गोली : Goli
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Description
“मेरे खूबसूरत जिस्म को हासिल करने की एक ही शर्त है...तुम्हें मरना ही पड़ेगा ।” —गोली
“संसार में ऐसी गोली पहली बार तैयार की है ‘देवा ठाकुर’ ने—जिससे बचना नामुमकिन है।”
Goli
Deva Thakur
Ravi Pocket Books
BookMadaari
प्रस्तुत उपन्यास के सभी पात्र एवं घटनायें काल्पनिक हैं। किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से इनका कतई कोई सम्बन्ध नहीं है। समानता संयोग से हो सकती है। उपन्यास का उद्देश्य मात्र मनोरंजन है। प्रस्तुत उपन्यास में दिए गए हिंसक दृश्यों, धूम्रपान, मधपान अथवा किसी अन्य मादक पदार्थों के सेवन का प्रकाशक या लेखक कत्तई समर्थन नहीं करते। इस प्रकार के दृश्य पाठकों को इन कृत्यों को प्रेरित करने के लिए नहीं बल्कि कथानक को वास्तविक रूप में दर्शाने के लिए दिए गए हैं। पाठकों से अनुरोध है की इन कृत्यों वे दुर्व्यसनों को दूर ही रखें। यह उपन्यास मात्र 18 + की आयु के लिए ही प्रकाशित किया गया है। उपन्यासब आगे पड़ने से पाठक अपनी सहमति दर्ज कर रहा है की वह 18 + है।
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गोली
देवा ठाकुर
शोला डेटसन कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा था और गाड़ी की पिछली शानदार सीट पर अण्डीवो एकदम चाक-चौबंद बैठा था। वह गर्दन उठा-उठाकर बार-बार दोनों तरफ की खिड़कियों से दायें-बायें देख लेता और कभी-कभार गर्दन घुमाकर पीछे भी देखता। ऐसा जान पड़ता था, जैसे अण्डीवो शोला का सजग प्रहरी हो। महामाया ने उसकी एक विशेषता बताई थी कि अण्डीवो रास्तों के बारे में खासा तजुर्बेकार है। कौन-सी सड़क ठीक दिशा में जा रही है... किस सड़क से कहां पहुंचा जा सकता है, इसका ज्ञान अण्डीवो को तुरन्त प्राप्त होता था...एक तरह से अण्डीवो सड़कों-पगडंडियों कच्चे रास्तों का इनसाइक्लोपीडिया था।
शोला पहली बार खुली सड़कों पर आया था...उसने फार्महाउस में वर्षों तक घुटन बर्दाश्त की थी। अब महामाया की ओर से उस पर कोई बंदिश नहीं थी। वह जहां जाना चाहे, जा सकता था। शोला ने सबसे पहले दिल्ली के लिए सफर तय करना मुनासिब समझा था अण्डीवो के बताए रास्ते पर चल रहा था। जाते समय महामाया ने उसे एक लाख रूपया खर्चे के लिए दिया था, जो शोला के लिए बहुत था। मोबाइल फोन भी दिया गया था जिसके द्वारा वह पूरे देश में फोन ग्रहण कर सकता था और स्वयं भी जहां चाहे फोन कर सकता था...लेकिन उसके पास वृंदा स्वामी के दिल्ली स्थित आश्रम के अलावा कोई नम्बर नहीं था...उसे फिलहाल किसी फोन नम्बर की आवश्यकता भी नहीं थी ना तो उसका कोई दोस्त था ना दुश्मन! न ही उसे किसी की सहायता लेनी थी...न ही किसी का सहयोगी था
दिल्ली जाने वाले सुपर हाईवे पर उसकी यात्रा बदस्तूर जारी थी।
उसकी कार अस्सी-नब्बे किलोमीटर की रफ्तार से भाग रही थी। कार के शीशे चढ़े हुए थे और कार पूरी तरह ए०सी० थी। कभी-कभी शोला रियर व्यू मिरर में अण्डीवो की तरफ भी देख लेता और मुस्कुरा देता।
“बॉस!” अचानक अण्डीवो की आवाज सुनाई थी——“दाएं तरफ वाले शॉर्टकट रास्ते से कार मोड़ लो...।”
शोला ने चौंककर पीछे देखा...उसने अण्डीवो के मुंह से पहली बार इंसानी आवाज सुनी थी। कोई और इस आवाज को सुनता तो शायद उसे म्याऊं के अलावा कुछ नहीं सुनाई देता। शोला ने इधर-उधर देखा...आवाज पिछली सीट से ही आई थी...और गुर्राती-सी आवाज थी। पिछली सीट पर अण्डीवो के अलावा कोई नहीं था। अण्डीवो उसे ही देख रहा था।
“अण्डीवो...अभी मैंने क्या सुना?”
