राजा ठाकुर
अनिल सलूजा
“योर आनर। आज का मुकदमा ऐसा है—जिसमें अगर फरियादी को इंसाफ नहीं मिला तो बेटे का बाप से, नौकर का मालिक पर से—भाई का भाई पर से—दोस्त का दोस्त पर से और हर मातहत का उसके बॉस पर से विश्वास उठ जायेगा।” काले रंग का चोंगा पहने एडवोकेट विश्वास कदम ने एक गहरी सांस छोड़ी—फिर कटघरे में खड़े, सिर को झुकाये—आंखों में आंसू भरे व्यक्ति की तरफ बढ़ते हुए उंगली से उसकी तरफ इशारा यह—यह पुरुषोत्तम है मी लार्ड—हवलदार पुरुषोत्तम—तिलक नगर थाने में तैनात था यह—मगर अब घर में बैठा हैं क्योंकि यह सस्पेण्ड चल रहा है और इसके सस्पेण्ड होने की वजह यह है कि इसने अपने ही थाने के एस०एच०ओ० इंस्पेक्टर शेखर गुरेरा”—उसने सामने वाले दूसरे कटघरे में खड़े इंस्पेक्टर शेखर की तरफ उंगली भाले की तरह सीधी की—“पर इल्जाम लगाया है कि उसने इसकी पत्नी के साथ बलात्कार किया है...।”
“मेरे फाजिल दोस्त ने शायद हवलदार पुरुषोत्तम के सस्पेण्ड होने का कारण नहीं पढ़ा।” तभी एडवोकेट कुलकर्णी अपनी कुर्सी से खड़े होकर बोला—“मी लार्ड—पुरुषोत्तम ने ड्यूटी के वक्त शराब पीकर शराब के ठेके के सामने न केवल हंगामा किया था, बल्कि वहां शराब खरीदने आये दो व्यक्तियों से पैसे भी छीन लिये थे। इसी वजह से पुरुषोत्तम को सस्पेण्ड किया गया था। सो सस्पेण्ड होने का इस केस से कोई ताल्लुक नहीं बैठता। यह मुकदमा सिर्फ बलात्कार के आरोप का है—जो कि पुरुषोत्तम ने मेरे मुवक्किल पर लगाया है और यह आरोप इसलिये लगाया गया है क्योंकि मेरे मुवक्किल शेखर गुरेरा ने उसे सस्पेण्ड किया था। अगर शेखर गुरेरा पुरुषोत्तम को सस्पेण्ड न करता तो मेरे मुवक्किल पर यह इल्जाम भी न लगता।”
“मैं अपने फाजिल दोस्त से यह पूछना चाहता हूँ कि क्या मुलजिम शेखर गुरेरा सस्पेण्ड की वजह के कालम में यह लिखता कि पुरुषोत्तम ने उस पर यह घिनौना इल्जाम लगाया है—इसलिये उसे सस्पेण्ड किया जा रहा है। नहीं मी लार्ड—ऐसा तो लिखा ही नहीं जा सकता था। सो सस्पेण्ड करने के लिये कोई न कोई बहाना तो चाहिये न। सो उस पर शराब पीकर हंगामा करने और दो लोगों को लूटने का झूठा इल्जाम लगा दिया।”
“यह झूठ है मी लार्ड। पुरुषोत्तम के सस्पेण्ड होने की वजह वही है जो बताई गई है। हालांकि सस्पेण्ड होने का इस मुकदमे से कोई ताल्लुक नहीं—फिर भी मैं अपने क्लायंट शेखर गुरेरा को सच्चा साबित करने के लिये शराब के ठेके पर मौजूद नौकर तथा उन दो व्यक्तियों को बुलाना चाहता हूं जिसके सामने इसने—।” उसने पुरुषोत्तम की तरफ इशारा किया—“हंगामा किया और उनके पैसे छीने।”
“इजाजत है।”
मजिस्ट्रेट का भारी स्वर अदालत में गूंजा।
“थैंक्यू मी लार्ड।”
¶¶
“तुम्हारा नाम?”
कुलकर्णी कटघरे में खड़े दुबले से लड़के के करीब खड़े हो उसे घूरते हुए बोला—
“सोनी।” बीस-बाईस साल का वह लड़का उसकी तरफ देखते हुए बोला।
“मेरी तरफ नहीं—जज साहब की तरफ देखकर बोलो।”
कुलकर्णी ने मजिस्ट्रेट की तरफ इशारा किया।
“सोनी।” वह लड़का मजिस्ट्रेट की तरफ देखते हुए बोला।
“क्या काम करते हो?” कुलकर्णी ने पूछा।
“शराब के ठेके पर नौकरी करता हूं।”
“किस जगह पर है ठेका?”
