पावर हाउस : Power House by Deva Thakur
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Description
- काली शक्तियों का स्वामी वृन्ना स्वामी।
- शोला जो नाम का ही शोला नहीं था एक आग का गोला था।
- रुपमती रुपा का मर्मस्पर्शी ट्रैक।
- सापमा, लीना, नगमा, मीशोके के हुस्न के जलवे।
- मकड़जाल-सा पेचिदा और शमशान की रातों-का रोमांचक घटनाक्रम।
- और होहारा का अटपटा-चटपटा किरदार...।
ये उपन्यास नहीं मनोरंजन का ‘पावर हाउस’ है।
पावर हाउस
देवा ठाकुर
हादसा इण्डियन लोग सर अंजाम दे सकते हैं...क्योंकि लोग बावले होते हैं...इमोशन इनमें ज्यादा होता है...शरलॉक होम्स के रचयिता सर आर्थर कानन डायल ने अपने पाठकों से तंग आकर अपने एक उपन्यास में शरलॉक को मरवा दिया...उसके बाद लन्दन में जो बवेला हुआ...उसमें प्रेस तक जला दी गयी थी...लोग सड़कों पर आ गये कि शरलॉक को क्यों मारा...उसे जिन्दा करो...मजबूरी में लेखक को जिन्दा करना पड़ा। ‘शोला’ भी इन दिनों काफी फेम पकड़ रहा है और हम मूंछों पर ताव दिये घूमते दिखाई देते हैं। और शोला से ज्यादा मशहूर ‘होहारा’ किरदार हो गया है...वह जब भी बोलता है यही बोलता है—‘मैं आ गया हूं होहारा’ और बस फिर शोला की भी सिट्टी–पिट्टी गुम हो जाती है। अब ज्यादा डींग मारना भी ठीक नहीं है...आप कहोगे बोलता बहुत है।
हां ‘पावर हाउस’ के बारे में बता दूं कि अण्डीलो भी चमत्कारिक रूप से मैदान में आ गया। और वृन्दा स्वामी...उसका नया रूप देखकर तो छक्के ही छूट जायेंगे आपके......मेरा मतलब शोला के।
खैर, अब अगले उपन्यास में तंग करूंगा...फिलहाल इतना बर्दाश्त कर लें।
पावर हाउस : Power House
Deva Thakur
प्रस्तुत उपन्यास के सभी पात्र एवं घटनायें काल्पनिक हैं। किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से इनका कतई कोई सम्बन्ध नहीं है। समानता संयोग से हो सकती है। उपन्यास का उद्देश्य मात्र मनोरंजन है। प्रस्तुत उपन्यास में दिए गए हिंसक दृश्यों, धूम्रपान, मधपान अथवा किसी अन्य मादक पदार्थों के सेवन का प्रकाशक या लेखक कत्तई समर्थन नहीं करते। इस प्रकार के दृश्य पाठकों को इन कृत्यों को प्रेरित करने के लिए नहीं बल्कि कथानक को वास्तविक रूप में दर्शाने के लिए दिए गए हैं। पाठकों से अनुरोध है की इन कृत्यों वे दुर्व्यसनों को दूर ही रखें। यह उपन्यास मात्र 18 + की आयु के लिए ही प्रकाशित किया गया है। उपन्यासब आगे पड़ने से पाठक अपनी सहमति दर्ज कर रहा है की वह 18 + है।
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पावर हाउस
देवा ठाकुर
शोला इस बात को अच्छी तरह जानता था कि हवेली वाले उसे यूं रुख्सत नहीं होने देंगे। राजेपुर की जिस खानदानी हवेली में जाने–अन्जाने उसके कदम पड़े थे, वह उसकी अपनी हवेली थी। वह इसका वारिस था। उसके पीछे एक खौफनाक इन्तकामी इतिहास था और अरबाब खान इस जायदाद पर काबिज हो गया था जो शोला के दादा की थी।
शोला ने अरबाब खान पर भी एक बहुत बड़ा अहसान किया...उसकी लड़की की इज्जत बचाई थी। अरबाब ने अपने पार्टनर बलवन्त और उसके बेटे का कत्ल कर दिया था, जिसके नतीजे में वह जेल पहुंच गया था। उसने शोला से यह निवेदन किया था कि वह उसी हवेली में रहकर सरपरस्त की तरह उसकी बेटी का संरक्षक बनकर रहे और उसके कारोबार देखे। लेकिन शोला तो एक आवारा हवा का झोंका था...वह भला इस जगह कैसे ठहर पाता, अरबाब खान के लड़के ने सारे मामले सम्भाल लिए थे। अब शोला यहां रुकना नहीं चाहता था।
आधी रात का समय।
शोला खामोशी से अपनी जगह से उठा और वह रास्ता जिसका वह दिन में ही चयन कर चुका था—बड़े गेट की बजाय हवेली से निकलने का एक चोर रास्ता था—शोला उसी तरफ बढ़ गया। थोड़ी देर बाद वह उस वृक्ष पर चढ़ा जो उसने चयन किया था। उसके बाद वह बाहर कूद गया और मैदान में दौड़ता चला गया जो आगे जाकर न जाने कहां तक पहुंचता था।
खौफ व दहशत की कल्पना तो शोला कर भी नहीं सकता था। जितने हंगामाखेज हालात उसकी जिन्दगी में पेश आये थे, उसके बाद भला किसी चीज से वह कैसे खौफ खा सकता था। उसने सोचा कि अब यहां से इतना फासला अख्तियार कर लिया जाये कि अगर यह लोग उसे तलाश भी करना चाहें तो उसमें उन्हें सफलता प्राप्त न हो। अत: चलता रहा। बहुत फासला इस तरह तय किया और वह आबादी बहुत पीछे रह गयी जो राजेपुर की आबादी थी। इस समय कदाचित सुबह के साढ़े तीन बज रहे थे। जब उसे एक चैड़ी और साफ सड़क नजर आई। एक पगडन्डी के रास्ते वह सड़क तक पहुंचा था। थकान हो गयी थी। उसने सोचा कि थोड़ी देर कहीं बैठकर आराम कर लिया जाये। वृन्दास्वामी के साथ जो कुछ घटा था, वह उसके लिए आत्मप्रसन्नता का विषय था। साथ ही वह यह भी सोच रहा था कि अगर फिर कोई चूक हो गयी थी यानि वृन्दास्वामी अगर किसी मोड़ पर यदि उसके सामने जिन्दा खड़ा हो जाता है तो वह यकीनी तौर पर उसे दोबारा भी नुकसान पहुंचा सकता था। शोला ने उसे असहाय, अपंग और बेबस महसूस किया था। इस बार उसने शोला पर खुद वार नहीं किया था। इसका अर्थ यही था कि वह इसकी महारत खो चुका था, यानि उसका कोई जादू शोला पर काम नहीं कर पाया था...भविष्य में अगर वह सामने आ भी गया तो और भी कमजोर स्थिति में होगा और उस पर वह तुरन्त हमला कर सकेगा।