“बॉस...अब आप मेरी आवाज सुन सकते हैं।” बिल्ले ने फिर इंसानी आवाज में कहा——“मैं अण्डीवो ही बोल रहा हूं।”
¶¶
“माय गॉड...लेकिन तुम मुझे शॉर्टकट के लिए क्यों कह रहे हो?” शोला ने गाड़ी की रफ्तार धीमी करते हुए कहा——“यह सड़क तो सीधी राजधानी की तरफ जाती है...मैंने माइल-स्टोन पढ़ लिया था।”
“वह तो सही है...।”
“फिर क्या बात है?”
“आगे पुलिस ने रोड ब्लॉक कर रखा है। वहां बहुत-सी गाड़ियां रुक गई हैं।”
“वजह क्या है?”
“मैं सिर्फ सड़क ही देख रहा हूं।” अण्डीवो ने कहा—“बड़ी अफरा-तफरी मची हुई है...वे लोग हवाई फायर भी कर रहे हैं...पता नहीं क्या गड़बड़ है...।”
“कोई बात नहीं...देर ही तो हो जाएगी...देख लेते हैं...क्या गड़बड़ है...।”
“जैसी आपकी मर्जी...।”
शोला ने डेटसन की रफ्तार फिर बढ़ा दी। उसी समय बराबर से एक गाड़ी पास हुई, जो सामने से आ रही थी और गाड़ी चालक हाथ के इशारे से शोला को वापस पलटने के लिए कह रहा था...लेकिन शोला ने उसके इशारे पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसकी खिड़की का शीशा अभी बंद था।
दो किलोमीटर और सफर तय करने के बाद ही वह जगह आ गई, जहां पुलिस ने रोड ब्लॉक कर रखा था...वहां फायरों की आवाजें भी आ रही थीं। बहुत से वाहन वहां खड़े थे...कुछ लोग वाहनों से उतर-उतरकर बातें कर रहे थे। सड़क जाम थी...आगे पुलिस की मोबाइलें खड़ी थीं...जो रोड ब्लॉक किए हुए थीं।
शोला कार रोककर नीचे उतर गया। उसका सात फुटा जिस्म...कामदेव का रूप और शानदार पर्सनालिटी को देखते ही लोगों की निगाहें उस पर ठहर गयीं। शोला नीली जींस और सफेद शर्ट पहने हुए था। उसके बाल लम्बे-लम्बे थे...सेंटर में चोटी बंधी हुई थी। शोला की चाल में भी एक अलग आकर्षण था। अण्डीवो कार में ही बैठा था...लेकिन उसकी आंखें बराबर शोला का पीछा कर रही थीं।
शोला वाहनों की जाम के बीच से निकलता आगे बढ़ रहा था...लोगों की निगाहें उस पर ठहरी-ठहरी थीं...बहुत से लोग तो उसे गाड़ियों से उचक-उचक कर देख रहे थे। शोला इन निगाहों से बेखबर उस जगह पहुंच गया, जहां पुलिस की मोबाइल खड़ी थी। एक पुलिस ऑफिसर ने उसे अपनी तरफ आते देखा तो उसने शोला को रुकने का इशारा किया...लेकिन शोला रुका नहीं, सीधा उसके करीब आ पहुंचा।
“मिस्टर...क्या बात है...तुम इस तरफ क्यों आए हो?” ऑफिसर ने पूछा।
“यह जानने के लिए कि रोड ब्लॉक क्यों किया गया है...।”
“क्या तुम्हें गोलियों की आवाज नहीं सुनाई दे रही है?”
“बेशक सुनाई दे रही है...लेकिन यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है...।”
“हम तुम्हारे सवाल का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं हैं...तुम होते कौन हो हमसे सवाल जवाब करने वाले?”
