माल लूटकर भागे हुए हैं और उनमें से किसी एक के दिल में बेईमानी आ गई है और वो अपने जोड़ीदारों को हिस्सा देना नहीं चाहता है। सारा माल खुद डकार जाने की फिराक में है।
दौलत!
ये नाम विजय चौहान की रग-रग में सनसनी दौड़ा देने के लिए काफी था। जहां दौलत का चक्कर होता था, वो उसे अपनी बनाने के लिए बेचैन हो उठता था। किंतु उसने जल्दबाजी में कोई भी कदम उठाना उचित नहीं समझा था।
विजय चौहान दम साधे वो 'तमाशा' देखने लगा।
“ये बात अपने दिमाग से निकाल दे तेजा कि तू सारा माल खुद डकार जाएगा।” एकाएक उनमें से एक अपने सामने खड़े शख्स को घूरता हुआ बोला——“हम अपने हिस्से के लिए अपनी जान पर खेल जाएंगे, लेकिन तुझे अकेले ही माल डकारने नहीं देंगे। हमने भी लूट में बराबर का काम किया है। अपनी जान खतरे में डाली है। अगर तू नहीं चाहता कि खून-खराबा हो तो हमें हमारा हिस्सा दे दे।”
“मैं तुम लोगों को कह चुका हूं कि तुम लोगों को फूटी कौड़ी देने वाला नहीं हूं। भले ही मुझे तुम तीनों की लाशें ही क्यों ना बिछानी पड़ें।” तेजा के होठों से गुर्राहट उबली।
“हम तुझे इतनी आसानी से सारा माल नहीं हड़पने देंगे तेजा!” दूसरा फुंफकारा——“हमने भी चूड़ियां नहीं पहन रखी हैं। तू अकेला है और हम तीन हैं। अगर तू एक गोली चलाएगा तो हमारी तरफ से एक साथ तीन गोलियां चलेंगी। इसलिए हमारी लाशें बिछाने की बात अपने दिमाग से निकाल दे। खून-खराबे में कुछ नहीं रखा। कहीं ऐसा ना हो कि माल के साथ-साथ तुझे अपनी जान भी गंवानी पड़े।”
“तू मुझे मारेगा हरामजादे!” तेजा ने दांत पीसे।
“पायजामे से बाहर मत निकल। होश की दवा कर।” इस बार तीसरा हिंसक स्वर में बोला था——“अगर तू हमारे सामने तिरछा चलेगा तो क्या हम तुझे छोड़ देंगे? तेरी खैरियत इसी में है कि शराफत से रिवाल्वर रख और बंटवारा कर दे, जिस काम के लिए हम यहां आए हैं।”
“मलखान ठीक कह रहा है तेजा।” इससे पहले कि तेजा कुछ बोल पाता, पहले ने कहा——“अक्ल से काम ले। लगता है कि दौलत के लालच ने तेरी अक्ल पर पत्थर डाल दिए हैं। तू दौलत की खातिर अपने ही यारों की जान लेना चाहता है। कहीं ऐसा ना हो कि हम आपस में लड़ मरें और ये माल किसी और के हाथ लग जाए।”
इस वक्त विजय चौहान के कान वायरलेस बने हुए थे। वो मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। दरअसल, वो अंदाजा लगा सकता था कि इस कहानी का अंत क्या होने वाला है?
“मुझे शिक्षा मत दे बलवंत। तू क्या समझता है कि तेरी इस बकवास से मैं अपना इरादा बदल दूंगा? मैं किसी भी कीमत पर तुम लोगों का हिस्सा नहीं दूंगा।”
“तू तो बड़ा दगाबाज निकला तेजा।” मलखान ने तेजा को अंगारे बरसाती निगाहों से घूरा——“दौलत की खातिर यारों के साथ दगा कर रहा है तू।”
“दौलत की खातिर तो मैं किसी को भी दगा दे सकता हूं। अपने बाप को भी। मैं पागल नहीं हूं, जो सिर्फ यारों की खातिर इतनी दौलत अपने हाथ से निकल जाने दूं। तुम लोग हो कौन? मेरे सगे वाले लगते हो सालों, जो मैं ये माल रेवड़ी की तरह तुम लोगों के बीच बांट दूं?”
