बिल्ली बोली म्याऊं मैं मौत बन जाऊं
माया मेमसाहब
“हाल्ट...हिली तो गोली मार दूंगा।” वह गुर्राहटपूर्ण लहजे में बोला।
मैंने देखा, पैंतीस एक साल का वह हट्टा-कट्टा खूबसूरत चेहरे वाला, एक पुलिस वाला था। उसके कन्धे पर चमकते तीन स्टारों को देखकर स्पष्ट पता चलता था कि वह इंस्पेक्टर रैंक का था।
मैंने उस पर एक भरपूर नजर डाली और अपने हाथ ऊपर उठा दिए।
मैंने सलवार कुर्ता पहना हुआ था। उरोजों पर चुन्नी डाली हुई थी।
मेरा हुस्नो-शबाब किसी भी फिल्मी हीरोइन से कम नहीं था। मेरे कट्स बहुत ही अच्छे थे। मैं किसी भी मर्द को अपने हुस्न से रिझाकर फांसने में महारत रखती थी।
वह मुझे घूर-घूरकर देखने लगा। उसके अन्दाज से मुझे अहसास हो गया कि वह मेरे हुस्न से जरा भी प्रभावित नहीं हुआ है। अगले पल उसके मुंह से भेड़िए जैसी गुर्राहट खारिज हुई—“चल...।”
“कहां...?”
“पुलिस स्टेशन और कहां...।”
“मेरा कसूर...।”
“कसूर तो ऐसे पूछ रही है जैसे कि जानती नहीं कि तू चीज क्या है...?”
“क्या चीज हूं मैं...।”
“बातें मत बना, मैं जानता हूं कि तू अण्डरवर्ल्ड की दादनी है...।”
“दादनी क्या होता है...।”
“गुण्डी...।”
“ऐ इंस्पेक्टर...।”
“गुर्रा मत...मैं जानता हूं कि तू माया मेमसाब है...।”
“सबूत...?”
“तेरी शक्ल ही काफी है...।”
“माया मेमसाब की शक्ल किसी ने देखी है क्या...?”
“नहीं देखी...।”
“फिर किस आधार पर कह रहे हो कि मैं माया मेमसाब हूं...?”
“थाने चल, सब पता चल जाएगा।”
“अगर ना जाऊं तब...?”
“मेरे हाथ में रिवाल्वर देख रही है ना तू...मैं इसकी आग तेरे सीने में भर दूंगा...।”
“आग है तुम्हारे पास...?” मैंने अदा से मुस्कुराते हुए पूछा।
“कहना क्या चाहती है...?”
“बीवी है तुम्हारी...।”
“नहीं...मैंने अभी शादी नहीं की...।”
“कुंवारे हो...।”
“हां...।”
“मैं थाने नहीं जाऊंगी...।”
“क्यों नहीं जाएगी...वहां मैंने तेरी तलाशी लेनी है...।”
“अपने घर ले चलो, खूब मजे से तलाशी दूंगी...।”
“मुझे पक्की खबर मिली है कि तेरे पास माल है...।”
“सो तो है...माल अपने घर में बरामद कर लेना, मैं कुछ ना कहूंगी...।”
“तेरा इशारा जिस तरफ है...मैं समझ रहा हूं...खूब समझ रहा हूं...मगर मैं तेरे हुस्न के जाल में फंसने वालों में से नहीं हूं...मैं अच्छी तरह जानता हूं कि तू अपने हुस्न का जादू चलाकर कई बार बच निकली है...। मगर मैं उन पुलिसियों में से नहीं हूं...।”
“हिजड़े हो क्या...?”
