भूखा हूं लाश चाहिए
राकेश पाठक
“बहुत दिनों से अमरपुर में कोई झगड़ा-फसाद नहीं हुआ है।”
नेता राम लाल के कथन पर उसके आसपास बैठे उसके चमचे चौंके तथा उसे सवालिया नजरों से देखने लगे।
अधेड़ उम्र के काले-कलूटे राम लाल ने गांधी टोपी उतारी तथा मक्खी के साइज वाले सफेद बालों को सहलाते हुए बोला—“तुम लोग तो यूं चौंके हो कि मानो हमने कोई बम फोड़ दिया हो—भई अमरपुर में दंगे-फसाद तो होते ही रहते हैं—कभी हिन्दू-मुस्लिम किसी बात पर खुद ही लड़ पड़ते हैं और कभी हम लड़वा देते हैं—भूल गए क्या अपना पिछला इलेक्शन—हमारे बाजे बज रहे थे—साफ नजर आ रहा था कि पब्लिक पार्टी का कैंडिडेट इस्लाम भाई विधायक बन जाएगा—उसके साथ मुसलमान तो लगे ही थे, हिन्दू भी उसके पीछे-पीछे डोल रहे थे।”
“वो चाल तो आपने खूब चली थी नेता जी...।” एक खूंखार चेहरे वाला युवक दाढ़ी खुजलाते हुए बोला—“आपने हिन्दू-मुस्लिम दंगे करा दिए थे—इतनी मार-काट मच गई थी कि हिन्दू-मुसलमानों के बीच नफरत की दीवार खड़ी हो गई थी और सारे हिन्दुओं ने आंखें मूंदकर आपको ही एक तरफा वोट दी थी और आप जीत गए थे।”
“वो तो जीतना ही था हमें...।” राम लाल ने शराब की घूंट भरी और कुत्सित मुस्कान के साथ बोला—“अमरपुर में हिन्दुओं की तादाद ज्यादा है तो हमारा पलड़ा भारी होना ही था—अपनी जीत को तय माने बैठे इस्लाम भाई के हाथों के तोते उड़ गए थे।”
“इस बार भी आप जीतेंगे नेता जी।”
“नहीं राका—हमें उम्मीद नहीं है—सत्ताधारी पार्टी में होते हुए भी हम इलाके के लिए कुछ ना कर पाए—सरकार से मिली ऐड को खा गए और चौबीस घण्टे अय्याशी में डूबे रहे—जबकि इस्लाम भाई लोगों से मिलता-जुलता रहा—उनके सुख-दुख में काम आता रहा—रिपोर्ट ये है कि इस बार हिन्दू पछता रहे हैं कि उन्होंने पिछले इलेक्शन में साम्प्रदायिकता के चक्कर में पड़कर इस्लाम भाई को हरा दिया था लेकिन इस बार उन्होंने इस्लाम भाई को जिताने का पक्का फैसला कर लिया है लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे...।” राम लाल का लहजा खूंखार हो चला—“अगली मर्तबा हमने इलेक्शन जीता तो मिनिस्ट्री पक्की—मुख्यमन्त्री ने हमें बुलाकर कहा है कि हमने इलेक्शन जीता तो हमें मिनिस्ट्री मिलेगी—मिनिस्टर बनकर ही हम दौलत का ढेर लगा सकेंगे लेकिन इस्लाम भाई हमारे इरादों की राह का रोड़ा बना हुआ है।”
“डोंट वरी नेता जी...।” राका शराब की घूंट भरकर बोला—“इस्लाम भाई को लुढ़का देते हैं—मैंने और मेरे चेलों ने आपके लिए बहुत खून बहाया है—ना जाने कितनों को मौत की गहरी नींद सुला दिया—फिर भला इस्लाम भाई को ठिकाने लगाने में क्या मुश्किल आएगी।”
“नहीं राका—इस्लाम भाई को मारने से कुछ नहीं होगा—इस्लाम भाई मरेगा तो उसकी पार्टी वाले उसकी बीवी को खड़ा कर देंगे—तब उसकी बीवी के प्रति सिंपैथी की ऐसी लहर चलेगी कि अपना पत्ता साफ हो जाएगा—इस्लाम भाई के कत्ल के बाद अगर लोगों को हम पर जरा-सा भी शक हो गया तो अपनी जमानत भी ना बचेगी—इस बार भी हमें पुरानी वाली चाल चलनी होगी।”
“कौन-सी चाल?”