“ये हारामी तो मेरा ही कोई भाई-बंद लगता है।” एकाएक विजय चौहान बड़बड़ा उठा——“जो दौलत के लिए अपने जोड़ीदारों की लाश बिछाने पर आमदा है। देखता हूं कि ये लोग क्या करते हैं? फिलहाल तो तमाशा देखना ही बेहतर है।”
“अभी भी वक्त है तेजा। अपने दिमाग से ये खुराफात निकाल दे। ठंडे दिमाग से काम ले, वरना हम लोग भूल जाएंगे कि तू हमारा यार है। अगर तू नहीं मानेगा तो अंजाम बहुत बुरा होगा।”
“मुझे धमकी मत दे। मैं किसी अंजाम से नहीं डरता। ये मत समझना कि मैं अकेला हूं, इसलिए तुम मेरा कुछ बिगाड़ लोगे। मैं अकेला ही तुम तीनों पर भारी पड़ूंगा।”
“फिर हम भी देखते हैं कि तू कैसे हमें एक फूटी कौड़ी भी नहीं देता!” पहले वाले के होठों से मानो आग बरसी——“हम ना सिर्फ सारा माल लेकर जाएंगे, बल्कि तेरी लाश भी बिछाकर जाएंगे। तुम लोग देख क्या रहे हो मलखान? उठाओ बक्सा।”
मलखान आगे बढ़ा।
“खबरदार!” तेजा गुर्राया——“अगर तूने बक्सा छूने की कोशिश की तो तू बेमौत मारा जायेगा मलखान।”
परंतु मलखान नहीं रुका।
और सचमुच तेजा ने मलखान पर फायर कर दिया।
धांय!
गोली मलखान की भौहों के ठीक बीचो-बीच धंसी। वो होठों से हौलनाक चीख उगलता हुआ पीछे की तरफ उलट गया।
पलक झपकते ही सब कुछ हो गया था।
तभी बलवंत ने तेजा पर फायर झोंक मारा।
परंतु तेजा बड़ा ही फुर्तीला निकला था। वो ना सिर्फ अपने आप को बचा गया था, बल्कि उसने बलवंत पर फायर भी झोंक दिया था। गोली उसके सीने में उस जगह लगी थी, जहां इंसान का दिल धड़कता है। रिवाल्वर उसके हाथों से निकल गया था। वो दोनों हाथों से अपना सीना दबाए झुकता चला गया था।
इस बीच तीसरा तेजा पर गोली चला चुका था। गोली तेजा के कंधे में धंसी थी। तेजा के चेहरे पर पीड़ा की असंख्य रेखाएं उभरीं। उसने अपनी पीड़ा की परवाह ना करते हुए तीसरे पर फायर झोंक दिया।
शोला उसकी तरफ लपका।
मगर वो तेजा से कम फुर्तीला नहीं निकला था, उसने एक तरफ गिरते हुए स्वयं को गोली से बचाया और उल्टा तेजा पर फायर कर दिया।
धांय!
तेजा हवा में स्प्रिंग की तरह उछला। गोली उसका घुटना तोड़ गई। वो हवा में चकराता हुआ धड़ाम से नीचे गिरा। मगर उसने अपने हाथ से रिवाल्वर नहीं निकलने दिया था। गिरते ही उसने नाग की तरह पलटा खाया और एक क्षण का सौवां हिस्सा भी व्यर्थ किए बिना, लेटे-लेटे ट्रिगर दबा दिया।
धांय!