यही सोचता हुआ वह धीरे–धीरे चल रहा था कि उसके कानों में अण्डीलो की आवाज सुनाई दी—
‘‘अधिक समय नहीं रुक सकूंगा, लेकिन जो कुछ सोच रहे हो चीफ! ऐसा कभी न करना...क्योंकि यह बात तुम्हारे लिए भी हानिकारक रहेगी।’’
‘‘अण्डीलो! अण्डीलो!! कहां है तू? तुझे ईश्वर की सौगन्ध सामने तो आ मेरे...तू क्यों इस तरह मुझे तड़पा रहा है। कब तक तड़पाता रहेगा।’’
कुछ लम्हों के लिए खामोशी छा गयी...फिर अण्डीलो ने कहा—
‘‘क्षमा करना बॉस! कभी–कभी इन्सान भावनाओं में बहकर वह कर जाता है जो खुद उसके लिए गुनाह बन जाता है। तुमने मुझे ईश्वर की सौगन्ध दी है...क्या मैंने तुमसे सच्चाई को छिपाया है...क्या मैंने तुमसे यह नहीं कहा है कि मैं शरीर नहीं हूं...अरे मैं तो पागलों की तरह हवाओं से मदद मांगकर तुम तक पहुंचा हूं—अपनी दोस्ती में—और तुम अभी तक यह समझ रहे हो कि मैं बाकायदा तुम्हारी गुलामी में हूं। तुम मुझे खो चुके हो शोला...हां शोला...यह बात मैंने पहले नहीं बताई थी कि तुम मुझे खो चुके हो। यह तो सिर्फ मित्रता है जो मेरे और आपके बीच पहले भी रही। अब भी है और भविष्य में भी रहेगी और मुझे इस मित्रता को निभाने के लिए बहुत से खतरे उठाने पड़ते हैं और तुम ईश्वर की सौगन्ध देकर सामने आने पर मजबूर कर रहे हो। सुनो, तुम लाख ईश्वर का वास्ता देते रहे हो लेकिन जो गढ
दगी तुम्हारे जिस्म में आ गयी है, जब तक उसका जर्रा भी तुम्हारे जिस्म में बाकी है, तुम अपवित्र रहोगे और जहां तक मेरा सम्बन्ध है तो मैं भयभीत नहीं हूं क्योंकि वह शैतान मेरे अस्तित्व को कैद तो कर सकता है। नुकसान नहीं पहुंचा सकता...। लेकिन कुछ सजायें तुम्हारे लिए भी निश्चित कर दी गयी हैं। तुमने वह रास्ता भी बन्द कर दिया जो कभी–कभी तुम तक आ जाता था...समझ रहे हो ना तुम। सुनो...आखिरी बात बता दूं...अगर वृन्दास्वामी कभी तुम्हारे सामने आये तो कम–से–कम तुम अपने हाथों से वह सब करने की कोशिश न करना जो तुमने हाल ही में किया है क्योंकि अब उन पवित्र पुस्तकों गीता, कुरान, बाईबिल को हाथ लगाना तुम्हारे लिए भी उतना ही हानिकारक होगा। वह ईश्वर के तीन रूप हैं और ईश्वर की पवित्रता को कोई अपवित्र नहीं छू सकता...समझ रहे हो ना तुम। मैं तुम्हें यही बताना चाहता था और अब शायद कोई विशेष ही अवसर होगा जब तुम तक आने की मुझे आज्ञा मिल जाये...बस...।’’
अण्डीलो की आवाज गुम हो गयी और शोला अजीब-से अहसास में घिर गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसका शरीर अपवित्र कैसे हो गया है...शायद अण्डीलो का इतना ही साथ रहा होगा...वृन्दास्वामी तक उसे पहुंचाना और वृन्दा का खात्मा करना...और शायद अब उसने फिर न आने का एक ठोस बहाना बना लिया था।
शोला इस अहसास से निढाल हो गया। अण्डीलो के पास अब भी उसका शरीर नहीं था...इसका मतलब वह वृन्दा की कैद से आजाद नहीं हुआ था। शोला ने उसे ऐसे काम के लिए शपथ दी थी जो वह कर भी नहीं सकता था। यह उसकी एक भूल थी।
शोला इन तमाम विचारों को झटककर आगे बढ़ना ही चाहता था कि पीछे से उसे कार की रोशनियां चमकती दिखाई दीं और वह चौंक पड़ा। चौड़ी सड़क हाईवे मालूम होती थी। हालांकि रात का इतना समय बीत चुका था कि आमतौर पर लोग इतनी रात को सफर नहीं करते लेकिन शोला तो बेख्याली में चल रहा था। उसने सोचा होगा कोई उसकी तरह भटकने वाला...वह कार की रोशनियों की जद में था और कार में जो कोई भी था, उसने शोला को देख लिया था, हालांकि वह तुरन्त ही सड़क के किनारे हो गया था लेकिन कार उसके समीप आकर रुक गयी और शोला उसे उलझन भरी निगाहों से देखने लगा।
बहुत उम्दा किस्म की लम्बी–सी कार थी जिसमें एक से अधिक व्यक्ति सवार थे...शोला ने सड़क से अधिक दूर हटने की कोशिश नहीं की, स्पष्ट है कि इसकी कोई वजह भी नहीं थी कि वह हवा में उन पर छलांग ही लगा देता। दो आदमी नीचे उतरे और उसके पास पहुंच गये।
‘‘कहां जा रहे हो? यहां तो दूर–दूर तक कोई आबादी नहीं है और शहर भी यहां से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। कोई सवारी नहीं मिलेगी तुम्हें इस वक्त...कहां जाना है?’’