“कुहानी रोड पर।”
“उसे जानते हो?” कुलकर्णी ने सामने कटघरे में खड़े पुरुषोत्तम की तरफ इशारा किया।
सोनी ने उधर देखा और बुरा मुँह बनाया।
“इसे कैसे भूल सकता हूं साहब! तीन दिन पहले इसने ठेके के सामने जो हंगामा किया था—बस पूछो मत।”
“अदालत को सारी बात बताओ—क्या हंगामा किया था इसने?”
सोनी ने एक बार सामने कटघरे में खड़े पुरुषोत्तम को देखा, फिर पुन: मजिस्ट्रेट की तरफ देखते हुए कहने लगा—
“तीन दिन पहले यह हवलदार साहब ठेके पर आये थे। आते ही इन्होंने अध्धा मांगा। मैंने अध्धा देकर पैसे मांगे तो पैसे देने की बजाये इसने अध्धा खोला और वहीं खड़े-खड़े ही गटक गये।” उसने मुट्ठी बन्द कर मुँह से लगाते हुए गर्दन पीछे को मोड़ते हुए शराब पीने वाली मुद्रा बनाई।
“एक ही सांस में पी गया अध्धा?” कुलकर्णी ने हैरानी से पूछा।
“हां साहब।” सोनी ने उसे देखते हुए कहा।
“फिर?”
“अब पैसा कहां मांगता मैं। मैं तो ऊपर वाले से यही दुआ करने लगा कि यह यहाँ से दफा हो।” उसने पुरुषोत्तम की तरफ इशारा किया—“ऊपर वाले ने मेरी सुन ली और यह वहां से हटकर सड़क किनारे खड़ी रेहड़ी के पास गया और वहां से नमकीन उठा कर खाने लगा।”
“फिर?”
“तभी मेरे पास पांच-सात ग्राहक आ गये और मैं उन्हें निपटाने लगा। अभी मैं ग्राहक निपटा ही रहा था कि इसके जोरों से चिल्लाने की आवाजें सुनकर मैं इसे देखने लगा। यह रेहड़ी पर आये दो लोगों पर चीख रहा था। एक को तो इसने थप्पड़ ही मार दिया और फिर मेरे सामने ही इसने दोनों से पैसे लिये थे। तब तक वहां काफी भीड़ हो गई थी—सो यह भीड़ पर ही बरसने लगा।”
कहकर सोनी चुप हुआ तो कुलकर्णी ने एक गहरी सांस छोड़ी और मजिस्ट्रेट की तरफ देखते हुए बोला—
“सरकार ने इसे वर्दी इसलिये दी थी मी लार्ड कि यह कानून की रक्षा कर सके लेकिन इसने तो वर्दी का नाजायज फायदा उठाना शुरू कर दिया। ऐसे में इसे सस्पेण्ड करके मेरे मुवक्किल ने क्या गुनाह कर डाला—।”
कहकर उसने कुर्सी पर बैठे एडवोकेट विश्वास कदम की तरफ देखा।
“योर विटनेस प्लीज।” वह मुस्कुराया।
“नो क्वैश्चन।” थोड़ा-सा उठ कर विश्वास कदम पुन: कुर्सी पर बैठ गया।
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“तुम्हारा नाम।” कुलकर्णी कटघरे में खड़े युवक से बोला।
“मेला राम।” वह युवक जो कि कपड़ों से ग्रामीण नजर आता था, बोला।
“तुम्हारे साथ क्या हुआ था?”
मेला राम ने कटघरे में खड़े पुरुषोत्तम को देखा और फिर मजिस्ट्रेट की तरफ देखते हुए पुरुषोत्तम की तरफ बांह लम्बी करते हुए बोला—
“म्हारी जेब में एक सौ नब्बे रुपये थे जी। सारे के सारे इन्ने (इसने) खोस लिये।”
“क्यों?”
“क्यों के होवे। पुलिस वाला तो कुछ भी कर सके। म्हारे ते (से) म्हारी जान छीन सके से। शुक्र सै राम जी का जो इसने म्हारी जान नहीं—पीसे (पैसे) छीने।”
“क्या करने गये थे तुम वहां?”