गोली तीसरे की खोपड़ी में धंसी। अगले क्षण उसका जिस्म हवा में उछला और धड़ाम से नीचे गिरा। पल भर के लिए वो तड़पा, फिर शांत हो गया। तब तक उनके बाकी दोनों साथी भी लाश में तब्दील हो चुके थे।
तेजा पीड़ा से गर्म रेत पर पड़ी किसी मछली की तरह छटपटा रहा था। वो एक हाथ से अपना घायल कंधा थामे था। उसके हाथ की उंगलियों की दरारों से खून की लकीरें कांप रही थीं। गोली से उत्पन्न घाव से खून निकल कर उसकी शर्ट की बांह को रंगता जा रहा था। उसके होठों से पीड़ा भरी कराहें फूट रही थीं। साथ ही अब उसके हाथ में इतनी ताकत नहीं रह गई थी, जो रिवाल्वर का बोझ उठा पाता। अतः रिवाल्वर उसकी उंगलियों में से फिसल चुका था।
विजय चौहान के लिए रास्ता साफ हो गया था।
उसने सब कुछ देखा था।
उनमें से तीन ऊपर पहुंच चुके थे और चौथा बेबस हो चुका था।
विजय चौहान के होठों पर कमीनगी भरी मुस्कान नाच उठी। वो झाड़ियों के पीछे से निकला। उसने अपने कॉलर खड़े किए और बड़े ही लापरवाह अंदाज में आगे बढ़ता चला गया।
वो तेजा के करीब पहुंचा।
“हेलो फ्रेंड!” बोला विजय चौहान——“ये सब क्या हो रहा है?”
“क... कौन हो तुम?” तेजा ने पूछा।
“एक राहगीर! उधर सड़क से गुजर रहा था, गोलियां चलने की आवाज सुनी तो मामला जानने के लिए इधर चला आया।”
“म... मुझे गोलियां लगी हैं भाई साहब। दर्द से मेरा बुरा हाल है।” तेजा तड़पता हुआ याचना भरे स्वर में बोला——“अगर आप मुझे हॉस्पिटल पहुंचा दें तो आपका मुझ पर बहुत एहसान होगा।”
अब तेजा दौलत को भूल गया था। इस वक्त उसे अपनी जान के लाले पड़े हुए थे। वो जानता था कि अगर उसके जिस्म से गोलियां ना निकाली गईं तो जहर उसके जिस्म में फैल जाएगा और तब उसकी मौत को कोई भी नहीं टाल पाएगा।
“म... मेरी मदद करो भाई साहब। मैं मर रहा हूं।” वो पुनः बोल उठा——“मुझे जल्दी से हॉस्पिटल पहुंचा दो।”
“घबराओ मत, मैं तुम्हें हॉस्पिटल जरूर पहुंचा दूंगा।” कहने के साथ विजय चौहान ने बक्से की तरफ संकेत किया——“पहले ये बताओ कि इस बक्से में क्या है?”
“इ... इसमें माल है। ढेर सारा रुपया!” उसने कराहते हुए जवाब दिया——“ये बक्सा हमने बैंक की वैन से लूटा है।”
बक्से के मुंह पर पीतल का मोटा ताला लटका हुआ था।
“बक्से की चाबी कहां है?” विजय चौहान ने पूछा।
“च... चाबी तो गार्ड के पास होगी।”
“सड़क पर तुम्हारी ही कार खड़ी है?”
तेजा के जिस्म में पीड़ा की लहरें उछालें मार रही थीं। उसने जवाब देने के बजाय 'हां' में गर्दन हिलाई।
“कार की चाबी कहां है?”
“अ... आप कार की चाबी के बारे में क्यों पूछ रहे हैं?”
“तुम्हें कंधे पर बिठाकर तो मैं हॉस्पिटल जाऊंगा नहीं। तुम्हें हॉस्पिटल ले जाने के लिए कार की जरूरत पड़ेगी। इसलिए तुमसे चाबी के बारे में पूछ रहा हूं।”
“क... कार की चाबी मलखान के पास है।”
“कौन मलखान?”
