मौत मेरी मंजिल
सुनील प्रभाकर
ग्लैशिया ने अखबार उठाया ही था कि उसकी नाक से जलते हुए आमलेट की 'बू' टकराई। उसके नन्हे-नन्हे नथूने सिकुड़ गए।
उसने सरसरी दृष्टि किचन की ओर दौड़ाई, फिर उच्च स्वर में बोली——“जेम्स...! तुम सकुशल तो हो?”
“जब तक बीवी जवान और खूबसूरत रहे तब तक एक नेक पति के अकुशल का प्रश्न ही नहीं उठता।” बर्तनों के खटर-खटर के बीच जेम्स का स्वर्ग उभरा था——“और फिर मैं तो एक हिन्दुस्तानी पति हूं। पत्नी सेवा हमारी नस-नस में समाई हुई है।”
“नॉनसेंस...!” ग्लैशिया नथूने फुलाकर बोली, फिर अखबार की सुर्खियों पर दृश्य दौड़ाने लगी।
सहसा वह चौंकी।
उसकी दृष्टि एक सुर्खी पर जमकर रह गई।
'सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक नीलकान्त जैन की हत्या'
नीचे समाचार था—गत रात्रि वयोवृद्ध वैज्ञानिक नीलकान्त जैन इस दुनिया में नहीं रहे। उनके निवास पर कुछ अज्ञात लोगों ने उनकी हत्या कर दी। मौका-ए-वारदात पर पहुंची पुलिस ने प्रेस को बताया कि नीलकान्त जैन को तड़पा-तड़पाकर मारा गया है। ऐसा लगता है जैसे उनसे कुछ उगलवाने के लिए बुरी तरह टॉर्चर किया गया—और फिर उनकी हत्या कर दी गई।
पुलिस विभाग में हड़कम्प मचा हुआ है कि उस एकांकी—विधुर वयोवृद्ध वैज्ञानिक ने किसी का क्या बिगाड़ा था, जो इतनी निर्दयतापूर्वक उनकी हत्या कर दी गई।
उल्लेखनीय है कि श्री जैन ने कई महत्वपूर्ण आविष्कार इस देश को दिए—तथा शहर से दूर एकान्त में बने अपनी आवासीय प्रयोगशाला में हरदम नित नए अविष्कारों में व्यस्त रहते थे।
श्री जैन की हत्या क्रूरता की पराकाष्ठा भी है और पुलिस के लिए एक पहेली भी—जिसे जल्द-से-जल्द सुलझाकर नग्न सच्चाई जनता के सामने पेश करके ही पुलिस अपनी स्वच्छ छवि बनाए रख सकती है।
बस समाचार यही तक था।
ग्लैशिया के जेहन में सुगबुगाहट-सी होने लगी।
समाचार सनसनीखेज था।
कुछ अधिक तो नहीं किन्तु वह इतना जानती थी कि नीलकान्त जैन देश के अग्रणी अनुभवी वैज्ञानिक में से एक थे।
एक बार एक समारोह में वह जेम्स के साथ मिल भी चुकी थी। हालांकि वह मुलाकात कुछ ही क्षणों की औपचारिक मुलाकात थी—किन्तु वह नीलकान्त जैन के शान्त व शालीन व्यक्तित्व से प्रभावित हुई थी।
तभी पांवों की आहटों का स्वर उभरा।
ग्लैशिया ने गर्दन घुमाकर देखा तो उसकी हंसी छूट गई।
जेम्स तो प्लेटों के साथ प्रकट हुआ था।
उसकी चाल में लड़खड़ाहट तो थी ही, आंखों से पानी बह रहा था और आंखें लाल थीं।
उसने प्लेटें टेबल पर रखीं और ग्लैशिया के सामने गिरता-सा बोला——“अब राज समझ में आया।”
“रा...राज...।”
“हां, इस देश की गृहणियां खाना बनाने के नाम से ही इतना क्यों घबराती है और क्यों पतियों को किचन में धकेलने के प्रयास में लगी रहती हैं।”
“जेम्स! मैं तुम्हारी पी०ए० हूं—तुम्हारी पत्नी नहीं।”
“मैं...तो...मैं साल दो साल आगे की भविष्यवाणी कर रहा था।”
“ओ शटअप...।” मैं इतनी मूर्ख नहीं कि तुम जैसे लंगूर से शादी करूं।”
“मैं लंगूर हूं?” जेम्स ने उसे घूरा था——“लगता है कि तुमने मुझे ध्यान से देखा नहीं।”