“दारु पीन खातर गया था। वहीं सी (से) पव्वा लिया अर (और) रेहड़ी ते नमकीन लेन खातर पहुंच गया। बस यू चढ़ दौड़ा मेरे पे—अर मेरी जेबें खाली करवा लीं।”
“ठीक है। तुम जाओ।”
मेला राम ने मजिस्ट्रेट को हाथ जोड़े और पीछे हट कर कटघरे से बाहर निकल गया।
शीघ्र ही उसके स्थान पर एक बढ़े हुए पेट वाला आदमी खड़ा था। जिसने अपना नाम हेमराज बताया।
“तुम्हारे साथ क्या हुआ था?” कुलकर्णी ने पूछा।
हेमराज ने गहरी सांस छोड़ी और बोला—
“मेरी तो इज्जत ही उतारकर रख दी थी इसने साहब।”
“कैसे?”
“मेरे जीजा ने हजार का नोट देकर मेरे को बोतल लाने के लिये भेजा था लेकिन इसने तो मेरे को बोतल ही नहीं लेने दी—हजार का नोट ही छीन लिया मेरे से। जाकर मैंने जीजा को सारी बात बताई तो उसने मेरे को बुरा भला कहते हुए यह कहा कि हजार रुपया मैं पार कर गया हूं। आप ही सोचो वकील साहब—उस वक्त मेरे पर क्या बीती होगी...।
इज्जत बचाने का तब मेरे को एक ही रास्ता नजर आया और मैंने वही अपनाया—मैंने बड़े साहब से जा के शिकायत कर दी—वो मौके पर मेरे साथ आये और इसे अपने साथ ले गये।”
कुलकर्णी ने हल्की-सी मुस्कान के साथ विश्वास कदम की तरफ देखा।
विश्वास कदम ने गहरी सांस छोड़ी और कुर्सी से खड़ा होते हुए धीर-गम्भीर लहजे में बोला—
“मी लार्ड—मेरे क्लाइंट का ठेके पर पहुंच कर शराब पीना—फिर हंगामा करना और पैसे छीनना—यह सब झूठ है। यह सारे गवाह खरीदे गये हैं क्योंकि पुरुषोत्तम शराब पीता ही नहीं। जब यह शराब पीता ही नहीं—तो फिर यह ठेके पर जायेगा ही क्यों?”
“लगता है मेरे फाजिल दोस्त—” कुलकर्णी टेबल की तरफ बढ़ा—“या तो खुद झूठ बोल रहे हैं या फिर उनके मुवक्किल ने उन्हें अंधेरे में रखा है। यह...।” उसने टेबल पर रखी फाईल में से एक कागज निकालकर उसे ऊंचा उठा कर लहराते हुए मजिस्ट्रेट की तरफ कदम बढ़ाया—“डॉक्टर की बनाई वो मेडिकल रिपोर्ट है जिसमें साफ लिखा गया है कि पुरुषोत्तम ने तब शराब पी रखी थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर ही तो इंस्पेक्टर शेखर ने पुरुषोत्तम को सस्पेण्ड किया था। ड्यूटी के वक्त शराब पीना-शराब पी कर बहकना। बहककर हंगामा करना और लोगों के पैसे छीनना—क्या यह होता है पुलिस का कर्तव्य?”
“य...यह झूठ है जज साहब।” तभी पुरुषोत्तम चीख उठा—“मैंने जिन्दगी में कभी शराब नहीं पी।”
“तो फिर तो सरकारी डॉक्टर झूठा हुआ मी लार्ड—जिसने पुरुषोत्तम की रिपोर्ट तैयार की थी।”
“लेकिन—।”
“बलात्कार के केस में सस्पेन्शन को न जोड़ा जाये।” तभी मजिस्ट्रेट पुरुषोत्तम की बात काटते हुए बोले।
पुरुषोत्तम के साथ-साथ विश्वास कदम का चेहरा भी उतर गया—जबकि कुलकर्णी के चेहरे पर विजयी चमक नाच उठी और होंठ थोड़े फैल गये।
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“मी लार्ड।” विश्वास कदम अपनी आवाज में भारीपान लाते हुए बोला—“आरोपी शेखर गुरेरा ने न केवल मेरे क्लायंट की पत्नी सीता देवी के साथ बलात्कार किया बल्कि उसे आत्महत्या के लिये मजबूर भी कर दिया। शेखर गुरेरा पर दो केस बनते हैं—एक रेप का केस दफा तीन सौ छिहत्तर—दूसरा आत्महत्या के लिये मजबूर करने का केस दफा तीन सौ छह।”
“मेरे फाजिल दोस्त के सिर्फ कह देने भर से मेरे मुवक्किल पर केस नहीं बन जाता मी लार्ड। उन्हें साबित करना होगा कि मेरे मुवक्किल ने वाकई सीता देवी के साथ रेप करके उसे आत्महत्या के लिये मजबूर किया।”