“अगर तुम मेरे सवाल का जवाब नहीं दोगे तो मैं खुद ही आगे बढ़कर सवाल का जवाब तलाश कर लूंगा...।” शोला ने आगे बढ़ने के लिए कदम उठाया...फिर कि पुलिस ऑफिसर ने चीखकर कहा—“रुको...।”
शोला रुक गया।
“बहुत दिलेरी दिखा रहे हो...” वह बोला—“अपनी जवानी पर बड़ा गुरूर है...अगर ऐसा है तो जाकर उन मासूम लोगों की जान बचाओ जो पांच सौ उग्रवादियों के घेरे में घिरे हैं। तुम क्या सोचते हो...हम बेवकूफ है जो यूं ही रोड ब्लॉक किए हुए हैं...अगर रोड खोल दिया गया तो किसी भी गोली का रुख इन गाड़ियों की तरफ हो सकता है...फिर तुम लोग यही चिल्लाओगे कि उग्रवादियों की फायरिंग के बीच गाड़ियों को क्यों पास होने दिया गया...वापस जाओ...देख नहीं रहे हो कि फायरिंग हो रही है...।”
“ऑफिसर! यह पांच सौ उग्रवादी किन मासूमों की जान ले रहे हैं?”
“वह मासूमों की जान नहीं ले रहे हैं...आज के दौर की पॉलिटिक्स का जश्न मना रहे हैं...उन्हें इस कत्लेआम की कोई सजा नहीं मिलेगी...बल्कि उनको इनाम दिया जाएगा...यह हमारे मुल्क की बदनसीबी है यार...क्यों सिर खपा रहे हो...वोट बैंक बनाया जा रहा है...इसलिए तो हमारी पुलिस भी उन्हें रोक नहीं सकती। हमारी पुलिस के पास ऐसे हथियार हैं भी नहीं जो उनके पास हैं...और हमारी तादाद भी पचास से ज्यादा नहीं है...कुछ उस तरफ से रोड ब्लॉक किए हैं...रोड ब्लॉक करने के अलावा हम कर भी क्या कर सकते हैं...वहां एक गांव को उग्रवादियों की आर्मी ने घेरा हुआ है। पचास-सौ लोग मारे जाएंगे...और फिर इन लाशों पर सियासी लोग अपनी रोटियां सेकने आ जाएंगे...छोटी जाति के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए ऊंची जाति वाले मासूमों का कत्लेआम हो रहा है...। बस और कुछ पूछना है...अब जाओ...बड़ा ऑफिसर आ रहा है...।”
“डूब के मर जाओ...।” शोला ने कहा और वापस पलट गया।
“क्या...?”
लेकिन शोला तेज-तेज कदम रखता वाहनों की भीड़ में चला गया। कोई और वक्त होता तो इंस्पेक्टर उसके इस कटाक्ष का जवाब जरूर देता...लेकिन तभी उसका बड़ा ऑफिसर वहां पहुंच गया। उसकी गाड़ी पर मेगा फोन लगा था...लेकिन फिलहाल उसमें कोई अनाउंसमेंट नहीं हो रही थी।
वापस पलटते हुए शोला से लोग तरह-तरह के सवाल कर रहे थे...लेकिन शोला ने किसी का उत्तर नहीं दिया।
एक बारीक-सा सुरीला स्वर उसके कान में पड़ा—“हाय हैण्डसम...।”
लेकिन शोला ने इस सुरीले स्वर को भी नजरअन्दाज कर दिया।
वह अपनी कार में आकर बैठ गया।
“अण्डीवो...भागकर जा और दौड़कर आ...।” शोला ने कहा।
“जाना कहां है और आना कहां है?” अण्डीवो ने पूछा।
“करीब ही कोई गांव है जहां से फायरिंग की आवाज आ रही है। जरा पता करके तो आओ...उग्रवादी वहां क्या कर रहे हैं...न जाने कितनी देर उनका प्रोग्राम चले और हमें यहां रुकना पड़े...। अब तो पीछे भी गाड़ियों की कतार लग गई है, मुड़ना भी नामुमकिन है।”
“मैंने आपसे पहले ही कहा था बॉस...।”
बॉस ने डैश-बोर्ड का एक स्विच दबाया और खिड़की का शीशा खुल गया। अण्डीवो ने छलांग लगा दी और सड़क की बाईं ओर की झाड़ियों में गायब हो गया...।