“ऐ...।”
“गुर्रा क्यों रहे हो! ऐसे हुस्न को छोड़ने वाला हिजड़ा ही तो होता है...।”
“चुपचाप चल...बातें मत बना...।”
“चलो...।”
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। वह मुझे जीप में ले आया, जीप की सीट के साथ मेरे हाथ में हथकड़ी पहनाकर हाथ बांध दिया।
मैंने कुछ ना कहा। वह भी कुछ ना बोला। जीप स्टार्ट की और थाने की तरफ जाने वाली सड़क पर दौड़ा दी।
मैं फंस चुकी थी।
मेरे पास पांच लाख की हेरोइन थी...जो मैंने अपने उरोजों में छुपा रखी थी। मैं जानती थी कि तलाशी के दौरान वह इंस्पेक्टर को मिल जानी है।
और हेरोइन की बरामदगी के बाद उसने मेरा पुलन्दा बांध देना है।
मैं उस थाने जाने की इच्छुक थी।
वहां पहुंचना मेरी योजना का एक अंग था।
इंस्पेक्टर मुझे पुलिस स्टेशन ले आया और महिला पुलिस को बुलाया। बोला—“डायना...।”
“यस सर...।”
वह महिला सब-इंस्पेक्टर बोली।
“इसकी तलाशी लो...।”
वह मेरी ओर सरकी।
“ठहरो...।”
वह ठिठककर रुकी और प्रश्नवाचक नजरों से मेरा चेहरा तकने लगी।
मैं मुस्कुराई और इंस्पेक्टर से मुखातिब हुई—“इसे मैं अपनी तलाशी नहीं दूंगी...।”
“क्यों नहीं देगी...?” इंस्पेक्टर गुर्राया।
“क्या तू इतना नहीं समझता...।” मैं अदा से मुस्कुराते हुए बोली—“तलाशी औरतें नहीं लिया करतीं, मर्द लिया करते हैं...।”
“तू कैसी औरत है जो कि मर्द से तलाशी लेने को बोल रही है...।” वह मुझे घूरते हुए बोला। उसकी निगाहें मेरे उरोजों पर स्थिर हो गई थीं।
मैंने उसकी आंखों में वासना के लाल डोरे तैरते हुए देख लिए।
मैं मुस्कुराई।
इंस्पेक्टर मेरी तलाशी ले, मेरी योजना का एक हिस्सा यह भी था।
मैंने एक मादक अंगड़ाई तोड़ी।
इंस्पेक्टर मुस्कुराया। उसकी अनुभवी निगाहें मुझे ऊपर से नीचे तक घूरती चली गईं।
उसके देखने का स्टाइल ऐसा था जैसे कि वह वस्त्रों के अन्दर मेरे हुस्न का दीदार कर रहा हो।
“तो तू तलाशी इसे नहीं देगी...?” वह गुर्राया।
“नमो...।”
“मुझे देगी...?”
“हमो...।”
“यह कौन-सी भाषा बोल रही है तू ससुरी...कभी नमो, कभी हमो।”
“नमो और हमो का मतलब नहीं जानता क्या तू...?”
“जानता हूं...।”
“तो फिर रेंक क्यों रहा है...।”
“ऐसा ना कह...तू औरत जात है...वर्ना दो थप्पड़ तेरे गाल पर रसीद कर देता...।”
“कर दे ना प्यारे...मैं तेरे थप्पड़ खाने के लिए मरी जा रही हूं...।” मैं उसकी आंखों में आंखें पिरोकर बोली।
मेरा इरादा उसे अपने हुस्नो-शबाब में पूरी तरह से जकड़ लेने का था।
मैं यह भी देख रही थी कि वह मेरे हुस्नो-शबाब के जाल में फंसता जा रहा है।
मैं!
माया मेमसाब...।
मेरी शख्सियत क्या है और क्या नहीं है, यह मैं अभी बताना उपयुक्त नहीं समझती।
अण्डरवर्ल्ड में माया मेमसाब को सभी जानते हैं।
किसी ने आज तक मेरी सूरत नहीं देखी।
कारण!
अण्डरवर्ल्ड में मेरे अनेकों रूप हैं। मैं भेष बदलकर अण्डरवर्ल्ड में काम करती हूं।
अण्डरवर्ल्ड मेरी चुस्ती और फुर्ती को देखकर मुझे भूखी शेरनी भी कहता है।
मेरा रूप-जाल ऐसा है...जिससे मैं जिसे फंसाना चाहती हूं, वह फंसता जरूर है।
ना फंसे तो फिर मुझे माया मेमसाब ही कौन कहे!
“आ...।”
“किसे कह रहा है...इस महिला को या मुझे...?”