‘‘बस भाई—राहगीर हूं...। थैंक्स...आपको मेरी इतनी चिन्ता तो हुई।’’
‘‘अबे मुर्गी के अण्डों! वहीं सारी रामायण गा दोगे या उसे इधर भी लाओगे।’’ कार से एक आवाज सुनाई दी। बड़ी कड़कदार आवाज थी। वह दोनों जो शोला के पास आये थे, जल्दी से बोले—
‘‘आओ इधर आओ प्यारे, ठाकुर साहब बुला रहे हैं।’’
शोला दिल–ही–दिल में हंस पड़ा। प्यारे ठाकुर साहब कौन हैं...फिर भी वह कार के समीप पहुंच गया।
‘‘कहां घूम रहे हो टमाटर...क्या कोई रोड होल्डअप का केस होना है या किसी मुसीबत में फंसे हो।’’ अजीब–सा टोन था। चहकता हुआ—जिन्दगी से भरपूर।
शोला ने आंखें फाड़कर, बोलने वाले को देखने की कोशिश की। थोड़ा बहुत खाका चमका लेकिन पूरी तरह शक्ल साफ नहीं हो पाई। फिर भी उसने नर्म स्वर में कहा—
‘‘बस सर! यूं ही आवारागर्दी करता हूं। इस तरफ निकल आया। सोच रहा था कि जितना भी फासला तय हो जाये अच्छी बात है। सुबह तक कहीं–न–कहीं टच हो जाऊंगा।’’
‘‘आ जाओ टमाटर...फिक्र की कोई बात नहीं। हम तो तुम्हारी तलाशी भी नहीं लेंगे। बैठो, हमारी कनपटी पर पिस्तौल रखो और कहो...जो कुछ है निकालकर हाथ में रख दें। कहकर देखो। कसम रामजी की, तुम्हारी खुशी भी पूरी कर देंगे...कमऑन... कमऑन...।’’
गाड़ी में उनके अतिरिक्त एक ड्राइवर भी था। शोला के बैठने की गुंजाइश थी, शोला खामोशी से बैठ गया।
‘‘अब काहे को गाड़ी रोकी हुई है गार्ड।’’ वही शख्स बोला—‘‘चलो...फास्ट...फास्ट...।’’
ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। उस व्यक्ति के शरीर से सुगन्ध के झोंके उठ रहे थे...अच्छा तन्दुरुस्त आदमी था। व्यक्तित्व भी काफी अच्छा करता था। शोला ने फिलहाल उसके बारे में कुछ नहीं सोचा...बस यही सोचा कि लिफ्ट मिल गयी। किसी बाहरी आबादी में उतर जायेगा।
थोड़ा–सा सफर खामोशी से तय हुआ। फिर उस व्यक्ति ने कहा—
‘‘अब कम–से–कम अपना नाम तो बता दो। इतना तो लोग करते ही हैं। पैदल जा रहे थे, चाहे इरादा कुछ भी हो, हमने तुम्हारी थोड़ी बहुत मदद की है...अब क्या हमें इस काबिल भी नहीं समझ रहे हो कि अपने बारे में कुछ बता दो।’’
‘‘सुनिये श्रीमान, बात ऐसी कुछ भी नहीं है...बस यह समझ लीजिए, एक आबादी में था और वहां पर भी जबरदस्ती का मेहमान बना हुआ था। अकारण किसी पर भार बने रहना पसन्द नहीं किया तो वहां से चल पड़ा...क्योंकि मैं जानता था कि वह नेक लोग आसानी से मुझे वहां से नहीं आने देंगे।’’
‘‘इसका मतलब है कि खुद्दार आदमी हो...चलो ठीक है...कोई बात नहीं...क्या नाम है?’’
‘‘शोला।’’
‘‘इसका मतलब है अपने भाईबन्द हो...हमारा नाम प्यारे अंगार सिंह ठाकुर है...वैसे लोग हमें प्यारे ठाकुर ही कहते हैं। शहर में कहां रहते हो।’’
‘‘कौन से शहर में...।’’
‘‘अरे भाई, जहां जा रहे थे...राजगढ़...और क्या मैं दिल्ली की बात कर रहा हूं।’’
‘‘बस आप मुझे आबादी में दाखिल होते ही उतार दीजिये।’’
‘‘देखो जान! एक बात कहें तुमसे। अगर मान लो, अहसान एक पैसे का हो या एक रुपये का हो, एक करोड़ का हो या अखलाकी हो...कैसा ही हो, अहसान अहसान ही होता है और जिस इन्सान के अन्दर अहसानमन्दी की भावनायें नहीं होतीं, वह अपने आपको इन्सान कह तो ले लेकिन हमारे ख्याल में आधा इन्सान होता है। देखो...अगर तुम किसी वजह से सड़क पर पैदल जा रहे थे और हम तुम्हारे रास्ते में रुकावट बन गये तो कसम राम जी की, हमसे कहो हम तुम्हें यहीं उतार देंगे और कुछ पूछे बिना आगे बढ़ जायेंगे। तो बोलो उतार दें तुम्हें। मर्द की जुबान है, जो वादा किया है, वह पूरा करेंगे। यानि तुम्हें उतारने के बाद भूल जायेंगे कि तुम यहां सड़क पर नजर आये थे। और अगर शहर जा रहे हो और हमने तुम्हें गाड़ी में बिठाया है तो समझ लो एक अहसान कर दिया है तुम्हारे ऊपर। मानते हो या नहीं।’’
शोला को उसकी बात सुनकर हंसी आ गयी।
वह हंसते हुए ही बोला—‘‘मानता हूं ठाकुर साहब।’’
‘‘जब तक दिल चाहे जियो टमाटर बल्कि जरूर जियो। अच्छा चलो...अब यह बताओ कि शहर में किस जगह जाओगे...कहां रहते हो?’’