उसे लौटकर आने में दस मिनट का समय लगा।
“प्रोग्राम काफी लम्बा लगता है बॉस। अभी तो वे लोग घरों से लोगों को खींचकर बाहर निकाल रहे हैं...मुझे लगता है गांव के बीच वाली चौपाल पर उन सबको इकट्ठा करके कत्लेआम होगा। उन्हें तो इसकी भी फिक्र नहीं कि हाईवे पर पुलिस की नाकाबंदी हो चुकी है।” अण्डीवो ने अपनी रिपोर्ट दी।
“चलो फिर...गांव वालों को बचाकर कुछ पुण्य भी कमा लिया जाए...।” शोला ने गाड़ी के इग्नीशन से चाबी निकालते हुए कहा।
“बॉस...वह जबरदस्त हथियारों से लैस हैं...।” अण्डीवो ने कहा।
“हम कौन-सा खाली हाथ हैं...।”
शोला ने डेशबोर्ड का एक खाना खोला...उसमें स्टील प्लेटों से बने दस्ताने रखे थे। यह दस्ताने निनजा ने उसके लिए बनाए थे...निनजा जब उस पर तलवार से हमला करता था तो शोला तलवारों के हमले हथेली से रोककर वार करता था। देखने में यह दस्ताने साधारण लगते थे...स्टील और प्लेटें उनके अंदरूनी हिस्से में थीं। शोला ने इन दस्तानों को पहन लिया, उसके बाद वह गाड़ी से नीचे उतरा...अण्डीवो भी उसके साथ ही उतर गया। गाड़ी के दरवाजे लॉक करने के बाद शोला चल पड़ा।
अण्डीवो उसे रास्ता दिखा रहा था।
“बॉस! क्या पंगा जरूरी है।” अण्डीवो ने एक बार उसे समझाना चाहा।
“पंगे की शुरुआत कहीं ना कहीं से तो होगी ही...।” शोला ने कहा—“मासूमों मजलूम और निर्दोषों की बर्बरता पूर्ण हत्यारों का सिलसिला तो एक जमाने से चला आ रहा है...लेकिन उस मर्द का जीना भी क्या जीना...जिसके सामने यह हो जाए और वह खामोश तमाशाई बना रहे...। फिर यह तो शोला है...मुझे तो धरती पर उतारा ही इसीलिए गया है...। मुझे अपने उस्तादों की नसीहतें याद हैं...तुम्हारे सामने जुल्म हो रहा हो और तुम खामोश रहो...इससे बड़ी कायरता दूसरी कोई नहीं होगी।”
अण्डीवो चुप हो गया। वैसे भी वह बॉस के कामों में दखल नहीं दे सकता था...यह उसका अधिकार क्षेत्र था ही नहीं।
अण्डीवो रास्ता बताता रहा...झाड़-झंकार और उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरते हुए वह खेतों में आ गए। अब चीख-पुकार और इक्का-दुक्का पैरों की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। शोला तेजी के साथ दौड़ पड़ा...वह विलम्ब नहीं करना चाहता था। अचानक एक फायर हुआ और गोली उसके कान के पास से सनसनाती हुई गुजर गयी...लेकिन शोला रुका नहीं, फिर दूसरा, तीसरा फायर...और इस बार शोला के हाथों ने तेजी से हरकत की...उसका एक हाथ सीने के सामने आया और दूसरा दायीं जंघा के पास। दोनों ही गोलियां उसके हाथों से टकराकर छितरा गईं। यह शोला ही था जो फायर की आवाज की और गोली की दिशा मापने का महारथी था।
अब उसने दौड़ते-दौड़ते एक पत्थर उठाया...यह पत्थर भी खासा बड़ा था। उसने पत्थर को पूरी ताकत से फेंका...पत्थर उसके हाथ से तीर की तरह निकला और एक वृक्ष की शाखा में घुस गया। एक चीख गूंजी और एक इंसान राइफल सहित भद्द के साथ पेड़ से जमीन पर गिरा। फिर शोला ने दो पत्थर और फेंके...इसके जवाब में भी दो चीखें गूंजी। वह लोग पेड़ों पर पोजीशन लिए हुए थे।