“देखा है—रोज देखती हूं। किन्तु शायद तुम अपनी शक्ल आईने में नहीं देखते।”
“देखता हूं डार्लिंग! रोज देखता हूं। तुम्हारी आंखों में मुझे अपनी शक्ल दिखाई देती है।”
“बेकार की बातें छोड़ो जेम्स! आई एम सीरियस...! अखबार पढ़ो।”
“यानी कि इतना मेहनती नाश्ता छोड़कर अखबार...! क्या बात करती हो डार्लिंग...! मैंने रात दस बजे न्यूज़ हेडलाइन सुनी थी—तब सोया था।”
“ये घटना रात में ही घटी—चूंकि कुछ प्रेसवालों को भी इस दु:खद घटना की खबर पुलिस के साथ-साथ मिल गई, इसलिए छपते-छपते ये समाचार भी छप गया।”
“लेकिन तुम तो फ्रन्ट पेज की ओर इशारा कर रही हो।”
“कोई समाचार निकालकर इसकी अनिवार्यता को देखते हुए स्थान दिया गया होगा।”
“ओह! किन्तु बात क्या है?”
“सर नीलकान्त जैन तुम्हें याद है न? वही—जो वयोवृद्ध वैज्ञानिक।”
“क्या हुआ—उन्होंने कोई नया आविष्कार कर डाला?”
“नो! वे अब इस दुनिया में नहीं रहे। गत रात किन्ही अज्ञात लोगों ने उन्हें निर्ममतापूर्वक मार डाला।”
“क...क्या?” चौंक बड़ा था जेम्स।
यूं ही नाश्ते की प्लेट हाथ से छूटते-छूटते बची।
उसने प्लेट टेबिल पर रखी और आमलेट का टुकड़ा कांटे के साथ यथास्थान छोड़कर अखबार पर झपटा।
अगले ही पल वह एक ही सांस में अखबार पढ़ता चला गया।
जैसे-जैसे वह अखबार पढ़ता जा रहा था—उसकी आंखें सिकुड़ती जा रही थीं।
ग्लैशिया ने उसकी यह हालत देखी तो मन-ही मन गम्भीर हो उठी।
जेम्स उन गिनी चुनी हस्तियों में से था, जो बड़ी-बड़ी घटनाओं की खबर सुनकर स्वयं को सामान्य रखने की क्षमता रखते थे।
जेम्स...।
सर जेम्स विलियम—एक सुप्रसिद्ध प्राइवेट जासूस—जो शक्ल से एक अंग्रेज नौजवान नजर आता था किन्तु वास्तव में वह एक हिन्दुस्तानी था और उसे अपने हिन्दुस्तानी होने पर नाज था।
उसकी मां अंग्रेज थी और पिता हिन्दुस्तानी। उसकी मां घूमने भारत आई थी और यहीं रह गई थी।
जेम्स उनकी इकलौती सन्तान—जो कि इस समय देश के सपूतों—जियालों में शुमार होता था।
ग्लैशिया एक खूबसूरत युवती—उसकी पी०ए०।
मन-ही-मन वह जेम्स को प्यार करती है—किन्तु उसने कभी ये बात उससे नहीं कहीं—उल्टे वह जेम्स को लंगूर कहकर चिढ़ाया करती है।
दोनों के जीवन का लक्ष्य! एकमात्र देश सेवा।
और जिसमें ये लक्षण हो—उन्हें अपनी सुख-सुविधाओं को त्यागकर कांटों भरी राह तो अपनानी ही पड़ती है।
जेम्स उसके मनोभाव को समझता था किन्तु वह जानता था कि वह एक जासूस है।
अगर उसके मित्रों की कमी नहीं तो शत्रुओं की भी कमी नहीं है। एक प्रकार से मित्रों से शत्रुओं की संख्या ज्यादा थी।
किस ओर से कब मौत उस पर झपटकर उसका खात्मा कर डाले, कुछ कहा नहीं जा सकता था।
इसलिए शादी जैसे भावुकता भरे सम्बन्धों को उसने जीवन में न तो स्थान दिया था—न ही देना चाहता था।
उसके विचार से भावुकतापूर्ण रिश्ते इंसान को कमजोर बना दिया करते हैं—और इंसान उसके भविष्य के बारे में सोचते हुए कायर बनने पर बाध्य हो जाता है।
सच ही था—उसके जैसे देश के जियाले पांवों में अपने हाथों बेड़िया डालने से रहे।
सरफरोशी की तमन्ना...! देश सेवा यही उसका मकसद! यही उसका उद्देश्य...!