जवाब में तेजा ने एक लाश की तरफ संकेत किया, फिर बोला——“उसकी जेब से चाबी निकालो और जल्दी से मुझे ले चलो।”
विजय चौहान ने आगे बढ़कर मलखान की लाश की पैंट की जेब से चाबी निकाली, फिर तेजा के करीब पहुंचा और अपनी जेब से रिवाल्वर निकालकर तेजा पर तान दिया।
रिवाल्वर पर नजर पड़ते ही तेजा का चेहरा फक्क पड़ गया। आंखें खौफ से फट पड़ीं।
“अ... आपने मेरे ऊपर रिवाल्वर क्यों तान दिया भाई साहब?” तेजा जोरों से थूक निगलकर बोला।
विजय चौहान के होठों पर धूर्तता भरी मुस्कान नाच उठी। उसके भीतर का शैतान जाग उठा था।
“तुझे बहुत तकलीफ हो रही है तेजा। पीड़ा से तेरा बुरा हाल है। मैं तुझे पीड़ा से छुटकारा दिलाना चाहता हूं। सिर्फ एक गोली तुझे सदा के लिए पीड़ा से निजात दिला देगी। बस मेरे ट्रिगर दबाने की देर है।”
तेजा की आंखें खौफ से और ज्यादा फटने लगीं। चेहरे का बचा-कुचा रंग भी उड़ गया।
“ल... लेकिन आपने तो मुझसे वादा किया था कि आप मुझे हॉस्पिटल पहुंचा देंगे...और अब आप मुझे गोली मारने की बात कर रहे हैं।”
“मैं लोगों से ना जाने कितने वायदे करता हूं, लेकिन पूरा एक भी नहीं करता। मैं दोमुंहा सांप हूं। एक से वादा करता हूं और दूसरे से काट लेता हूं। मैं एक नंबर का हरामी हूं। वायदों की मेरी निगाहों में कोई कीमत नहीं है।”
“य... ये तो धोखा है।” तेजा ने अपने होठों पर जुबान फिराई।
“ये तू कोई नई बात नहीं कह रहा है तेजा बेटे! धोखा देना तो मेरी जन्म कुंडली में लिखा हुआ है। जलालत की जमीन से उपजी धोखेबाजी की पौध हूं मैं। धोखा देते-देते मैं इतना बड़ा हो गया हूं। मैंने धोखेबाजी के मामले में अपने बाप को भी नहीं बख्शा। इसलिए सब मुझे हारामी कहते हैं, अगर तू भी चाहे तो मुझे हारामी कह सकता है।”
पीड़ा से बिलबिलाता तेजा विजय चौहान को देखता रह गया। वो समझ नहीं पा रहा था कि उसके सामने खड़ा शख्स कौन है?
“क... कौन हो तुम?” तेजा ने पूछा।
विजय चौहान के होठों पर मक्कारी भरी मुस्कान नाच उठी——“मैं भी तेरा एक भाई-बंद ही हूं तेजा। यूं समझ हम दोनों एक ही डाल के पंछी हैं।”
“ल लेकिन तुम्हारा नाम क्या है?”
“विजय चौहान।”
“क... कौन विजय चौहान?”
“अरे! हिंदुस्तान के अंडरवर्ल्ड में सिर्फ एक ही हरामी विजय चौहान तो है। क्या तू मुझे नहीं जानता?”
गोलियां लगी होने के बावजूद तेजा यूं उछला मानो उसके सिर पर कोई शक्तिशाली बम फटा हो।
वो भी चाहे छोटी ही सही, लेकिन जुर्म के समुद्र की एक मछली था। विजय चौहान के बारे में उसने काफी कुछ सुन रखा था। उसके सुनने में आया था कि विजय चौहान एक खतरनाक हत्यारा है। उसकी नजरों में इंसानी जिंदगी की कीमत गंदी नाली में रेंगते एक कीड़े से ज्यादा नहीं थी। किसी का भी खून कर देना उसके बाएं हाथ का काम था। रहम नाम का शब्द तो उसके शब्दकोश में था ही नहीं।
आतंक से तेजा की आंखें कगारों तक फटती चली गईं। विजय चौहान के नाम ने ही तेजा के दिल में इतनी दहशत भर दी थी कि उसके होठों से बोल तक नहीं फूटा था।
“अगर तुझे और कुछ पूछना हो तो पूछ ले तेजा।”
“म... मैं और कुछ पूछना नहीं चाहता विजय चौहान।” तेजा गिड़गिड़ाया——“मुझ पर रहम खाओ। मेरी जिंदगी बख्श दो।”
जवाब में विजय चौहान के होठों पर धूर्तता भरी मुस्कान नाच उठी।
“म... मैंने सुना है कि अगर इस दुनिया में तुम्हारा कोई है तो सिर्फ दौलत है! इसलिए तुम बक्से में मौजूद सारी दौलत ले जाओ। मैं उफ् तक नहीं करूंगा, लेकिन मुझे मत मारो।”
“तेरे मरने के बाद ये दौलत तो मेरी हो ही जाएगी। तू मुझे क्या दौलत देगा? तू दर्द से बिलबिला रहा है। तड़प रहा है। मुझसे तेरी ये तड़प देखी नहीं जा रही है। इसलिए मैं तुझे इस तड़प से छुटकारा दिलाकर तेरे ऊपर एहसान ही कर रहा हूं।”
तेजा की घिग्घी बंध गई।
हालत ऐसी, काटो तो खून नहीं।
विजय चौहान ने रिवाल्वर का कुत्ता खींचा।
“न... नहीं!” तेजा चीखा——“मुझे मत मारो।”
उसकी चीख को अनसुनी करते हुए विजय चौहान ने ट्रिगर दबा दिया।
धांय!