पास ही ईख का खेत था...शोला ईख के खेत में घुस आया।
आठ-दस आदमी उस तरफ दौड़ते हुए आए। तीन आदमी ढेर पड़े हुए थे परंतु उन्हें ढेर करने वाला नजर ही नहीं आ रहा था। उनमें से एक के पास ए०के०-56 राइफल थी।
“ईख के खेत में घुसकर देखो...।” उसने चीखकर कहा।
अब ईख के खेत में जो भी घुसा, उसके वापस बाहर निकलने का तो मतलब ही नहीं था। वह चार आदमी थे...जो अलग-अलग दिशाओं से खेत में घुसे थे। उनमें से एक की गर्दन तो अण्डीवो ने फाड़ डाली...शेष तीन शोला के हिस्से में आए। एक की दोनों आंखें निकलकर कहीं गिर गईं...जब वह अन्धा होकर अपनी आंखें तलाश करने लगा तो शोला ने उसे उसी स्थिति में छोड़कर दूसरे आदमी की गर्दन तोड़ डाली। तीसरे को उसने हाथों पर उठाया और जब वह नीचे गिरा तो शोला ने एक हाथ से उसका सीना तोड़कर उसका दिल ही बाहर निकाल लिया। शोला ने हथेली पर उस धड़कते दिल को देखा जो फट-फट कर रहा था..। फिर उसे मृत आदमी के फटे सीने में वापस फिक्स कर दिया। लेकिन दिल की धड़कनें बंद हो चुकी थीं।
शोला अब खेत के किनारे उस तरफ पहुंचा जहां बाकि आदमी खड़े थे।
उसने एक मजबूत-सा गन्ना उखाड़ा...उसे काट-छांट कर ठीक किया और फिर ईख को बिल्कुल भाले के अन्दाज में उस व्यक्ति पर फेंक मारा वह ए०के०-56 लिए खड़ा था। उसने हैरत से ईख को अपनी तरफ आता देख फायरिंग कर डाली। उसका मुंह हैरत से खुला हुआ था...और गन्ना उसी खुले मुंह में समा गया। वह चीख मारकर धड़ाम से गिर पड़ा। उसके साथियों ने हड़बड़ाकर पेट के बल लेटकर पोजीशन ले ली।
वहां अब चार आदमी थे और चारों ही पेट के बल लेट गए थे। उनके हाथों में भी गनें थीं...लेकिन बद्हवासी में उन्हें यह ख्याल ही नहीं रहा कि वह किसी चीज की आड़ में नहीं हैं..।
अचानक शोला ने ईख के खेत से ही उछाल मारी। वह हवा में कलाबाजी खाता उनकी तरफ बढ़ रहा था। उनमें से दो ने ऊपर की तरफ गनों का रुख करके गोलियां भी चलाईं परन्तु उसका निशाना बद्हवासी का था...शोला को एक भी गोली छू नहीं पाई। शोला जब जमीन पर उतरा तो उनमें से एक की पसलियां टूट गईं। शोला के पांव उसकी पसलियों पर ही पड़े थे। शोला फिर वहां से उछला और चंद ही लम्हों में उसके पैर दूसरे के सिर से टकराए। उनमें से एक उठकर भाग गया। शोला ने उसकी तरफ कोई भी ध्यान नहीं दिया और तीसरे का भी कल्याण कर दिया।
शोला उनको खत्म करके एक बार फिर ईख के खेत में चला गया।
उसे मालूम था कि भागा हुआ आदमी अपने साथियों को लेकर आएगा और शोला इसी जगह शमशान बनाना चाहता था। उसने कई ईख तोड़ लिए।
गांव से करीब पच्चीस आतंकवादी शोर मचाते...फायर करते उसी तरफ आ रहे थे।
जब वह करीब आ गए तो शोला ने उन पर गन्नों की बौछार कर डाली।
उनके सामने हैरतअंगेज दृश्य था...एक निहत्था आदमी गनों का मुकाबला कर रहा था।
“ईख के खेत में आग लगा दो...।” किसी ने चीखकर कहा।