“वो ही...दंगे वाली—कल अपने शहर में एक धार्मिक जुलूस निकलेगा—हमला कर दो—उसके बाद झगड़ा होने में देर नहीं लगेगी—अगर बढ़िया तरीके से दंगा ना भड़का तो अपने आदमियों से ये काम कराना—वो हिन्दुओं के भेष में मुसलमानों के इलाके में जाकर मार-काट मचाएंगे—मुसलमान बनकर हिन्दुओं के इलाके में हिंसा फैलाएंगे।”
“ठीक है नेता जी—मैं आज ही अपने आदमियों को इकट्ठा करता हूं—रात को मीटिंग रख लेते हैं—आप ही उन्हें समझा देना कि क्या करना है और कैसे करना है।”
“ठीक है—तुम अपने चेलों को पुराने गोदाम पर इकट्ठा कर लो—हम सबको समझा देंगे—जब तक ये दंगे चलेंगे पुराना गोदाम ही तुम्हारा अड्डा होगा—तुम्हारे चेले वहीं पर ठहरेंगे—उन्हें वहां किसी चीज की कमी नहीं होगी—खाने-पीने के सामान के साथ दिल बहलाने को लड़कियां भी मिलेंगी—हथियार और गोला-बारूद भी पर्याप्त मात्रा में पहुंचा दिया जाएगा।”
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“भगवान के लिए मेरे बेटे को छोड़ दो साहब...।” फटे-पुराने कपड़ों वाली बुढ़िया हाथ जोड़कर रोते हुए गिड़गिड़ाई—“मैं बीमार थी और डॉक्टर ने मेरे ऑपरेशन के लिए दस हजार मांगे थे—मेरा बेटा पढ़-लिखकर भी बेरोजगार है—इसने मेहनत-मजदूरी करके जो रुपए जमा किए थे, वो भी चोर चुरा ले गए थे—इसने मुझे बचाने को ही चोरी की थी।”
“मेरी मां सच बोल रही है इंस्पेक्टर साहब।” कोई अट्ठारह वर्षीय युवक बोला—“इसे बचाने को ही मैंने चोरी की थी—हालांकि सेठ जी की तिजोरी में लाखों रुपए और गहने भरे पड़े थे लेकिन मैंने मां के ऑपरेशन के लिए सिर्फ दस हजार ही लिए थे—पुलिस मुझे कभी भी नहीं पकड़ पाती लेकिन मेरे दिल पर बोझ था—मां के ठीक होने पर मैं सेठ जी के पास चला गया—अपनी चोरी कबूल की और उनसे कहा कि मैं धीरे-धीरे करके उनके दस हजार लौटा दूंगा लेकिन उन्होंने मुझे पकड़कर पुलिस के हवाले करना चाहा तो मैं भाग आया था—मुझे थोड़ा वक्त दीजिए—मैं सेठ जी की रकम लौटा...आह...!”