‘‘आपने कहा है कि आपके एक अहसान के बदले सच बोलूं।’’
‘‘हां, कहा तो यही है हमने।’’
‘‘इसके बाद आपके कुछ और अहसानों का भी बोझ उठा लूंगा।’’
‘‘हम समझे नहीं?’’
‘‘तो समझ लीजिये...यह शहर भी मेरे लिये नया है और मेरा कहीं कोई ठिकाना नहीं है। हमें तो यह भी मालूम नहीं कि हम कौन से शहर जा रहे हैं। जिन्दगी एक आवारा हवा का झोंका है, कोई अजीज, रिश्तेदार, नातेदार नहीं है। कायनात में तन्हा हूं। आप शहर में कहीं भी उतारेंगे, उसके बाद अपने लिए जगह तलाश करूंगा और दुनिया के हंगामों में इस तरह गुम हो जाऊंगा जिस तरह अब तक गुम रहा हूं।’’
प्यारे ठाकुर साहब ने कोई उत्तर नहीं दिया। प्यारे ठाकुर साहब खामोश हो गये थे। कार उसी गति से आगे बढ़ रही थी। बहुत देर हो गयी तो शोला ने स्वयं ही प्यारे ठाकुर को सम्बोधित किया—
‘‘दिल तो चाहता है कि आपके बारे में मैं मालूम करूं लेकिन उचित नहीं है। अगर आप उचित समझें तो स्वयं बता दें और फिर आवश्यक भी नहीं है कि चन्द लम्हों का साथ ही तो है। आपको धन्यवाद अदा करूंगा और बस...।’’
‘‘नहीं...हम तो यह सोच रहे थे कि तुमसे आगे की बात करें। वैसे तुम हमारा अहसान मानते हो ना।’’
‘‘जी...श्योर...क्योंकि इसकी वजह मैं आपको बता चुका हूं।’’
‘‘हमने तुम पर अहसान किया और अब तुम्हें हमारी थोड़ी बहुत बात भी माननी होगी।’’
‘‘जी फरमाइये।’’
‘‘तुरन्त ही भागने की कोशिश नहीं करोगे बल्कि थोड़ा–सा वक्त दोगे हमें।’’
‘‘मुझे तुरन्त ही कहीं भागना भी नहीं है ठाकुर साहब।’’
सड़क सुनसान थी। शहरी आबादी में प्रविष्ट होने के बाद बहुत ही चौड़ी सड़कें और रास्ता तय करते हुए अन्तत: वह लोग एक ऐसी जगह पहुंच गये जो एक चौड़ी सड़क थी। दोनों तरफ इमारतें बनी हुई थीं। विभिन्न प्रकार के बोर्ड नजर आ रहे थे। मद्धिम–मद्धिम रोशनियां जल रही थीं। मकानात बने हुए थे। एक स्ट्रीट में प्रविष्ट होने के बाद एक लोहे का फाटक नजर आया जिसके सामने कार रुकी और फिर फाटक से अन्दर प्रविष्ट हो गयी। बहुत बड़ा अहाता था। एक तरफ शायद स्कूल खुला हुआ था और दूसरी तरफ निवास। ठाकुर साहब की कार उसी निवास की तरफ जाकर रुकी।
‘‘चलो आओ।’’ ठाकुर ने कहा और स्वयं भी कार से नीचे उतर गया लेकिन शोला उससे पहले ही नीचे उतर चुका था। जैसे ही प्यारे ठाकुर नीचे उतरा, अचानक ही कहीं से गोली चली और उसके बाद एक दहकता हुआ अंगारा शोला के बाजू को छेदता हुआ दूसरी तरफ निकल गया। ठाकुर ने शोला को धक्का दिया और स्वयं भी जमीन पर गिर पड़ा। उसके बाद ठाकुर की गुर्राती आवाज सुनाई दी—
‘‘देखना चमन निकलकर...जाने न पाये।’’
और फिर वह तीनों आदमी उस दिशा में दौड़ पड़े जिधर से गोली चलाई गयी थी। चौकीदार फाटक बन्द कर चुका था। गोली चलाने वाला मद्धिम रोशनी में नजर आ रहा था। वह एक दीवार की तरफ भागा था और फिर उसने पलटकर दो फायर और करे लेकिन यह फायर भागते हुए किये गये थे इसलिए खाली गये। वह उछलकर उस दीवार पर चढ़ने की कोशिश करने लगा, लेकिन इसमें कामयाब न हो सका...उसी लम्हें उन तीनों ने उसे जाकर दबोच लिया। ठाकुर ने अपनी जगह से उठते हुए कहा—
‘‘उठो टमाटर! वह ससुरा तो पकड़ा गया...भगवान का शुक्र कि हम बच गये।’’ ठाकुर ने उसके बाजू से लिथुड़े खून को महसूस कर लिया। फिर अचानक ही चीख पड़ा—‘‘अरे क्या तुम्हें गोली लगी है?’’
