Goli Maro Aashiq Ko : गोली मारो आशिक को
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Description
यह इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजिये
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है ...
और वो दोनों सचमुच इश्क में इस क़दर डूब गये कि उन्हें किसी का डर नहीं रहा। गब्बर खान का भी नहीं- जो उनके इश्क का सबसे बड़ा दुश्मन था। वह जो माशूका थी- उसकी बेटी थी, मगर आशिक के लिए उसका फरमान था - गोली मारो आशिक को।
गोली मारो आशिक को- यह फरमान सदियों से चलता आ रहा है, लेकिन युवा आशिक इसकी कब परवाह करते हैं! पुरानी और नयी पीढ़ी में हमेशा गतिरोध बना रहता है, और यही गतिरोध, समाज में बदलाव लाता है - कभी अच्छा और कभी बुरा! प्रस्तुत उपन्यास का ताना-बाना भी कुछ इसी प्रकार का है, जिसमें समाज के भेड़ियों व जुर्म के पुजारियों तथा समाज के रक्षकों व युवा पीढ़ी का संघर्ष, विद्रोह और सत्य की जीत को पेश किया गया है। उपन्यास का कसा हुआ कथानक, तेजाबी संवाद और प्यार मुहब्बत का नशा... आपको अपने सम्मोहन में बांधे रखेगा।
प्रस्तुत उपन्यास के सभी पात्र एवं घटनायें काल्पनिक हैं। किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से इनका कतई कोई सम्बन्ध नहीं है। समानता संयोग से हो सकती है। उपन्यास का उद्देश्य मात्र मनोरंजन है। प्रस्तुत उपन्यास में दिए गए हिंसक दृश्यों, धूम्रपान, मधपान अथवा किसी अन्य मादक पदार्थों के सेवन का प्रकाशक या लेखक कत्तई समर्थन नहीं करते। इस प्रकार के दृश्य पाठकों को इन कृत्यों को प्रेरित करने के लिए नहीं बल्कि कथानक को वास्तविक रूप में दर्शाने के लिए दिए गए हैं। पाठकों से अनुरोध है की इन कृत्यों वे दुर्व्यसनों को दूर ही रखें। यह उपन्यास मात्र 18 + की आयु के लिए ही प्रकाशित किया गया है। उपन्यासब आगे पड़ने से पाठक अपनी सहमति दर्ज कर रहा है की वह 18 + है।
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गोली मारो आशिक को
उस समय प्रातः के चार बजे थे— जब अपने शानदार बेडरूम में सो रहे अंडरवर्ल्ड के बेताज बादशाह गब्बर खान की नींद टूट गई। उसकी नींद अनायास ही नहीं टूटी थी। बल्कि उसके कानों के पर्दों से कोई आहट टकराई थी। गब्बर खान को यह समझते देर ना लगी कि बेडरूम के बाहर कोई है— परंतु कौन....?
रात्रि दस बजे के बाद से प्रातः सात बजे तक उसके बैडरूम के आसपास कोई इंसान तो क्या, मच्छर तक को फटकने की इजाजत नहीं थी। फिर यह आहट— अवश्य कोई है....!
अपने बेड पर पीठ के बल चित्त लेटे पड़े अंडरवर्ल्ड किंग की पलकें आंखों पर से हटीं। तभी उसे लगा, जैसे रूम के बाहर कोई दबे पांव चला हो।
बाहर अवश्य कोई है। बिजली की सी तेजी से गब्बर खान के दिमाग में यह वाक्य कौंधा।
“बाहर कौन है?” वह चीखा और फिर तकिए के नीचे से रिवॉल्वर निकाल कर वह भयानक तेजी से बेडरूम के दरवाजे पर झपटा।
तभी बाहर किसी के हड़बड़ाकर भागने का स्वर उभरा।
दरवाजा खोलकर गब्बर खान बाहर निकला।
बाहर बालकनी में अंधेरा था— परंतु नीचे हॉल में उजाला था।
भागने वाले के कदमों की आहट तक शांत थी।
बालकनी की रेलिंग पर पहुंचकर हॉल में देखता हुआ गब्बर खान हलक फाड़कर चीखा— “पकड़ो उसे— कौन था वह....? बंगले से बाहर न निकलने पाए।”
देखते-ही-देखते बीसियों गनमैन हॉल में नजर आने लगे।
कई बालकनी में भी पहुंच गए।
सारा बंगला प्रकाश में नहा गया।
गब्बर खान की पत्नी जकिया खातून, बेटी कैटरीना और बेटा अरबाज खान भी हड़बड़ाये से बालकनी में आ पहुंचे।
सब के चेहरों पर एक ही सवाल था— “क्या हुआ?” परंतु सीधे गब्बर खान से पूछने की हिम्मत किसी की ना थी।
एकाएक ही कहीं से एक चीख भरी तेज आवाज उभरी— “पकड़ो उसे.....वह बंगले की छत पर है।”
¶¶
उसकी आंखों में मौत का भय साफ दिखाई पड़ रहा था। प्राण बचाने के लिए इस समय वह हर वह प्रयास कर रहा था, जो सामान्य अवस्था में नहीं कर सकता था।
चीख भरी तेज आवाज उसके कान में भी पड़ी। वह समझ गया कि किसी ने उसे बंगले की छत पर देख लिया है।
बंगले की छत काफी लंबी चौड़ी थी।
वह अंधाधुंध एक तरफ भागा।
जहां बंगले की छत समाप्त हुई, वहां सामने एक दूसरी छत थी, मगर वह काफी नीचे थी।
मौत की परवाह न करके उसने नीची छत पर छलांग लगा दी।
ठीक उसी समय— ‘धांय़....धांय....धांय धांय़....धांय....धांय’!