उसने मुझे घूरकर देखा, बोला कुछ नहीं।
“घूर-घूरकर ऐसे क्यों देख रहा है मेरे लारे...यह तेरी लुगाई तो नहीं...।”
“कम बोल...।”
“ज्यादा बोलूंगी तो क्या तेरे पेट में मरोड़ उठेगा...तुझे लूज मोशन हो जाएंगे क्या...?”
उसने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया।
बल्कि वह महिला सब-इंस्पेक्टर से मुखातिब हुआ और बोला—“यह तुझे तलाशी नहीं देगी...मुझे ही देने के लिए कह रही है...इसलिए इसकी तलाशी मैं ले लूंगा, तू जा...।”
“मैं इस ओर किसी को आने तो ना दूं ना...?”
“यह भी कहने की बात है क्या...एक बार मैं तेरी तलाशी भी ले चुका हूं...तब कोई आया था क्या...?”
“मेरी वाली तलाशी में और इसकी ली जाने वाली तलाशी में बहुत फर्क है...।”
“मैं जानता हूं...तू जा...।”
वह गई नहीं। खड़ी रही।
“जाती क्यों नहीं...?”
“मैं देखना चाहती हूं...।”
“क्या...?”
“आपको तलाशी लेते हुए सर...।”
“तू सोचती है कि इससे बरामद माल को कहीं, मैं अकेला ना डकार जाऊं...।”
“नहीं...।”
“फिर...।”
“मैं माल का दीदार करूंगी...।”
“क्यों...क्या तेरा इरादा भी है...।”
“ना...।”
“फिर तू जा...।”
“ना...।”
“मैं कह रहा हूं...जा...।” इंस्पेक्टर गुर्राकर बोला।
उन दोनों की बातचीत में मुझे बड़ा ही लुत्फ आ रहा था।
मैं खिलखिलाकर हंस पड़ी।
“ऐ...हंसी काहे को है...?”
महिला सब-इंस्पेक्टर चली गई।
मैं बोली—“मेरी हंसी निकल गई...।”
“अभी तो मैं तेरी वो निकालूंगा...।”
“वो क्या...?”
“नहीं समझती...।” उसने मेरी आंखों में आंखें पिरोकर कहा।
जैसे कि मेरी आंखें सुई हों और वह धागा पिरो रहा हो।
“नमो...।”
“मैं समझाता हूं...।”
उसने कहा और मेरे बिल्कुल करीब आकर खड़ा हो गया।
मुझे निहारने लगा।
“ऐ, इस तरह क्या देख रहा है...?”
“तेरे गाल मौसमी की तरह रसीले हैं...।”
“रस चूसेगा...?”
“चुसवाएगी...?”
“मैं समझती हूं कि तेरे थाने के लॉकअप में हूं...इंकार नहीं कर सकती हूं मैं...।”
“तेरी सुई कैसी है...।”
“सुई...।”
“नहीं समझती क्या? मैं उस सुई की बात कर रहा हूं...जिसमें मुझे धागा पिरोना है...।”
“तुझे धागा पिरोना आता है...?”
“आता है...तभी तो कह रहा हूं...।”
“मगर तूने थोड़ी देर पहले कहा था कि तू अभी तक कुंवारा है...तेरी शादी नहीं हुई...फिर किसकी सुई में पिरो दिया तूने धागा...।”
“सच्ची बात तो यह है कि आज तक मैंने किसी भी सुई में धागा नहीं पिरोया...।”
“तब तो मजा आएगा...।” मैं खुशी से झूमकर बोली।
मुझे कुंवारे लड़के बड़े पसन्द थे। उनसे धागा पिरवाने में मुझे बड़ा आनन्द आता था।
मैंने अपने वस्त्र निकालकर एक ओर उछाल दिए।
मैंने उसे साफ-साफ बता दिया कि मेरे पास पांच लाख की हेरोइन है।
उसने कहा—“माया मेमसाब! बेशक तू सुई में धागा ही क्यों ना पिरवा ले...तेरे पास से हेरोइन बरामद हुई है...मैं तुझे जेल जरूर भेजूंगा...।”
मैंने बड़ी अदा से मुस्कुराते हुए कहा—“सुई-धागे का मजा क्यों बिगाड़ता है यार...तू मुझे बेशक जेल में डाल देना, मगर पहले धागा तो पिरो दे...या फिर कह दे कि तेरे पास धागा है ही नहीं...।”
“मुझे नामर्द बता रही है...!”