‘‘जी हां! मगर हड्डी बच गयी है।’’
‘‘अब तो मारा गया वह ससुरा...इसकी ऐसी-की-तैसी।’’ ठाकुर ने अपनी जेब से एक रुमाल निकाला और फिर शोला के बाजू पर कस दिया।
‘‘चमन लाल...जल्दी...लड़का घायल हो गया है...अन्दर आओ...उस कुतिया के पिल्ले को पकड़कर अन्दर ले आओ...चलो जल्दी।’’
और फिर वह लोग शोला को लिये हुए इमारत के अन्दर प्रविष्ट हो गये। जिस आदमी को चमन के नाम से सम्बोधित किया गया था, वह फुर्ती से एक तरफ दौड़ गया था। वहां कुछ और लोग भी मौजूद थे। थोड़ी देर बाद उसे एक कमरे में ले जाया गया और एक कुर्सी पर बिठा दिया गया। बाजू का खून निरन्तर बह रहा था और जमीन पर बहता जा रहा था। शोला ने रोशन कमरे में बिछे हुए कीमती कालीन को देखते हुए कहा—
‘‘कोई ऐसा कपड़ा मेरे बाजू के नीचे रख दीजिये जिस पर खून रुक जाये...कालीन खराब हो रहा है।’’ पहली बार उस व्यक्ति ने शोला को ओर शोला ने उसे देखा सुर्ख–सफेद बड़ी–बड़ी रोशन आंखों वाला खूबसूरत नयन–नक्श का स्मार्ट–सा व्यक्ति। उम्र रही होगी कोई पैंतीस साल। बड़ी–बड़ी काली मूंछें...क्लीन शेव चैड़ा ललाट...चैड़ा सीना। शोला को उसने ऐसी निगाहों से देखा जैसे उसे शोला की बात अशोभनीय लगी हो। लेकिन कोई उत्तर नहीं दिया। फिर कुछ व्यक्ति आ गये...कदाचित फर्स्टएड का सामान लेकर आये थे। उनमें से एक ने कहा—
‘‘गोली बाजू में रह गयी है?’’
‘‘अरे मुर्गी के, गोली से मेरा कोई रिश्ता है क्या जो मुझे वह बतायेगी कि बाजू में रह गयी है या बाहर निकल गयी है...तू देख और मुझे बता...अगर हस्पताल ले जाना है तो चलो अस्पताल लेकर चलते हैं।’’ वह शख्स जो शायद उसके बारे में कुछ जानता था, शोला के घाव को देखने लगा फिर उसने कहा—
‘‘नहीं ठाकुर साहब। गोली बाजू में नहीं है और न ही हड्डी को टच करके निकली है...बस मांस काटती हुई निकल गयी है।’’
‘‘काम यहीं चल जायेगा?’’
‘‘दो मिनट के अन्दर खून रिसना बन्द हो जायेगा। थोड़ी पीड़ा सहन करनी पड़ेगी आपको।’’ यह वाक्य उसने शोला को सम्बोधित करके कहा था और शोला हंस पड़ा।
‘‘आप बेफिक्री से जो दिल चाहे करें...मैं पीड़ा सहन कर लूंगा।’’
ठाकुर ने शोला की तरफ देखा। फिर मुस्कराते हुए एक आंख दबा दी—
‘‘वह जो कहते हैं न कि भगवान शक्करखोर को शक्कर ही देता है। कसम रामजी की...अच्छा–खासा जख्म है मगर तुम्हारे माथे पर शिकन तक नहीं है और चेहरा इस तरह लापरवाह है जैसे गोली न लगी हो, मजाक किया गया हो तुम्हारे साथ...ऐसे बन्दे पर प्यारे ठाकुर जान देता है...अबे भूतनी के जल्दी कर...क्या कर रहा है।’’ आखिरी वाक्य उसने अपने आदमी से कहे।
भूतनी का शोला के जख्म पर जली हुई रूई रखकर स्प्रे कर रहा था। फिर उसने उस पर एक चैड़ा टेप लगाया। बैन्डेज का सारा सामान मौजूद था और उसके बाद बाजू पर पट्टी कस दी गयी। उसकी कमीज आस्तीन के पास से फाड़ दी गयी थी और शोला यह सारा तमाशा एक मूक दर्शक की तरह देख रहा था।
ठाकुर ने गर्दन हिलाते हुए कहा—
‘‘हां...अब सब ठीक है...अबे चमन के बच्चे...जाकर जरा दूध गर्म करके तो ला, एक गिलास में...और हां उसमें हल्दी डाल देना थोड़ी–सी।’’
‘‘नहीं...ठाकुर साहब...इसकी आवश्यकता नहीं है।’’ शोला ने कहा।
‘‘देखो टमाटर! हमने कैसे एक छोटा–सा अहसान किया था तुम पर लेकिन हो गया उलटांग...फौरन ही तुमने हम पर बड़ा अहसान कर डाला...जाहिर है यह गोली तुम पर नहीं चलाई गयी थी। तुम कार के दरवाजे से मुझसे पहले निकले...गोली मारने वाला समझा मैं उतर रहा हूं...यानि निशाना हम थे...बचाया तुमने हमें...क्या हुआ चमन लाल...अरे तुम भी तो कुछ बोलो।’’
चमन लाल मुस्करा दिया फिर बोला—‘‘ज–जी...अहसान तो हुआ ही है।’’
‘‘हो हो हो...हो हो हो...।’’ ठाकुर हंसा—‘‘और टमाटर प्यारे...हम खानदानी आदमी हैं और खानदानी आदमी बदला जरूर उतारते हैं। देखो, अगर तुम यह कहना चाहते हो कि हम दो कौड़ी के आदमी हैं तो मिस्टर हम हाथ जोड़कर कहते हैं ऐसा न कहना...क्योंकि वह हमें अच्छा नहीं लगेगा और अगर हमें दो कौड़ी का नहीं समझते हो तो समझ लो कि अब तुम हमारे कैदी हो। जब तक पूरी तरह ठीक नहीं हो जाओगे...हम तुम्हें जाने नहीं देंगे। अगर यहां कोई दिक्कत हो, किसी को कोई संदेशा देना हो...कोई बात करनी हो तो प्यारे ठाकुर हाजिर है...जो चाहोगे वही हो जायेगा।’’
‘‘नहीं ठाकुर साहब! न तो किसी को कोई संदेशा देना है और न यहां कोई दिक्कत है। आप कहेंगे तो रुक जाता हूं यहां। चार छ: दिन आपकी सोहबत में भी वक्त कट जायेगा जो मेरे लिए अच्छा ही है...मैं तो उस शख्स का शुक्रिया अदा करूंगा जिसने गोली चलाई...कम–से–कम चन्द दिनों का ठिकाना तो मिल गया।’’
प्यारे ठाकुर ने एक बार फिर उसे अपनी बड़ी–बड़ी खूबसूरत आंखों से देखा, लेकिन मुंह से कुछ नहीं कहा। फिर उसने चमन से कहा—
‘‘उसे पकड़ लिया।’’
‘‘जी ठाकुर साहब...बन्द कर दिया है।’’
‘‘ठीक से बन्द किया है...भाग तो नहीं जायेगा।’’
‘‘तीन नम्बर में बन्द किया है और ड्यूटी लगा दी है।’’
‘‘पिस्तौल ले लिया?’’