¶¶
उन दोनों का नाम चंगू-मंगू था।
दोनों शहर में नऐ आए थे।
गांव से शहर की ओर...!
इस उम्मीद से कि वे शहर जाएंगे—नौकरी करेंगे और जब फिर गांव आएंगे तो उनके घर निराले होंगे।
ये इच्छा उनकी मजबूरी थी।
दोनों गरीब किसान के बेटे...! थोड़ी-सी जमीन—बूढ़े बाप ने किसी जमाने में बैंक का ऋण लिया था और चुका नहीं पाया था।
जिन्हें दो वक्त की रोटियां भी न जुटती हों, वे भला चक्रवृध्दि ब्याज समेत रकम कहां से जुटाते?
बूढ़े को कई बार भूमिधर बैंक के उस मोटे अमीन ने जेल में बन्द किया।
जब उसकी वसूली की रकम कहीं से पूरी नहीं होती थी तो वह ऐसे ही लोगों को पकड़कर जेल में बन्द कर देता था—और जनता से लेकर अधिकारियों तक में रौब गांठता था।
एक बार जब उसका बूढ़ा पिता खेत में धान बुवाई की तैयारी कर रहा था—खेत से ही उसे उस मोटे अमीन ने पकड़ा और भूखे-प्यासे जर्जर बूढ़े को जिला जेल में ले जाकर बन्दकर दिया।
वहां जहां संगीन जुर्मों के विचाराधीन कैदी रखे जाते थे। उस जर्जर बूढ़े से झाड़ू लगवाई जाती—कैदी हंसते कि वह कर्ज न देने जैसी मामूली जुर्म में जेल आया था और जब तक कोई उल्लेखनीय जुर्म न हो—जेल में कद्र कहां?
बूढ़े की वह अन्तिम जेल यात्रा थी। इस बार वह बाहर आया तो उसके कदम लड़खड़ा रहे थे।
घर पहुंचते ही वह लड़खड़ाकर गिरा।
“इससे अच्छा तो अंग्रेजन काई राज रहा।”
उसके मुंह से निकले दो अन्तिम शब्द थे।
चंगू-मंगू जुड़वां भाई—उन दिनों वे किशोरावस्था में थे।
उनके स्कूल छूट गए। घर की जिम्मेदारियां आ पड़ी। दोनों ने खेती का काम सम्भालने की चेष्टा की ही थी कि उन पर गाज गिरी।
उनकी जमीन नीलाम हो गई।
मोटे अमीन ने कहा—“सरकारी आर्डर है—वसूली सख्त है। हम मजबूर हैं।”
शब्द औपचारिक! इरादे दुर्दांत...!