कुलकर्णी पुरजोर लहजे में बोला।
“मी लार्ड!” विश्वास कदम बोला—“तेइस मार्च की रात को दस बजे मुलजिम शेखर गुरेरा ने जानबूझकर पुरुषोत्तम की डयूटी विजय चौक पर लगाई और यह कहा था कि वह दो बजे तक वहां ड्यूटी देगा। दो बजे उसकी जगह हवलदार देवकी प्रसाद वहां ड्यूटी देने पहुंचेगा। उसके बाद ही पुरुषोत्तम घर जा सकेगा मगर हकीकत में शेखर गुरेरा, पुरुषोत्तम को उसके घर से दूर रखना चाहता था क्योंकि इसके दिल में मैल था। रात बारह बजे के करीब शेखर गुरेरा पुरुषोत्तम के घर में जबरदस्ती घुसा और सीता देवी से जानवरों की तरह सलूक करते हुए उससे बलात्कार किया और अपनी जीत पर झूमते हुए चला गया।
रात ढाई बजे पुरुषोत्तम अपने घर आया तो उसका सब कुछ लुट चुका था। सीता देवी की आबरु लुट चुकी थी और उसने जहर खा लिया था। उस वक्त वह अपनी अन्तिम सांसें ले रही थी—जब पुरुषोत्तम वहां पहुंचा था।
मरने से पहले उसने बस इतना ही कहा कि उसके साथ शेखर गुरेरा ने रेप किया है—और इतना कहकर वह स्वर्ग सिधार गई।
“मुझे सीता देवी की मौत पर सख्त अफसोस है मी लार्ड और मैं यह भी मानता हूं कि सीता देवी के साथ रेप हुआ था, जिसके सदमे को बर्दाश्त न करते हुए वह खुदकुशी करने को मजबूर हो गई—और मैं यह भी चाहूंगा कि बलात्कारी को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिये लेकिन मी लार्ड सीता देवी के साथ रेप मेरे क्लायंट शेखर गुरेरा ने नहीं किया। किसी और ने सीता देवी की इज्जत लूटी थी। पता नहीं क्यों पुरुषोत्तम अपने ही अफसर पर रेप का इल्जाम लगा रहा है।”
“यह इल्जाम नहीं—सच है मी लार्ड।”
“यह सच नहीं है। मेरे मुवक्किल ने सीता देवी के साथ रेप नहीं किया और मैं इसे साबित भी कर सकता हूं।”
सुनकर विश्वास कदम का चेहरा उतर गया।
“कैसे करेंगे आप साबित?” वह खोखली आवाज में बोला।
कुलकर्णी उसे देखते हुए बड़े ही रहस्यमयी अंदाज में मुस्कुराया—फिर टेबल पर से फाईल उठाकर मजिस्ट्रेट की टेबल के करीब आ कर पुरजोर लहजे में बोला—
“इस फाईल में!” उसने फाईल हवा में लहराई—“वो सबूत है जो यह साबित कर सकता है कि रेपिस्ट शेखर गुरेरा नहीं, बल्कि कोई और है। इसमें सीता देवी की पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है। उसकी जांघों से मिले स्पर्म की डी-एन-ए- रिपोर्ट है, बलात्कारी के खून का ग्रुप है—और इसमें शेखर गुरेरा का ब्लड गु्रप और उसकी डी०एन०ए० रिपोर्ट भी है मी लार्ड। डॉक्टर की रिपोर्ट में साफ लिखा है कि रेपिस्ट का ब्लड ग्रुप ए नेगटिव था, जबकि शेखर गुरेरा का ब्लड ग्रुप बी पोजिटिव है। ऐसे ही डी०एन०ए० की रिपोर्ट भी तस्दीक करती है कि मेरे क्लायंट ने सीता देवी के साथ रेप नहीं किया।”
उसने एक गहरी सांस छोड़ी और फाईल मजिस्ट्रेट की टेबल पर रखकर पीछे हटते हुए बोला—
“मेरा ख्याल है मी लार्ड कि मेरे मुवक्किल के बेगुनाह होने के यह सबूत पर्याप्त हैं। दैट्स आल मी लार्ड।”
विश्वास कदम के चेहरे पर हार के भाव साफ नजर आ रहे थे।
पुरुषोत्तम का चेहरा धुआं-धुआं हो रहा था।
और सामने कटघरे में खड़े शेखर गुरेरा के होंठों पर जहर भरी मुस्कान थी।
बड़ी अदा से अपनी गर्दन पर हाथ फेरते हुए वह पुरुषोत्तम को देख रहा था।
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