“इतनी देर से गुटर गूं...गुटर गूं कर रहा है मेरे कबूतर...जिनके पास धागा होता है...वह इतनी देर नहीं लगाते, मेरा रूप देख, परी जैसा है...मेरे होंठ देख, गुलाब की पंखुड़ियां हैं...मेरी आंखें देख, शराब के प्याले हैं...मेरे गाल देख, मौसमी का जूस है...मेरे उरोज देख, महकते हुए अनार हैं...मेरी सुई देख, क्या गजब ढा रही है...।”
मेरी कामुकता भरी बातें सुनकर वह लाजवाब हो गया।
मेरा उद्देश्य भी उसे लाजवाब कर देना था।
अगले पल उसने मुझे अपनी बांहों के शिकंजे में कस लिया।
मैं कसमसाई।
उसका बदन मैंने फौलाद का बना हुआ महसूस किया।
वह अपने शरीर को मेरे गुलाबी शरीर से रगड़ने लगा।
मुझे उत्तेजना का आभास होने लगा।
उसने अपने रसीले होंठ मेरे होंठों पर रखे तो मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसने जलते हुए अंगारे रखे हों।
उसने अपनी छाती से मेरे उरोज इस प्रकार जोर से भींचे कि मेरे मुंह से ‘ऊई’ निकल गई।
उसकी रगड़न से मुझे बड़ा आनन्द प्राप्त होता महसूस हो रहा था।
उसने मुझे जमीन पर लिटाकर मेरे दोनों अनारों का रसपान किया।
फिर वह मुझे गुदगुदी करने लगा।
मैं चिहुंक पड़ी बोली—“ऐसे नहीं...।”
“फिर कैसे...?”
“मैं मरी जा रही हूं...धागा पीरो दे...।”
“इतनी जल्दी भी क्या है...?”
“देर हुई तो फिर मैं तेरे काबिल नहीं रहूंगी...।”
“ऐसा...?”
“बिल्कुल ऐसा...।”
“तुझे चंगा लग रहा है ना...।”
“हां...।”
“एक बात बताएगी...?”
“इस समय बातें मत कर...धागा पिरो दे...।”
“ले पिरो दिया...।”
“तेरा धागा बहुत बढ़िया है...मशीन चला और सिलाई कर दे...।”
“पहले जो मैं तुझसे पूछूं उसका जवाब दे...।”
“ऐ...क्यों तरसाता है...धागा पिरो दिया तो मशीन भी चला दे ना...।”
“मेरे सवालों का जवाब दे...।”
“पूछ...।”
“तू माया मेमसाब है ना...?”
“नको...।”
“झूठ मत बोल...।” वह गुर्राया।
“मैंने सच कहा है...।” मैंने उसे कसकर अपने से भींचकर कहा।
“मुझे मालूम है कि तू माया मेमसाब है...।”
“तू समझता रह...मुझे क्या...।”
“मैं जानता हूं...माया मेमसाब पुलिस वालों के रगड़े में फंसने वाली नहीं है...तू क्यों फंसी...?”
“मैं माया मेमसाब नहीं हूं...।”
“बताएगी नहीं...।”
“बता तो रही हूं...।”
“ऐसे बताया जाता है क्या...?”
“तो फिर कैसे बताया जाता है...?”
“ऐसे...।”
उसने मुझे हिंडोले में झुला दिया।
फिर रुक गया।
“रुक क्यों गया? झुला ना...।”
“स्वीकार कर कि तू माया मेमसाब है...।”
“नहीं हूं...तो स्वीकार कैसे करूं...?”
“तूने अपने आपको पुलिस के रगड़े में क्यों फंसाया...?”