उनकी संख्या और बढ़ गई थी...वह करीब पचास की संख्या में हो गए। खेत को चारों तरफ से घेर लिया गया और खेत में आग लगा दी गई। शोला अब भी खेत से बाहर नहीं निकला। उसने अपने कपड़े उतारे और अण्डीवो शोला के कपड़े मुंह में दबाकर खेत से बाहर निकल गया।
आग चारों तरफ से लगा दी गई। ईख के खेत में सूखे घास-पत्ते बहुत थे...आग को भड़कने में देर नहीं लगी। वह आग लगाकर खुश हो रहे थे और अपने साथियों की मौत का गम तो भूल ही गए थे। जब आग पूरी तरह प्रचण्ड रूप धारण कर गई तो सब एक जगह इकट्ठा हो गए।
अब शोला ने अपने सम्मोहन का जादू चला दिया।
अचानक उन लोगों ने देखा की आग शांत हो गई है और पूरा खेत जलकर राख हो गया है। इस अग्निकांड के कारण, जो गांव के पिछले हिस्से में हो रहा था...उनके और भी साथी वहां पहुंच गए। वह जानना चाहते थे कि माजरा क्या है...।
“जाओ उसकी लाश उठाकर लाओ।” उनमें से एक ने कहा, जो शायद इस यूनिट का लीडर था—“देखें तो यह साला था कौन...जिसने हमारे इतने सारे आदमी मार डाले।”
दस-पन्द्रह आदमी ईख के खेत में घुस गए। हर चंद का खेत अभी आग की प्रचण्ड लपटों से घिरा था...ऐसी सूरत में वे लोग जो शोला की तलाश करने खेत में घुसे थे, भला वापस कैसे लौटते...उनकी तो चीखें ही सुनाई दे सकती थीं।
जब वह नहीं लौटे तो दूसरी कुमुक भेजी गई। इस दूसरी कुमुक का भी वही हाल होना था।
अचानक एक लम्बा तगड़ा आदमी वहां पहुंचा।
“क्या हो रहा है...तुम लोग यहां क्यों जमा हो गए...हुआ क्या है आखिर...।” आने वाले ने पूछा।
वहां खड़े पहले से मौजूद यूनिट लीडर ने सारा मामला बताया—
“कोई आदमी इधर से हमलावर है तेजाब सिंह...उसने हमारे कई आदमी मार डाले। हमने उसे ईख के खेत में घेरकर आग लगा दी...अब कुछ आदमी उसकी लाश के लिए भेजे तो वह वापस ही नहीं आए। उनकी चीखें सुनाई दीं...।”
“तुम लोग क्या पागल हो गए हो...अरे, अगर तुमने खेत को आग लगाकर उसे जला ही डाला था उसकी लाश का क्या करोगे...हम यहां किस काम से आए हैं...उसे भूलकर यहां एक आदमी को जलाते फिर रहे हो...चलो वापस...हमें फौरन काम खत्म करके लौटना है...।”
उस समय वहां करीब बीस आदमी थे जो तरह-तरह के हथियारों से लैस थे।
शोला ने तेजाब को देखा...यह उसके काम का आदमी था।
उसने मन्त्र पढ़ा और तेजाब जहां था, वहीं चिपक गया। उसने लगातार बीस बार मन्त्र पढ़ा और अब तो बीसों आदमी वहां चिपक गए। उन्हें जमीन ने इस तरह चिपका लिया कि अब वह हिल भी नहीं सकते थे। अब उन्होंने लौटने के लिए कदम उठाने चाहे तो पहिया जाम...।
“य...यह...मेरे पैर उठ क्यों नहीं रहे हैं।” तेजाब ने चीखकर कहा।
“म...मेरे पैर भी...।” एक और शख्स हकलाया।
“म...मेरे पैर भी...।”
अब तो उनके छक्के ही छूट गए।
“अरे ससुर इ का हो गवा...।” उनमें से एक तो रोने ही लगा—“किसी भूत ने हमारे पांव पकड़ लिए हैं...।” वह भूत-भूत चिल्लाने लगा।