गोलियों की एक बाढ़-सी उसके पीछे लपकी। परंतु इससे पूर्व कि गोलियां उसे स्पर्श करतीं, वह नीचे छत पर जा गिरा। फिर वह तीव्र फुर्ती से उठा और छत की मुंडेर की तरफ भागा।
इधर वह मुंडेर पर पहुंचा, उधर कमरे की छत की मुंडेर पर छह गनधारी वहां नजर आए, जहां से उस साये ने छलांग लगाई थी।
“वह रहा....।” बंगले की छत से एक गनधारी चीखा।
उसी समय साया मुंडेर पकड़कर नीचे लटका और उसने मुंडेर छोड़ दी। पीछे से फिर गोलियां चलीं, मगर व्यर्थ....! एक भी गोली छू तक न सकी उसे।
“पकड़ो उसे! बचकर जाने ना पाए...।” फिर कोई चीखा।
इधर मुंडेर छोड़ते ही साए के पैर कच्ची धरती से टकराए। वह शायद गब्बर खान के बंगले के पास वाले मकान का लॉन था।
धरती से टकराते ही साये ने पलट कर पीछे देखा।
पीछे कम लंबाई वाले वृक्ष खड़े थे। थोड़ी ही दूर बाउंड्री थी।
चंद्रमा के प्रकाश में सब कुछ दिखाई दे रहा था।
साया बेतहाशा बाउंड्री की ओर दौड़ा।
¶¶
बंगले की मुंडेर पर खड़े गनधारियों ने भी पास वाली छत पर छलांग लगाई तथा तेजी से मुंडेर की ओर दौड़े।
इधर गनधारी मुंडेर पर पहुंचे, उधर साया बाउंड्री लांघ गया।
एक गनधारी चीखा— “वह हरिदत्त के मकान की बाउंड्री फांद कर भाग रहा है। उसे पकड़ो।” इसी के साथ उस गनधारी ने सीधे लॉन में छलांग लगाई और बाउण्ड्री की ओर दौड़ पड़ा।
शेष गनधारी उसके पीछे थे।
इसी क्षण वातावरण में एक मोटरसाइकिल के स्टार्ट होने और फिर उसके दौड़ने की आवाज ऊभरी।
पलक झपकते ही सारे गनधारी बाउंड्री के बाहर रोड पर थे। उन्होंने साये को एक मोटरसाइकिल पर सवार अपनी गन्स की रेंज से बाहर होते देखा।
वे कसमसा कर रह गए।
दो क्षण भी नहीं बीते थे कि छः मोटरसाइकिलें वहां आकर रुकीं। एक मोटरसाइकिल सवार ने पूछा— “किधर गया?”
“उधर....।” रोड पर मौजूद एक गनधारी जल्दी से कह उठा। उसके हाथ का रुख उस ओर था, जिधर वह साया गया था।
मोटरसाइकिल सवारों की मोटरसाइकिलें उस तरफ उड़ चलीं, जिधर गनधारी ने संकेत किया था।
प्रत्येक मोटरसाइकिल पर पीछे एक-एक गनधारी बैठा था। देखते-ही-देखते उन मोटरसाइकिलों की रफ्तार नब्बे को पार करने लगी थी।
¶¶
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Additional information
Book Title | Goli Maro Aashiq Ko : गोली मारो आशिक को |
---|---|
Isbn No | |
No of Pages | 318 |
Country Of Orign | India |
Year of Publication | |
Language | |
Genres | |
Author | |
Age | |
Publisher Name | Ravi Pocket Books |
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