मोटी-मोटी मूंछों वाले इंस्पेक्टर ने युवक के पेट पर ठोकर मारकर गिरा दिया और दांतों को पीसकर बोला—“हरीश पांडे बोलते हैं मेरे को—जिस भी इलाके में जाता हूं, गुण्डे-बदमाश फरार हो जाते हैं—क्या मजाल कि कोई जुर्म हो जाए—जबसे मैं फुलत सिटी में आया हूं, यहां पर कोई वारदात नहीं हुई है लेकिन तूने चोरी करके मेरा रिकॉर्ड खराब कर दिया—तूने चोरी भी की तो मेरी होने वाली ससुराल में—सेठ घनश्याम की विधवा लेकिन इकलौती बेटी के साथ मेरी शादी होने वाली है—उस पर और मेरी होने वाली बीवी पर भला क्या असर पड़ा होगा—मैंने उन दोनों के सामने दावा किया था कि मेरे होते हुए मेरे इलाके में कोई वारदात नहीं होगी—चल थाने...तेरे को ऐसा सबक सिखाऊंगा कि याद रखेगा—साले को हथकड़ी लगाओ कॉन्स्टेबल।”
कॉन्स्टेबल ने हथकड़ी पहना दी उस लड़के को।
उसकी मां रोने-गिड़गिड़ाने लगी तो हरीश पाण्डे गुर्राकर बोला—“पीछे हट बुढ़िया—अगर तूने अपनी टांग अड़ाई तो तेरे सामने ही तेरे बेटे को गोली मार दूंगा।”
बुढ़िया सहमकर पीछे हट गई और अपने बेटे से बोली—“तू जा बेटे—मैं वकील साहब से मिलूंगी और तेरी जमानत कराऊंगी।”
“वकील के पास जाने से कुछ नहीं होगा बुढ़िया...।” हरीश पाण्डे कुत्सित मुस्कान के साथ बोला—“अगर तू मेरे होने वाले ससुर के दस हजार लौटा दे और दस हजार रुपए मुझे भी दे सके तो तेरे बेटे को छोड़ दिया जाएगा।”
“हमारे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है इंस्पेक्टर साहब—वकील की फीस के लिए भी पड़ोसियों के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा।”
“तो फिर मर—ले चलो, इसे।”
कांस्टेबल लड़के को धकेलते हुए चल दिया और उसे जीप में बिठाकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया।
हरीश पाण्डे जीप में सवार होकर बोला—“चलो...।”
जीप दौड़ पड़ी।
कोई दो-तीन किलोमीटर चलने पर हरीश पाण्डे ने जीप रुकवाई और लड़के से बोला—“मैं तेरी मजबूरी समझता हूं लड़के—तूने अपनी मां को बचाने के लिए चोरी की थी लेकिन मेरी भी मजबूरी है—तुझे नहीं पकड़ता तो होने वाले ससुर और बीवी नाराज हो जाती—तू एक काम कर कि जीप से उतरकर भाग ले—मैं लोगों को सुनाने को तुझे चेतावनी दूंगा लेकिन गोली नहीं चलाऊंगा—तू डरकर रुकना नहीं—कुछ दिन गायब होकर वापस लौट आना—फिर तेरे को कोई नहीं पकड़ेगा—अब मेरा मुंह मत देख—फौरन उतरकर भाग।”
लड़का जीप से उतरकर भागा।
हरीश पाण्डे के होंठों पर विषैली किस्म की मुस्कान थिरक उठी—उसने होलेस्टर से रिवॉल्वर निकाली तथा जीप से उतरकर चिल्लाया—“रुक जा लड़के—वरना गोली चला दूंगा।”
लड़का नहीं रुका।
तब हरीश पाण्डे ने रिवॉल्वर का ट्रिगर दबा दिया।
धांय...से गोली चली और लड़के के सिर में पेवस्त हो गई—वो बेचारा बिना चीखे ही धड़ाम...से गिरा और पल भर तड़फड़ाकर ठण्डा पड़ गया।
कॉन्स्टेबल जीप से उतरकर बोला—“आपने तो उसे मार दिया साहब।”
“तो क्या उस साले की पूजा करता...?” हरीश पाण्डे जख्मी नाग-सा फुंफकारा—“साले ने मेरी होने वाली ससुराल में ही चोरी की—इसे मारकर, मैं अपने होने वाले ससुर और बीवी की नजरों में चढ़ जाऊंगा—इस लड़के को खतरनाक मुजरिम साबित करके अपने अफसरों की वाह-वाही लूटूंगा और प्रमोशन भी हासिल करूंगा।”
तभी एक अधेड़ ने आकर हरीश पाण्डे को सलाम किया।
वो पुलिस का मुखबिर था।
“हां, बोल रानू—कृष्णदेव या अमरकान्त की कोई खबर लगी कि नहीं?”