इन सबके जेहन में भूत का डर बैठने लगा था और वह सब चीखने चिल्लाने लगे। इस चीख-पुकार का नतीजा यह निकला कि सारे उग्रवादी भाग-भागकर वहां आ पहुंचे और उन्हें जमीन पर छुड़ाने के लिए जोर आजमाइश करने लगे। गांव वालों का कत्लेआम करना तो यह लोग भूल ही गए थे। यहां तो एक नई आफत खड़ी हो गई थी...जिसका कोई भी हल उनकी बन्दूकों के पास नहीं था।
जो चिपक गए थे, उनमें से कुछ तो रोने ही लगे। उनके ख्याल से उन्हें भूत ने पकड़ लिया था।
चारों तरफ अजब शोर मचा हुआ था...तरह-तरह के उपाय सुझाए जा रहे थे। गांव के कुछ लोग अपनी छतों पर चढ़कर यह तमाशा देखने लगे। गांव में अभी भी एक दर्जन उग्रवादी मौजूद थे। पहले वह तादाद दो सौ के करीब थी। अब गांव वालों को घर से निकाल-निकाल कर बाहर लाने वाला कोई नहीं था। उग्रवादी खुद मुसीबत में फंस गए थे।
शोला ने अपने जिस्म पर राख मली...भभूत इस तरह मल दिया कि वह सिर से पैर तक नंग-धड़ंग अघोरी लगने लगा। उसने अपनी जटा खोल दी। चेहरा भी राख से सफेद कर लिया।
अब वह उनकी निगाहों से बचकर दूसरी तरफ से बाहर निकला। वैसे भी उनका ध्यान ईख के खेत की तरफ नहीं था। वह तो अपने आदमियों के पैरों पर इस तरह ताकत लगा रहे थे, जैसे रावण के दरबार में कई सारे अंगद आ गए हों...और रावण की फौज उनके पैर उठाने की कोशिश में पसीना-पसीना हो रही हो।
“बम बम भोले...बम बम भोले...जय महाकाली...परकाली...कलकत्ते वाली...तेरा वार ना जाए खाली...।” उन्हें यह आवाज सुनाई दी।
पलटकर देखा तो एक नंग-धड़ंग अघोरी दिखाई दिया...जो कूदता-फांदता उन्हीं की तरफ आ रहा था। उसे देखकर कुछ ने तो बन्दूकें तानीं...कुछ ने हाथ जोड़ लिए...लेकिन बोला कोई कुछ नहीं। नंग-धड़ंग शोला देखते-देखते उनके पास आ गया।
“कहां गया...कहां छिप गया कठोर...।” शोला चारों तरफ किसी को खोजता फिर रहा था।
“ऐ! तू कौन है बे...।” एक ने शोला की तरफ बन्दूक तान दी।
“भूभभेला...भूभभेला...मूर्ख उस खिलौने को एक तरफ फेंक दे...मुझे काले बामन को तलाश करने दे...मेरे हाथ से निकल भागा...।”
“काला बामन...।” वे लोग एक दूसरे की तरफ देखने लगे।
“मैंने तो उसे बड़ी मुश्किल से श्मशान में पकड़ा था...वह इसी तरह भागकर आया है...।”
“मगर वह काला बामन है कौन...और तुम...?” एक और उग्रवादी ने पूछा।
उस पर गोली चलाने का साहस तो किसी में रहा ही नहीं।
“मैं भूभभेला हूं...काला बामन एक भूत है...मैं शमशान से उसके पीछे-पीछे भागता आया हूं...।” फिर भू-भवेला ने चौंककर ईख के खेत की तरफ देखा—“अरे...यह आग किसने लगाई।”
सबने मुड़कर देखा...और सब हैरान रह गए...ईख के खेत की आग बुझी नहीं थी। वहां तो अब भी शोले दहक रहे थे।
“महाराज...।” एक उग्रवादी शोला के पैरों में गिर पड़ा—“यह आग तो बुझ गई थी।”
“मूर्खों...वह सब काले बामन का खेल है...यह जब चाहे आग लगा दे...जब चाहे बुझा दे...और जिसको चाहे चिपका दे...।”
“महाराज...उस काले बामन भूत ने हमारे आदमियों को चिपका दिया है..।” एक और आदमी ने शोला के पांव पकड़ लिए—“कुछ कीजिए महाराज...।”
“कोई बात नहीं...मैं उसकी सारी काट जानता हूं...लेकिन ऐसे नहीं...।”
“फिर कैसे महाराज...?”