गोली सीधी तेजा के माथे में धंसी और खोपड़ी का पृष्ठ भाग फाड़ती हुई पीछे निकल गई।
तेजा का जिस्म जोरों से उछला और वापस उसी जगह गिरकर शांत हो गया।
वो मर चुका था।
विजय चौहान रिवाल्वर की नाल में फूंक मारता हुआ बक्से की तरफ पलट गया। दूसरे क्षण उसने बक्से के ताले को लक्ष्य बनाकर फायर कर दिया।
ताले ने मुंह फाड़ दिया।
विजय चौहान ने रिवाल्वर जेब में रखकर ताला निकाल कर फेंका और बक्से का ढक्कन उठा लिया।
बक्सा पांच-पांच सौ और हजार के नोटों की गड्डियों से खचाखच भरा हुआ था।
विजय चौहान फटी-फटी आंखों से उस दौलत को देखता रह गया।
“जब ऊपर वाला देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है।” विजय चौहान मन ही मन बड़बड़ाया——“वो मुझ जैसे नेक बंधुओं का कितना ध्यान रखता है। उसने बैठे-बिठाए मुझे करोड़ों की दौलत का मालिक बना दिया। वाह! दाता तेरे रंग हजार।”
बड़बड़ाने के साथ ही विजय चौहान ने सतर्क निगाह चारों तरफ घुमाई।
मगर!
वहां उसे कोई नजर नहीं आया था।
अब उसके पास उन लोगों की कार भी थी और दौलत भी थी। उसने सोचा कि वो बक्सा उस कार में रखे और फौरन वहां से फूट ले।
लेकिन अगले क्षण उसे ये विचार अपने दिमाग से निकाल देना पड़ा।
ऐन वक्त पर उसे एक बात सूझ गई थी कि बक्से पर बैंक का नाम लिखा हुआ है, वो बक्सा अपने साथ लेकर चला तो फंस सकता है, क्योंकि अब तक पुलिस ने लुटेरों की तलाश शुरू कर दी होगी।
विजय चौहान नोटों की वो गड्डियां खुले रूप से कार में भी नहीं रख सकता था। वो समझ नहीं पा रहा था कि नोट किस चीज में अपने साथ लेकर जाए?
वो उलझन में पड़ गया।
मगर फिर शीघ्र ही उसने रास्ता तलाश कर लिया था।
विजय चौहान ने उन चारों की खून से सनी कमीजें उतार लीं। उसने जल्दी-जल्दी बक्से से नोटों की गड्डियां निकालीं और उन्हें कमीजों में भरकर गठरी बनाने लगा। शीघ्र ही सारी गड्डियां आसानी से चारों कमीजों में समा गई थीं, जो अब गठरियों की शक्ल में जमीन पर रखी हुई थीं।
विजय चौहान ने जैसे-तैसे करके गठरियां उठाईं और कार की तरफ बढ़ गया। फिलहाल उसे वो गठरियां फूलों से ज्यादा भारी नहीं लग रही थीं।
वो सतर्क निगाहों से दाएं-बाएं देखता हुआ सड़क पर पहुंचा।
सड़क अभी भी सूनी नजर आ रही थी। कार के करीब पहुंचकर उसने गठरियां डिग्गी में रखीं और लपक कर ड्राइविंग सीट संभाल ली। दूसरे क्षण कार कमान से निकला तीर बन गई थी।
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