‘‘जी हां।’’
‘‘भरा हुआ है?’’
‘‘नहीं साहब! तीन ही गोलियां थीं उसमें।’’
‘‘बन्दे की उम्र क्या होती?’’
‘‘जवान आदमी है।’’
‘‘मारना–पीटना नहीं...क्या समझे...बन्द रहेगा ना...?’’
‘‘हमने हाथ–पांव बांध दिये हैं और बिठा दिया है।’’
‘‘कुछ पूछताछ तो नहीं की?’’
‘‘नहीं ठाकुर साहब...आपके बिना पूछताछ कैसे हो सकती है?’’
‘‘समझदार हो गये हो और समझदार ही हमें अच्छे लगते हैं। बन्द रहने दो ससुरे को...सुबह ही देखेंगे। हमें अपने यार की तीमारदारी करनी है।’’ फिर वह शोला की तरफ पलटा—‘‘आ जाओ...तुम आकर बिस्तर पर लेट जाओ...कुछ तकलीफ महसूस करो तो बता देना।’’
‘‘सचमुच कोई तकलीफ नहीं है ठाकुर साहब।’’ शोला ने कहा। थोड़ी देर बाद दूध आ गया। गर्म दूध के एक गिलास ने उसे काफी राहत पहुंचा दी...लेकिन थोड़ी देर बाद पलकें जुड़ने लगीं...कदाचित दूध में ही कोई ऐसी चीज मिला दी गयी थी जो नींद या बेहोशी की दवा थी।
दूसरे दिन न जाने क्या समय हुआ था जब आंखें खुली...कुछ लम्हें तो उसे परिस्थिति का जायजा लेने में बीत गये...न जाने कहां है...कौन–सी जगह है लेकिन धीरे–धीरे हवास जागने लगे और सारी सच्चाई जेहन में जाग उठी। बाजू के जख्म का ख्याल आया, बहुत अर्से बाद कोई जख्म मिला था...और यह भी अपने आपमें एक हकीकत है कि कभी–कभी चोट में भी लुत्फ आता है। न जाने क्यों उसे एक अजीब-से लुत्फ का अहसास हो रहा है। फिर वह प्यारे ठाकुर के बारे में सोचने लगा। क्या बेहतरीन शख्सियत है और दिलचस्पी से भरा हुआ व्यक्तित्व। कौन है यह? चेहरे–मोहरे से तो सलीकेदार इन्सान है, बोलने के अन्दाज में कोई विशेष बात है जो दिल पर प्रभाव डालती है।
शोला अभी इन्हीं सोचों में गुम था कि किसी ने दरवाजे के अन्दर झांका और उसे जागते देख दरवाजा पूरा खुल गया। तेज रोशनी दरवाजे के अन्दर प्रविष्ट हो गयी, जिससे यह अहसास हुआ कि सूरज खूब चमक रहा है। कमरे में दरवाजे–खिड़कियां भी थे लेकिन तमाम दरवाजों पर भारी पर्दे पड़े हुए थे और सूरज की रोशनी इन पर्दों से अन्दर नहीं झांक सकती थी। आने वाली हस्ती प्यारे ठाकुर के अतिरिक्त और कोई नहीं थी। साधारण से वस्त्र पहने हुए था।
शोला जल्दी से उठने लगा तो प्यारे ठाकुर उसके समीप पहुंचकर बोला—
‘‘नहीं टमाटर...आराम से लेटे रहो...सम्मान अच्छी चीज है लेकिन उस वक्त जब इन्सान बेहतर हालत में हो।’’
‘‘नहीं ठाकुर साहब! मैं बिल्कुल ठीक हूं। आपने मेरे छोटे से जख्म को अधिक महत्व दे दिया...।’’ और जवाब में प्यारे ठाकुर मुस्करा दिया।
‘‘वास्तव में बिल्कुल छोटा–सा जख्म है...इसमें शक नहीं है। हमने मालूम कर लिया है लेकिन चांदी के शेर! यह जख्म तुमने जिस भावना के तहत खाया है, वह भावना बड़ी मूल्यवान है और अगर इन्सान इन भावनाओं की कद्र न कर सके तो बस क्या कहें उसे। अब तो दिल की रोशनी में हम तो इतनी–सी बात बिठा चुके हैं। खैर, यह तो हमारी आदत है। कोई पसन्द आ जाये तो बस यों लगता है जैसे हमारी मां की कोख से पैदा हुआ हो। हां तो अब ऐसा करो...अगर कोई पीड़ा नहीं है तो उठ जाओ। वह सामने बाथरूम है। जाओ जरा मुंह–हाथ धोओ...फिर नाश्ता करेंगे तुम्हारे साथ।’’
शोला अपनी जगह से उठ गया। सचमुच जख्म में कोई तकलीफ नहीं थी। प्यारे ठाकुर उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। जब शोला मुंह–हाथ धोकर बाल संवारकर बाहर आया तो बड़े प्रेम भरे अन्दाज में उसने शोला की कमर में हाथ डाला और दरवाजे से बाहर निकल आये। बाहर निकलकर शोला ने इस रेजीडेंस को देखा। ठाकुर के व्यक्तित्व के अनुरूप ही निवास स्थान था। कालीन बिछे हुए थे। राहदारियां तक रोशन थीं। जिस कमरे में वह शोला को लेकर आया, वहां सागौन की लकड़ी की एक बड़ी–सी मेज पड़ी हुई थी। उसके गिर्द कुल चौबीस कुर्सियां थीं जो सागौन की ही बनी हुई थीं।