“तुम लोगों ने काले बामन को परेशान तो नहीं किया...उस पर गोलियां तो नहीं चलाईं...जरूर तुमने उसका रास्ता रोका होगा...तभी तो तुम्हारा यह हाल हुआ है...।”
“अब क्या करें महाराज...।”
“धूनी लगाई जाएगी...धूनी से काले बामन को खुश किया जाएगा...जब वह मस्त होकर सामने आ जाएगा तो फिर उससे क्षमा मांग लेना...फिर तुम सब छूट जाओगे...।”
आनन-फानन में धूनी की व्यवस्था कर दी गई। उपलों का ढेर लगाया गया और उसे जलाया जाने लगा। शोला वहीं जमकर बैठ गया और ना जाने क्या-क्या मन्त्र पड़ता रहा।
“आ जा...आजा काला बामन...खुश होके आ जा...आ जा...अण्डीवो...मस्त हो कर आ जा...सब क्षमा मांगने के लिए तैयार हो रहे हैं...। ये तुम सब बन्दूकें नीचे फेंक दो...और अब धूनी के आसपास बैठ जाओ।”
बन्दूकें फेंकी जाने लगीं। सब खामोशी से बैठ गए।
“आ गया....आ गया...।”
अब जो काला बामन आया, वह और कोई नहीं अण्डीवो था। अण्डीवो के मुंह में शोला के कपड़े दबे थे।
“अबे...खा गया आदमियों को...कपड़े बाहर रह गए...आदमी अन्दर...कपड़े बाहर...।”
लोग हैरानी से इस कद्दावर बिल्ले को देख रहे थे।
“चल माफ कर दे इन्हें...।”
अचानक जो लोग चिपक गए थे, उनके पैर उठने लगे...।
“तुम लोग यहां से अभी हिलना नहीं।” शोला ने कहा—“धूनी को सूंघते रहो...जब तक हम पांच कोस दूर न चले जाएं...कोई नहीं मिलेगा...।”
शोला ने बिल्ले से कपड़े ले लिये और फिर कपड़ों की एक जेब से एक डिबिया निकाली। उसका पाउडर उपलों पर छिड़क दिया...उसके बाद उसने जलते उपले इधर-उधर बिखेर दिए। पाउडर के गिरने से धुंआ तेज हो गया था और चारों तरफ धुआं ही धुआं फैल गया था।
शोला बिल्ले के साथ गांव की तरफ चल पड़ा।
फिर वह एक झाड़ी में जा घुसा। झाड़ी से बाहर निकला तो ड्रेसअप हो गया था। वह गांव के अन्दर चौपाल पर जा पहुंचा।
“गांव वालों...बाहर निकलो...अब क्या देख रहे हो...यहां सिर्फ एक दर्जन आदमी हैं...।” शोला एक मकान की छत पर था। उसके हाथों में कुछ पत्थर थे—“मार डालो...इन सबको...उनकी मदद के लिए कोई नहीं आएगा।”
इतना कहकर शोला ने पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। पत्थर उस निशाने पर पड़ रहे थे। अब क्या था...उन पर चारों तरफ से पत्थर बरसने लगे। उनमें से चार के पास ही गनें थीं। शोला ने पहले उन्हीं को निशाना बनाया था। बाकी के हाथ में तो लाठी डण्डे...फरसे...तलवार थीं।
गांव में एक शोर उठा और लोग चारों तरफ से लाठी-डण्डे, फरसे, सरिये लिए उनके ऊपर टूट पड़े। उधर धुएं की चपेट में आए उग्रवादी चकरा-चकराकर गिर रहे थे। यह धुआं बेहोशी की गैस थी।
“जाओ...उग्रवादियों के हथियार अपने कब्जे में कर लो...।” शोला ने कुछ जोशीले नौजवानों से कहा और खुद गांव के एक कुएं पर पहुंच गया। उसने कुएं की डोल से पानी निकाला...कपड़े उतारे और स्नान करने लगा।
स्नान के बाद कपड़े पहने और उसी रास्ते से लौट गया जिस रास्ते से वह यहां तक पहुंचा था। वह अपनी कार में आकर इत्मीनान से बैठ गया।
कुछ ग्रामवासी उस जगह भी पहुंच गए थे जहां पुलिस की कुमुक मौजूद थी...लेकिन पुलिस उग्रवादियों के डर से आगे बढ़ने को तैयार नहीं थी। जब गांव वालों ने बताया कि उन्होंने उग्रवादियों पर काबू पा लिया है तो पुलिस के जवानों में जोश भर गया...और वह गांव की तरफ बढ़ने लगे।
बाद में शोला को पता चला कि वह बिहार स्टेट का एक गांव है...और यहां नेताओं ने अपनी पर्सनल सेनाएं बनाई हुई हैं...कभी अगड़ी जाति वाले मारे जाते हैं...कभी पिछड़ी जाति वाले...और जो मारे जाते हैं...वे निर्दोष लोग भोले-भाले ग्रामीण होते हैं। उनका कसूर सिर्फ इतना होता है कि कोई अगड़ी जाति का है तो कोई पिछड़ी जाति का।
जाम खुलने के बाद एक बार फिर शोला की कार द्रुत गति से दौड़ने लगी।
“हमारे मुल्क में बहुत बीमारियां पैदा हो गई हैं...।” शोला ने रास्ते में कहा।
अण्डीवो ने शोला की इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया...वह सीट पर बैठा-बैठा ऊंघ रहा था।
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Additional information
Book Title | गोली : Goli |
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Isbn No | |
No of Pages | 254 |
Country Of Orign | India |
Year of Publication | |
Language | |
Genres | |
Author | |
Age | |
Publisher Name | Ravi Pocket Books |
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