“कृष्णदेव की तो खबर नहीं साहब लेकिन अमरकान्त जरूर आ गया है।”
“रियली?” हरीश पाण्डे खिले चेहरे के साथ बोला—“कहां मिलेगा वो?”
“वो अपनी बहन विजया के यहां है—जो कि पहले पुलिस अफसर थी लेकिन फिर उसके हाथ काट दिए गए थे—वो रिटायर्ड पुलिस ऑफिसर राजेश रस्तोगी की बीवी है, जो कि लंगड़ा है, नकली टांग लगाए रहता है—उसने अपना नया अखबार निकाला है—कल अखबार के दफ्तर का उद्घाटन है—अमरकान्त पुलिस के डर से कहीं चला गया—वो या तो रात को विजिया और राजेश के घर आएगा—वरना कल उद्घाटन के वक्त तो आएगा ही।”
“उस साले को कल ही पकड़ूंगा मैं—जब वो हाथ में आएगा तो उसका अंकल कृष्णदेव भी कहां बचेगा—दोनों पर लाखों का इनाम घोषित है—उन्हें पकड़कर मैं हीरो बन जाऊंगा—मेरी तस्वीरें अखबारों में छपेंगी—मुझे उन पर घोषित इनाम तो मिलेगा ही...साथ में प्रमोशन भी मिलेगा।”
“लेकिन साहब...सोच लीजिए—अमरकान्त कोई मामूली आदमी नहीं है—वो बहुत खतरनाक है—लोग उसे कत्ल की मशीन कहते हैं—ना जाने कितने कत्ल कर चुका है वो...कहीं आपको लेने के देने ना पड़ जाएं।”
“चुप...भूतनी के—तू अभी मुझे ठीक से नहीं जानता है—हरीश पाण्डे ने एक से एक खतरनाक मुजरिम को पकड़कर मौत के कफन में लपेट दिया—फिर वो साला अमरकान्त मेरे सामने भला क्या बिसात रखता है—साले को छठी का दूध याद दिला दूंगा—अगर वो शराफत के साथ गिरफ्तारी नहीं देगा तो उसे गोली मार दूंगा—उसे मारकर तो मेरी वाह-वाही हो जाएगी—बड़े-बड़े सूरमा भी मेरे नाम से थर्राने लगेंगे—कल का दिन अमरकान्त की तबाही का दिन साबित होगा।”
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सफेद चौक।
अमरपुर का मुख्य इलाका।
एक खास सम्प्रदाय के लोग वहां हीरे-जवाहरात का तथा आभूषणों का काम करते थे—सफेद चौक में उनके शानदार शोरूम तथा आलीशान रिहायशें थीं।
चूंकि दूसरे सम्प्रदाय का जुलूस उस इलाके से गुजरने वाला था—इसलिए सफेद चौक के लोगों ने जुलूस के भव्य स्वागत की तैयारियां की हुई थीं।
पूरे चौक को सजाया गया था—चाय व नाश्ते का भी बंदोबस्त किया गया था। एक स्टॉल देसी घी के हलवे का भी लगाया गया था—इतना ही नहीं, होली खेलने के लिए गुलाल का भी बंदोबस्त किया गया था।
सभी दुकानदारों ने जुलूस का स्वागत करने के लिए अपनी दुकानदारी का ख्याल छोड़ दिया था और इधर-उधर भागे फिर रहे थे।
छतों पर औरतें तथा बच्चे चढ़े थे और उन्हें जुलूस के स्वागत के लिए फूलों की टोकरियां दी गई थीं।
ढोल-नगाड़ों की आवाज आने पर सफेद चौक वालों की गतिविधियां बढ़ गईं—कुल्हड़ों में चाय उड़ेली जाने लगी और कागज की प्लेटों में हलवा परोसा जाने लगा। जुलूस सफेद चौक में दाखिल हुआ।
छतों से फूल बरसने लगे।
सफेद चौक वाले जुलूस में शामिल लोगों को सीने से लगाकर बधाइयां देने लगे और जलपान के लिए आग्रह करने लगे।
