मुर्गा बोला कुक्कड़ू कू मुर्दा जी उठा क्यूं
माया मेमसाहब
मैं!
माया मेमसाब।
मैं अपने बेडरूम में आराम कर रही थी।
सुबह के सात बजे थे। मगर आज मेरा बिस्तर छोड़ने का मन नहीं हो रहा था।
रात भर मैंने ऑफिस की कुछ जरूरी फाइलें निपटाई थीं।
सुबह के चार बजे ही सोई थी।
टेलीफोन की लगातार बजती घण्टी की आवाज सुनकर मेरी आंखें खुलीं।
मैंने फोन को निगल जाने वाली निगाहों से घूरकर देखा।
रिसीवर उठाकर कान से लगाया, झल्लाकर बोली——“हैलो...।”
“मुझे माया मेमसाब से बात करनी है...।” दूसरी ओर से एक जनानी आवाज मेरे कानों में पड़ी।
“कौन माया मेमसाब...?” मैंने अनजान बनते हुए पूछा।
“जो अण्डरवर्ल्ड के साथ-साथ, भारतीय सीक्रेट सर्विस से भी सम्बन्ध रखती है...मुझे उस माया मेमसाब से बात करनी है।”
“बोलो...।”
“क्या आप माया मेमसाब बोल रही हैं...?”
“हां...तुम कौन...?”
“स्नेहलता पाटिल।”
“मुझसे क्या काम है...?”
“मैं आपको राज़ की एक बात बताना चाहती हूं...जिसे जान लेना आपके लिए बड़ी अहमियत रखेगा...।“
“बताओ...।”
“मेरे पति अरुण पाटिल, डिफेंस मिनिस्ट्री में एक ऊंचे पद पर हैं...।”
“फिर...?”
“वह डिफेंस की अति महत्वपूर्ण फाइलें, दुश्मनों को बेचते हैं...।”
“आप अपने पति की कम्प्लेन कर रही हैं स्नेहलता पाटिल...?”
“जी हां...।”
“भारतीय नारी के लिए उसका पति उसका भगवान होता है...।”
“मैं जानती हूं, आज तक यही मानकर अपने पति की सेवा करती आई, मगर मैं उस गद्दार को माफ नहीं कर सकती जो देशद्रोही हो, गद्दार हो...चाहे वह फिर मेरा पति ही क्यों ना हो...।”
“बड़े अच्छे विचार हैं आपके...।” मैं बोली——“मगर यदि आपको अपने पति से ऐसी शिकायत है...तो आपको पुलिस में कम्प्लेन लिखवानी चाहिए। मुझे फोन क्यों किया है...?”
“इसलिए कि मैं जानती हूं कि पुलिस भी दुश्मनों से मिली हुई है...।”
“ओह...तो यह बात है...।“
“हां...।”
“मुझसे क्या चाहती हो...।”
“मैं चाहती हूं कि आप दुश्मनों को बेनकाब करें...।”
“अपना पता बोलो...।”
“सी तीन बटे चार, पाली हिल, बान्द्रा...।”
“ठीक है, मैं अभी एक घण्टे में तुम तक पहुंचती हूं...।”
“मैं आपका इन्तजार करूंगी...।”
“ओ०के०।”
इतना कहकर मैंने रिसीवर इंस्ट्रूमेन्ट पर रख दिया।
मैं बाथरूम जाने के लिए उठी ही थी कि घण्टी फिर बज उठी।
“हैलो...।”
“अरुण पाटिल बोल रहा हूं माया जी...।”
“कौन अरुण पाटिल...।”
“मेरी पत्नी स्नेहलता पाटिल ने अभी आपको मेरे विषय में बताया होगा...।”
“ओह, तो यह तुम हो...।”
“हां...।”
“क्या कहना...चाहते हो...?”
“सिर्फ इतना कि मेरी पत्नी स्नेहलता पाटिल दुश्मनों की जासूस है...।”
“नो...।”
“यह सत्य है माया जी...।”
“कोई सबूत...?”
“सबूत मेरे पास एक नहीं, ढेरों हैं माया जी...।”
“तुम मुझे कहां मिल सकते हो पाटिल...।”
“सी तीन बटे चार पाली हिल-बान्द्रा...।”
“मैं आ रही हूं...।”
कहकर मैंने रिसीवर इंस्ट्रूमेन्ट पर रखा।
और फिर बिस्तर से उठकर जल्दी से बाथरूम में घुस गई।
¶¶
मैं सी तीन बटे चार पाली हिल बान्द्रा पहुंची।
गेट को पार कर मैं ड्राइंगरूम में आई।
और वहां का दृश्य देखकर मैं चौंक पड़ी।
वहां दो लाशें पड़ी हुई थीं।
मैंने अन्दाजा लगाया कि वे लाशें किसी और की नहीं, बल्कि स्नेहलता पाटिल और अरुण पाटिल की थी।
सोचने लगी कि वे दोनों एक-दूसरे को गद्दार बता रहे थे...।
अब दोनों ही मौत को प्यारे हो गए थे।
किसने की उनकी हत्या?
कौन है कातिल?
मैं इस विषय पर अभी सोच ही रही थी कि फोन की घण्टी बज उठी।
मैंने रुमाल से रिसीवर पकड़कर उठाया, बोली——“हैलो...?”
“तू माया मेमसाब है ना...?”
“हां...तुम कौन हो...?” मैं सतर्क और चौकन्नी होकर बोली।
“मैं स्नेहलता और अरुण पाटिल का हत्यारा बोल रहा हूं...।”
“हूं...।”
“मैं तुझे चैलेन्ज करता हूं कि मुझ तक पहुंचकर दिखा...।”
“और कुछ...?”