“मुझसे पूछताछ क्यों कर रहा है...हिंडोले में झुला ना...।”
“झुलाऊंगा और जरूर झुलाऊंगा...लेकिन उससे पहले स्वीकार कर कि तू माया मेमसाब है...।”
“मैंने कहा ना कि मैं माया नहीं हूं...।”
मैंने कहा और फिर उसे अपने ऊपर से परे धकेल दिया।
वह आश्चर्य से बोला—“ऐ! क्या हुआ तुझे...?”
“मुझे नहीं झूलना हिंडोले में...।”
“क्यों...?”
“बस नहीं झूलना...मेरे पास से पांच लाख रुपये की हेरोइन तूने बरामद की है...चार्ज तैयार कर, मुझे अदालत में पेश कर, अदालत मुझे जो सजा देगी, वह मैं भुगत लूंगी...।”
“मैं तुझे छोड़ सकता हूं...।”
“अपनी नौकरी से गद्दारी करेगा...?”
“तेरे लिए कुछ भी कर सकता हूं...।”
“क्यों...?”
“सच बात बोलूं...।”
“झूठ बोल दे...मुझे तेरी झूठी बात पर भी यकीन हो जाएगा...।”
“मैं तेरे से अब यह नहीं पूछूंगा...कि तू माया मेमसाब है या नहीं...।”
“इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता...।”
“मुझे पड़ता है...।”
“क्या...?”
“फर्क...।”
“क्यों...?”
“मैं तुझे हिंडोले में झुला रहा था...मैं खुद भी झूल रहा था...एकाएक ही तूने मुझे परे धकेल दिया...तेरे साथ मेरी जिन्दगी का यह पहला वाक्या है...मैं तेरी सवारी करना चाहता हूं...तू अपनी सवारी करने दे...मैं रब दी सौं खा कर कहता हूं...तेरे मामले में तेरी भरपूर मदद करूंगा...।”
मैं मुस्कुराई।
इंस्पेक्टर के लिए मेरी यही तो चाल थी!
मैं अपने हुस्नो-शबाब का जादू चलाती ही इसलिए हूं कि अपने शिकार से जो चाहूं, करवा लूं। शिकारी मेरी उंगलियों के इशारे पर उसी प्रकार नाचे जैसे शेर रिंग मास्टर के हण्टर के इशारे पर नाचता है।
मेरी एक खास आदत यह भी है कि मैं जब अपने हुस्नो-शबाब का जादू चलाती हूं ना, तो शिकार को हिंडोले तक ले जाती हूं और उसे मंझधार में छोड़ देती हूं...।
ताकि उससे जो काम में लेना चाहती हूं, वह ले सकूं।
और मेरे ऐसा करने से मुझे हण्ड्रेड वन परसेंट कामयाबी के चांस मिल जाते हैं।
और अब—
इंस्पेक्टर मेरे तलवे चाटने लगा था।
वह मेरे लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार था।
बस एक बार अपनी मशीन से मेरी सिलाई करने का ख्वाहिशमन्द था...।
वह मेरे बदन पर फूल फिरा चुका था।
उसे अहसास हुआ था कि मैं बड़ी नमकीन चीज हूं।
मगर अब मैं उसे घास डालने वाली नहीं थी।
ऐसी भी बात नहीं थी कि मैं उसे बिल्कुल ही घास नहीं डालती।
मैंने ना सिर्फ घास ही डालनी थी, बल्कि उसके नीचे बिछ भी जाना था।
उसके साथ हिंडोले की भरपूर सैर करनी थी...।
उसे सैक्स का सुख पहुंचाना था।
और खुद पाना था।
मगर इंस्पेक्टर से मुझे एक बहुत जरूरी काम लेना था।
इसलिए मैंने उसे अपने शबाब के भरपूर दीदार करवा दिए थे।
मैं उसे पूरी तरह अपने रूप-जाल में फांस ही चुकी थी।
वह मेरे लिए मर जाने की हद तक कोई भी काम करने के लिए तैयार हो चुका था।
मगर जो काम मुझे उससे लेना था, उसके लिए मुझे थोड़े समय का इन्तजार था।
एक तरह यूं समझा जा सकता है कि उसने मुझे गिरफ्तार नहीं किया था।
मैं खुद गिरफ्तार हुई थी।
मैंने एक फुल प्रूफ योजना बनाई थी...जिसके तहत उस इंस्पेक्टर की मुझे सख्त जरूरत पड़नी थी।
मगर अभी नहीं।
वह बोला—“मुझे झूल लेने दे माया...मैं सच कहता हूं कि मेरे जीवन में आने वाली तू पहली लड़की है...या तो तू मुझे हाथ ही ना लगाने देती...अब जब लगाने ही दिया है तो उतर जाने दे खेत में...हल चलाने दे...मैं तुझसे प्रार्थना करता हूं...।”
मैंने एक ओर पड़े अपने कपड़े उठाकर पहन लिए थे।
मैं मुस्कुराई। मैंने एक भरपूर मादक अंगड़ाई ली। बोली—“नाम क्या है रे तेरा...।”
“रेशम...रेशम सिंह...।”
“मुझे जरूर पाना चाहता है...?”