दो छोटे-छोटे बच्चे आंसू भरी दृष्टि से अपनी जमीन को नीलाम होते देख रहे थे।
उपहास का पात्र बने।
उसके बाद शुरू हुए संघर्षों के दिन—मां इस सदमे को बर्दाश्त न कर सकी और उसे टी०बी० हो गया।
सरकारी अस्पताल का आश्रय—वहां पूरी दवाईयां या तो आती न थीं—आती थी तो कहां जाती थी—ईश्वर जाने या फिर वहां का स्टाफ।
जो दवाईयां दी जाती थीं, वे कारगर नहीं हुआ करती थी और कारगर दवाओं के लिए डॉक्टर नुक्से लिखते थे—जोकि केमिस्टों के यहां उपलब्ध थीं।
दो दिन इलाज चलता—एक हफ्ते बन्द रहता। वे मां को बचा न सके।
संक्षेप में मजदूरी करके उन्होंने पेट पाला और जवान हुए—किन्तु उनका नाता दरिद्रता से न छूटा।
उनके घर की आधी से अधिक जमीन उनके चाचा ने हथिया ली। मुसीबत के समय में अपनों ने उनकी यही मदद की कि दोनों के पास जो कुछ था सब कुछ छीन लिया।
दोनों भाई मजदूरी करते और आकर फूंस की झोपड़ी में सो जाते। अन्ततः वे एक दिन अजीज आ गए और उन्होंने शहर की ओर प्रस्थान कर दिया।
पढ़ाई-लिखाई मामूली—किन्तु दिमाग तेज।
यह अलग बात थी कि दरिद्रता ने उन्हें दीनहीन कर रखा था। वह भी कुछ क्योंकि उनके दिमाग कुन्द से हो गए थे।
दोनों स्टेशन पर उतरे।
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उनका कद लम्बा था।
कम-से-कम सात फुट लम्बा—शरीर दुबला और फिर अजीब ढंग से गोल और पिचका हुआ।
उसके शरीर पर मौजूद उस कोट व तंग पायजे की पतलून ने उसके कद में चार-चांद लगाए थे—और ऐसा लगता था जैसे चिड़ियों को भगाने वाला स्टेचू सहसा पांव उठाते हुए चल पड़ा हो।
उसके शरीर में टांगों के अतिरिक्त और कुछ न हिल रहा था।
चलने से उसके घुटनों की हड्डियां यूं बज रही थीं जैसे उसके शरीर की हड्डियों का ग्रीस कब का चुक गया हो।
अगर दिन का वक्त होता तो शायद लोग खड़े होकर तमाशा देखते।
किन्तु वही तमाशा देखने की सामर्थ किसी में न थी। उसके चेहरे पर दृष्टि पड़ते ही बड़े से बड़े दिल गुर्दे वाला इंसान भी चीख मारकर बेहोश हो सकता था।
जी हां! उसका चेहरा पीला था—सैकड़ों वर्षो से सो रहे मुर्दे की तरह पीला।
आंखें कटोरों में धंसी किन्तु सफेद व चमकदार...!