“ना...।”
मैंने रिसीवर इंस्ट्रूमेन्ट पर रख दिया।
कातिल जो कोई भी था...।
उसने मुझे खुला चैलेन्ज दे दिया था।
और मैंने उसका चैलेन्ज स्वीकार किया था।
अगले ही पल मैं पुलिस स्टेशन को सूचना दे रही थी।
¶¶
वह गोरा-चिट्टा युवक स्वाति की ठण्डी चिता के पास खड़ा, एकदम चिता को घूर रहा था।
वह दिल ही दिल में कह रहा था——“स्वाति ये तूने क्या किया! अगर तूने मुझे बताया होता, तो मैं चाहे जो भी करता...जैसे भी करता, तेरी शादी उस युवक से अवश्य करवाता, जिसे तू प्यार करती थी...।”
वह चन्द पलों के लिए शान्त हुआ।
फिर कह उठा——“स्वाति, मैं तेरा हत्यारा उसी को मानता हूं, जिससे तू प्यार करती थी, अगर उस युवक ने तुझे पगलाया न होता तो तू मुझसे कभी जुदा न होती...मैं तेरी चिता की सौगन्ध खाकर तुझे वचन देता हूं स्वाति बहन, जब तक मैं तेरे हत्यारे को मौत के हवाले न कर दूं, न तो खुद चैन से बैठूंगा न उस हरामजादे को बैठने दूंगा...।”
कहते-कहते उस युवक का चेहरा सुर्ख हो गया।
आंखों में जुनूनी भाव गहराते चले गए।
¶¶
वह एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर था।
नाम था, गुनाजी निर्मल।
वह खूबसूरत लीची पार्क में उस युवती के फोटोग्राफ्स उतार रहा था।
जिसका नाम कजली था।
कजली ने मिनी स्कर्ट और टाइट टाप पहन रखी थी।
कजली मॉडल शूटर फैशन फोटोग्राफर से नए-नए पोज बनाकर फोटोग्राफ्स उतरवा रही थी।
गुनाजी निर्मल कजली के फोटोग्राफ्स बड़ी अदा से खींच रहा था।
“हो गया...।”
“क्या...?” गुनाजी निर्मल ने मुस्कुराते हुए पूछा।
“काम...।”
“कौन-सा काम...।”
“फोटो सेशन का...।”
“मैं कुछ और समझा था...।”
“क्या समझे थे तुम...?”
“मैं समझ रहा था कि तुम बच्चे पैदा करने वाले काम की बात कर रही हो...।”
“वह काम करना आता है तुम्हें...?”
“तुम क्या सोचती हो कि नहीं आता होगा...?”
“ना...।”
“फिर मानती हो आता है...।”
“क्या...।”
“वही काम जो मैंने तुम्हें अभी बताया...।”
“जब तुम काम करोगे, तब बताऊंगी...।”
“मतलब तैयार हो...।”
“फिलहाल तो मैं यह जानना चाहती हूं कि मैं मॉडल बन जाऊंगी ना...।”
“हां जरूर बनोगी...बनोगी ही नहीं बल्कि टॉप पर भी पहुंचोगी, मगर...।”
“मगर क्या...?”
“वादा करो कि तुम मुझसे एक बेबी जरूर पैदा करवाओगी...।”
“ऐ निर्मल...।”
“गुस्सा खा रही हो...?”
“अगर तुमने ऐसी बातें करनी बन्द नहीं की तो मैं तुम्हें ही खा जाऊंगी...।”
“डायन हो क्या...?”
“मैं रो पड़ूंगी...।”
“ना...ना ऐसा गजब मत करना। चलो मैं ऐसी बातें नहीं करता...।”
“तो मैं टॉप मॉडल बन जाऊंगी...।”
“हां...।”
“सच...।” कजली खुशी से झूमती हुई बोली——“मुझे विश्वास हो गया...।”
“मेरे बारे में क्या जानती हो तुम...?”
“बहुत कुछ...।”
“जैसे कि...।”
“जैसे कि तुम मुम्बई के मशहूर मॉडल शूटर हो, अपनी नीली आंखों से खूबसूरती को इस तरीके से कैद करते हो, कि खूबसूरती भी जिसे देख शर्मा जाती है...तुम यदि किसी खूबसूरत युवती पर मेहरबान हो जाओ तो वह युवती अवश्य ही टॉप पर पहुंचती है...।”
“ऐसा...।”
“बिल्कुल ऐसा...।”
“और क्या जानती हो मेरे बारे में...।”
“तुम वह मदमस्त भंवरे हो, जो पसन्द आए फूल का रस अवश्य पीता है...।”
“सच कहती हो तुम...तुम यदि अपनी तुलना फूल से कर रही हो, तो गुनाजी निर्मल को यह फूल पसन्द आया...। प्यालों का जाम पी सकता हूं क्या...।”
“जरूर...।”
गुनाजी निर्मल ने कजली के होठों को चूम लिया।
और बोला——“चलो...।”
“कहां...।”
“किसी बन्द जगह पर...जहां चाबी खो जाए और हम दोनों एक कमरे में बन्द हो जाएं...।”
“बेबी बनाने के लिए...?”
“हां...।”
“अगर बेबी बनाओगे तो मेरी फिगर न बिगड़ जाएगी और यदि फिगर बिगड़ गई तो मैं टॉप मॉडल कैसे बनूंगी...?”
“हां, यह बात तो है...।”
गुनाजी निर्मल ने कहा, उसके होठों पर मुस्कान नृत्य कर रही थी।
अगले पल——
उसने कजली के चेहरे को हाथों में भर लिया...।
और फिर उसका रस पीने में जुट गया।
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