ठाकुर ने शोला के लिए स्वयं कुर्सी घसीटी और बैठने का अनुरोध करके स्वयं भी बैठ गया। शोला को सचमुच शर्मिन्दगी महसूस हो रही थी।
‘‘प्यारे ठाकुर साहब।’’ शोला ने कहा—‘‘आप अजीबो–गरीब अन्दाज में मुझे मिले। मेरे बारे में कुछ नहीं पूछा...न जाना और इस तरह मुझ पर मेहरबान हो गये।’’
‘‘कलेजे के टुकड़े! जो कुछ हुआ है, उसमें यकीन करो हमारा कोई हस्तक्षेप नहीं है। कुछ चेहरों पर नजर आने वाली किरणें कुछ ऐसी रोशन होती हैं कि देखने वाला मन्त्रमुग्ध हो जाये और यह चेहरा यूं ही रोशन नहीं होता, उसके पीछे कुछ तपस्या जरूर होती है। बस देखते ही मुझे पसन्द आ गये, अब इस बात को बार–बार दोहराने से क्या फायदा? यकीन करो, अगर यह जख्म न भी खाते, तब भी हम आपको अपना मेहमान बनाने की पेशकश जरूर करते।’’
‘‘आप बहुत अच्छे व्यक्तित्व के स्वामी हैं प्यारे ठाकुर साहब। हां, क्या उस शख्स को आपने पुलिस के हवाले कर दिया।’’ शोला ने कहा और ठाकुर हंसने लगा।
‘‘ऐसा नहीं करते हम टमाटर! बस बन्द है। अभी रात को गुस्सा था तो हाथ–पांव बंधवा दिये थे लेकिन अब जरा उसकी सेवा–पानी करेंगे...सोचा तुम्हारे सामने ही उसे पूछताछ की जाये। पुलिस के हवाले नहीं करते हम किसी को। तुम खुद सोचो...उसने हम पर गोली चलाई...उसने ऐसा क्यों किया...क्या कष्ट था उसे...मालूम हो जाये फिर समझा–बुझाकर छोड़ देंगे। पुलिस को देने से क्या फायदा। हमें खुश करने के लिए खाल उतार लेगी, फिर उससे पैसे भी ले लेगी...कुछ हम से भी मांग लेगी, क्या कहें और क्या न कहें...तुम खुद समझदार हो।’’
‘‘आपने अब तक उससे मुलाकात नहीं की?’’
‘‘नहीं, लेकिन नाश्ता वगैरा उसे पूरी तरह पहुंचा दिया गया है, बल्कि बाद में तो हमने उसके लिए यह भी किया था कि हथियार फेंक दो और मसहरी पर डाल दो ताकि आराम से सो जाये...अरे हां...मरे हुए को क्या मारना...हालांकि खैर छोड़ो...देवता बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।’’
चन्द लम्हों बाद नाश्ता लगाया गया तो ठाकुर ने कहा—
‘‘देखो...बाजू में अगर जरा भी तकलीफ है तो चमन लाल अपने हाथ से नाश्ता करा देंगे।’’
शोला हंसने लगा।
‘‘आप विश्वास रखें, बिल्कुल भी तकलीफ नहीं हो रही है।’’
‘‘वैसे तो जो दवा तुम्हारे बाजू में भरी गयी है, वह पुराने बुजुर्गों की बनाई हुई है। बड़े–बड़े जख्मों को अन्दर से सील कर देती है और कोई तकलीफ नहीं होती।’’
‘‘ऐसी ही बात है।’’
‘‘चलो फिर नाश्ता करो।’’
बड़े इत्मीनान से नाश्ता किया गया। शोला उस व्यक्ति के बारे में सोच रहा था। वैसे तो उसकी जिन्दगी में अनगिनत लोग आये थे...अजीबो–गरीब व्यक्तित्व के स्वामी। परन्तु प्यारे का अपना एक अलग ही अन्दाज था। बहुत–सी सोचें, बहुत–सी यादें उसके जेहन से टकरा रही थीं। अण्डीलो का ख्याल भी एक बार दिल में आया था, लेकिन इस ख्याल को दिल से अधिक दूर रखना ही बेहतर था क्योंकि पूरी कायनात में अण्डीलो जैसी कोई शख्सियत नहीं थी जो बिल्ला था और जो इंसानों की जुबान में बात करता था। अब उसके पास उसका अपना जिस्म भी नहीं था, वो भी उसकी आवाज सुनायी पड़ती थी। दोनों खामोशी से नाश्ता कर रहे थे। नाश्ते से फारिग हुए तो बात ठाकुर ने ही शुरू की—
‘‘हम दोनों एक–दूसरे के बारे में फिर से बात करेंगे। आओ जरा इस घन–चक्कर से पूछ ही लेते हैं कि उसे क्या कष्ट हुआ था जो गोली चलाई। वैसे इस बात का अन्दाजा तो तुम्हें भी हो गया होगा कि गोली तुम पर नहीं हम पर चलाई गयी थी।’’
‘‘जी! जाहिर है। मेरे लिए किसी को एक कारतूस खर्च करने की जरूरत नहीं थी...क्योंकि मैंने किसी से दुश्मनी नहीं पाली है और अगर कोई दुश्मन है भी, तो वह एक गोली खर्च करने पर भरोसा नहीं करेगा।’’