जी हां, उनकी आंखों के बीच का काला वाला हिस्सा काला होने के बजाय हल्का पीला था।
इस कदर कि वह आंख के सफेद हिस्से में पूरी तरह मिल गया लगता था—और पहली नजर में उसकी आंखें बिल्कुल सफेद दिखाई देती थीं।
ठीक बलगम के धब्बे जैसी।
नाक चौड़ी चपटी और होंठ पतले किन्तु दोनों कोरों पर उभरे हुए दो दांतों को ढकने में अक्षम।
ऐसा लगता था जैसे उनको जबड़े भींचे रखने का शौक हो—चेहरे पर तिल-सा तैरता हुआ, उसके चेहरे को जहां पीली चमक प्रदान कर रहा था वहीं उसके चेहरे की भयंकरता भी कई गुना बढ़ जाया करती थी।
उसकी एक आंख की पलक पूरी झपकी रहती थी—तथा उसकी आंख का आकार अप्रत्याशित रूप से बड़ा था।
वह चलता हुआ चौराहे पर पहुंचा।
चूंकि रात के दो बज रहे थे, इसलिए चौराहा सुनसान था।
वह आगे बढ़ता चला गया।
आगे पर्याप्त रोशनी नहीं थी इसलिए वहां चांद की रोशनी फैली हुई थी।
उसने आसमान की ओर आंखें उठाईं।
आकाश में चौदस का चन्द्रमा मुस्कुरा रहा था।
उसकी आंखों में अजीब-सी प्यास जाग उठी। चेहरे पर अजीब-सी बेचैनी उभर आई।
उसने आस-पास दृष्टि दौड़ाई। उसकी दृष्टि थोड़ा हटकर बनी एक खूबसूरत बंगले पर टिकी।
बांग्ला छोटा-सा था किन्तु बेइन्तेहा खूबसूरत था। ऐसा लगता था कि उसमें रहने वाले लोग अमीर होने के साथ-साथ तन्हाई पसंद भी थे तभी उन्होंने बंगला थोड़ा हटकर बनवाया था।
उसकी दृष्टि बंगले से जा चिपकी और वह रह-रहकर अपने सूखे होठों पर जुबान फेरने लगा।
उसकी सर्प जैसी दो भागों में बांटी जीभ उसके होठों पर घूमी—और अगले ही पल वह बुरी तरह बेचैन नजर आने लगा था।
उसकी अप्रत्याशित रूप से लम्बी भुजाएं फड़क उठी।
अगले ही पल उसके कदम उस खूबसूरत बंगले की ओर बढ़ते चले गए थे।
वह बंगले की दीवार के निकट पहुंचा ही था कि गली के वॉचमैन की दृष्टि उस पर पड़ी।
वह बगल की दीवार की ओर निकला था।
“ऐ...!” वह कड़ककर बोला——“उधर कहां जाता है इतनी रात गए—सुबह आना भीख मांगने।”
उस विचित्र शख्स के कानों में उसकी आवाज जैसे पहुंची ही नहीं थी।
वह पूर्ववत् आगे बढ़ता रहा।
वॉचमैन के होठ भिंच गए। वह लपककर उसके पीछे पहुंचा और डण्डे से उसके कन्धे पर उचककर दस्तक देता हुआ बोला——“तूने सुना नहीं भिखारी की औलाद! कहां उठ की तरह गर्दन उठाएं चला जा रहा है? चल भाग यहां से।”
प्रत्युत्तर में वो अजीबो-गरीब शख्स ठिठका—न केवल ठीठका वरन उसकी ओर घुमा।
वॉचमैन की दृष्टि उसके चेहरे पर पड़ी।
अगले ही पल उसके कण्ठ से लम्बी चीख निकली और उसकी आंखें दहशत से फैल गईं।
यूं कि उसके घुटने मुड़ने लगे।
ढह जाने के लिए।
लम्बा व्यक्ति सेकण्ड मात्र तक अपनी बलगमी आंखों से उसे देखता रहा, फिर वह घूमा और बंगले की ओर बढ़ता चला गया था।
बंगले की चारदीवारी की ओर!
बेहोश होने से पूर्व वॉचमैन ने उसकी ओर देखा तो पाया कि वह दीवार के निकट पहुंच चुका था।
अगले ही पल उसने देखा कि वह गायब हो चुका था।
यूं जैसे परछाई लुप्त हो गई हो।
उसने न तो उसे उछलते देखा था न ही दीवार की ओर छलांग लगाते देखा था।
उसे तो ऐसा लगा था जैसे वह दीवार में समा गया हो।
कारण यह कि वह गायब हो चुका था और दूर-दूर तक साफ-सफ्फाक दीवार चमक रही थी।
उसकी आंखें भय से थोड़ा और अधिक फैलीं और फिर लाख प्रयास करने पर भी वह अपनी डूबती चेतना को न रोक सका और बेहोश हो गया।
इसके अतिरिक्त चारा ही क्या था?
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