“हां...।”
“तू तो इस थाने का इंस्पेक्टर है...फिर कर ले ना मेरे साथ बलात्कार...थाने में मैं तेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकती हूं...।”
“मैं जबरदस्ती तुझे पाना नहीं चाहता...।”
“क्यों...प्यार करने लगा है मुझे...?”
“हां...।”
“माया मेमसाब से...?”
“हां...।”
“मगर मैंने तुझसे कहा है कि मैं माया मेमसाब नहीं हूं...।”
“उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता...।”
“मुझसे शादी करेगा...?”
“हां...।”
“ठीक है...।” मैं मुस्कुराते हुए बोली।
मेरी मुस्कान बड़ी ही कातिल थी।
“तू मेरा जिस्म पाना चाहता है...मैं तुझसे वादा करती हूं कि मैं तुझे अपना जिस्म जरूर सौंपूंगी...तू मेरी सवारी खूब करेगा...जी भरकर करेगा...मगर उसके लिए मेरी एक शर्त है...।“
“मुझे तेरी हर शर्त मंजूर है...।”
“शर्त सुने बिना हां मत कर रेशम सिंह...।”
“जो मैंने कहना था, कह दिया...।”
“अपनी नौकरी से नमकहरामी करेगा...?”
“तेरी खातिर...।”
“मुझमें ऐसा क्या है...जो मेरी खातिर तू अपने फर्ज को भी भूल जाएगा...?”
“तू नहीं जानती...।”
“जानती हूं...तेरे मुंह से सुनना चाहती हैं...।”
“तू मेरे दिल को भा गई है...और जो चीज मेरे दिल को भा जाए उसे में पाकर रहता हूं...।”
“तू एक पुलिसिया है...वह भी इंस्पेक्टर...अपने लिए मुझ जैसी दस चीजें उठाने की क्षमता रखता है तू...फिर मेरे ऊपर क्यों मरा जा रहा है...?”
“तूने एक कहावत सुनी होगी कि दिल आया गधी पर, तो हूर क्या चीज है...?”
“ऐसा मामला दिल का हो गया...?”
“हां...।”
“फिर बांध दे मेरा पुलन्दा...।”
“सवारी गांठ लूं...।”
“अभी ना, बाद में...।”
“तू जेल क्यों जाना चाहती है...?”
“बाद में तुझे सब कुछ मालूम होगा...।”
“अभी से मालूम नहीं करवा सकती तू मुझे...?”
“नको...।”
“ठीक है...मैं तेरी चार्जशीट तैयार करता हूं...।”
कहकर रेशम सिंह जाने के लिए पलटा। मैंने आवाज देकर उसे बुलाया। मैं अपनी जीत पर मन-ही-मन में खुश हो रही थी। मुझे अपने पर फख्र होने लगा था।
“सुन...।”
“हां...।”
“मेरे करीब आ...।”
वह आ गया।
“मेरे रस भरे होठों को चूम ले...मैं तुझे इजाजत देती हूं...।”
अगले पल उसने अपने तपते हुए होंठ मेरे होंठों पर रख दिए।
मुझे अपार सुख हासिल होने की मीठी-मीठी अनुभूति हो रही थी।
जबकि रेशम सिंह निहाल हुआ जा रहा था।
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admin –
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