‘‘तुम्हें एक बात बतायें कलेजे के टुकड़े...वह यह कि दुश्मनी हम भी किसी से नहीं पालते। हां, यह अलग बात है कि दुश्मन कभी–कभी स्वयं बन जाते हैं। खैर चलो छोड़ो, यह सारी बातें तो जरा इत्मीनान से होंगी...आओ उससे मिल लेते हैं।’’
जिस कमरे में शोला प्यारे ठाकुर के साथ प्रविष्ट हुआ, वह भी काफी बड़ा था। कदाचित् नौकरों ने दरवाजे–खिड़कियां खोल दी थीं। कमरे में ताजा हवा और रोशनी आ रही थी। पंखा भी चल रहा था। वह व्यक्ति जो शायद स्वयं भी हैरान था कि किसी पर कातिलाना हमले के बाद उसके साथ इतना अच्छा व्यवहार किया जा रहा है। कुछ अजीब–सी दुविधा का शिकार नजर आ रहा था। हाथ बंधे हुए थे। एक कुर्सी पर बैठा हुआ था। प्यारे ठाकुर अन्दर प्रविष्ट हुआ तो उसके चेहरे पर पीलाहट दौड़ गयी। ठाकुर ने उसे देखकर मुस्कराते हुए कहा—
‘‘कैसे हो गाजर...जिन्दगी कैसी लग रही है। अरे कोई है...इधर आओ चमन लाल...गुल्लू, पीताम्बर...हाथ खोल दो इसके। भूतनी का चौड़ा-चकला सीना ताने हुए बंधे हाथ अच्छा नहीं लग रहा है। तकलीफ में बैठा हुआ है।’’
तुरन्त ही दो आदमी अन्दर आ गये और उन्होंने उस नौजवान के हाथ खोल दिये।
तब प्यारे ठाकुर ने कुछ कदम आगे बढ़कर कहा—
‘‘देखो कलेजे के टुकड़े! रात को गोली चलाई थी तुमने हम पर। हम तो बच गये। इस हमारे बेचारे चांद के टुकड़े को गोली लग गयी। वह तो शुक्र है जख्म गहरा नहीं लगा। बाजू पर लगी थी गोली...अगर गोली भटक जाती और यह मर जाता तो क्या परिणाम होता, तुम्हें इसका अन्दाजा है? चलो छोड़ो...ईश्वर ने इसकी जान बचा दी। हमारे दिल का मैल भी तुम्हारी तरफ से साफ हो गया। अब देखो...एक बात कहे देते हैं तुमसे, वह यह कि झूठ बिल्कुल मत बोलना। अगर तुमने झूठ बोला ना तो हम सिर्फ इतना करेंगे कि तुम्हारी जुबान काटकर तुम्हें यहां से बाहर निकाल देंगे। बदन से एक चीज की कमी हो जाएगी और यह तो तुम जान ही सकते हो जिगर के टुकड़े कि इन्सान इस कमी को सारी जिन्दगी पूरा नहीं कर सकता। कौन हो...क्या हो...अगर हमें नहीं बताया तो समझ लो कि दुनिया में कभी किसी को कुछ नहीं बता सकोगे। हम एक बात तुम्हें आखिरी और बता दें, जो कहते हैं, वही करते हैं। अब आगे तुम जानो और तुम्हारा काम।’’
वह शख्स सचमुच बहुत भयभीत हो गया। और प्यारे के अन्दाज से बिल्कुल यही लग रहा था जैसे प्यारे जो कुछ कह रहा है, वह कर ही डालेगा और शायद सामने वाले व्यक्ति ने भी यह अनुमान लगा लिया था। वह धीरे से बोला—
‘‘मैं वादा करता हूं कि आपके सामने बिल्कुल सच बोलूंगा...ईश्वर के लिए आप मुझे पुलिस के हवाले न कीजिये।’’
जवाब में प्यारे ने मुस्कराकर कहा—‘‘कलेजे के टुकड़े! अगर तुम्हें पुलिस के हवाले करना होता तो अब तक कभी का कर चुके होते। हालांकि हमें ऐसा करना ही चाहिए। तुमने हमारे मेहमान पर गोली चलाई है...मगर हो सकता है कि कोई ऐसी ही मजबूरी आड़े आ गयी हो...अब बताओ जरा कि सच क्या था? कौन हो...चलो नाम बताओ अपना।’’
‘‘मेरा नाम शमशेर है।’’
‘‘मां–बाप भी कमाल के लोग होते हैं...उल्टे–सीधे नाम रख देते हैं...शमशेर...हूं।’’ फिर कुछ रुककर बोला—‘‘माफ करना तुम्हारे मां–बाप को बुरा नहीं कह रहे। शमशेरों का काम वह नहीं होता जान...जो तुमने किया है। सामने आते, सीने पर पिस्तौल तानते...गोली चलाते तो हम तुम्हें शमशेर मान लेते...मगर खैर चलो मान लिया। अब यह बताओ गोली किस पर चलाई थी?’’
‘‘आप पर।’’
‘‘हमें जानते हो?’’
‘‘जी..
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Additional information
Book Title | पावर हाउस : Power House by Deva Thakur |
---|---|
Isbn No | |
No of Pages | 222 |
Country Of Orign | India |
Year of Publication | |
Language | |
Genres | |
Author | |
Age | |
Publisher Name | Ravi Pocket Books |
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