अपना भव्य स्वागत होते देखकर जुलूस में शामिल लोग प्रफुल्लित होने लगे।
तभी कुछ लोग जुलूस में शामिल हो गए—उन्होंने सफेद चौक वालों के जैसे हुलिए बनाए हुए थे—उन्होंने चाकू तथा रिवॉल्वर निकाली तथा जुलूस में शामिल लोगों पर हमला बोल दिया।
चीख-पुकार मच गई।
“दंगा हो गया...झगड़ा हो गया...।” जुलूस वालों के हुलिए वाला एक गुण्डा गला फाड़कर चिल्ला उठा—“सफेद चौक वालों ने हमारे आदमियों को मारना शुरू कर दिया है—भागो...जान बचाओ...।”
भगदड़ मच गई।
“नहीं, भागो मत...।” एक गुण्डा चिल्लाया—“सफेद चौक वालों ने हमारे जुलूस पर हमला किया—हमारे कई आदमी मार दिए हैं—हम लोगों को बदला लेना है:: देखते क्या हो—सालों को मारो—वरना लोग हमारी कौम को बुजदिल बोलेंगे, कायर कहेंगे—अगर हथियार ना हों तो ईंट-पत्थर उठा लो।”
आम आदमी को तो अपनी जान की पड़ी थी लेकिन गुण्डों ने मार-काट शुरू कर दी—उन्होंने हथियारों तथा बमों का खुलकर इस्तेमाल किया।
वो दुकानों पर बम बरसाने लगे और लूटपाट भी करने लगे।
एक गुण्डे ने छत पर खड़ी भीड़ पर बम फेंक मारा।
धड़ाम ऽऽऽ।
कर्णभेदी धमाके के साथ अनेकों औरतों तथा बच्चों के परखच्चे से उड़ गए।
पेट्रोल की आग की तरह ही झगड़े की खबर इलाके में फैल गई—जब लोगों को मालूम पड़ा कि उनके सम्प्रदाय के लोगों की दुकानों को लूटकर बमों से उड़ाया जा रहा है और बमों से अनेक औरतों तथा बच्चों को उड़ा दिया गया है तो दिलेर किस्म के लोगों ने चिल्लाकर कहना शुरू कर दिया—
“बाहर निकलो भाइयों—दूसरे सम्प्रदाय के लोग जुलूस की आड़ में हम पर हमला बोलने आए हैं—उन्होंने हमारी दुकानें लूटकर उड़ा दीं—हमारी औरतों और बच्चों को मार रहे हैं—हमारे भाइयों को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया—इससे पहले कि वो हमला बोलते हुए हमारे घरों में घुस आएं—हथियार उठाओ और चौक पर चलकर बदला लो।”
“मर्द बनो भाइयों।” एक जवान तलवार लहराते हुए चिल्लाया—“अगर बुजदिलों की तरह चूड़ियां पहनकर घरों में दुबके रहोगे तो वो लोग यहीं आकर लूटपाट और कत्ल करेंगे—हमारी बहन-बेटियों की इज्जत लूटेंगे वो।”
बस फिर क्या था?
जिसके हाथ में जो भी हथियार लगा, वो उठाकर चल दिया—।
औरतें अपने बच्चों के साथ घरों में बन्द हो गईं।
सैकड़ों की तादाद में विभिन्न गलियों से हथियारबन्द लोग सफेद चौक पर पहुंचे और दूसरे सम्प्रदाय वाले लोगों को मारने-काटने लगे।
दंगे की आग एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच गई।
जो लोग दिलेर थे, वो हथियार उठाकर घरों से निकल पड़े—जो कम दिलेर थे, वो छतों पर चढ़कर फायर करने लगे और जयकारे लगाने लगे।
“अल्लाह हू अकबर...।”
“जयकारा वीर बजरंगी...हर-हर महादेव...।”
फायरिंग तथा जयकारों से मानो आसमान गूंजने लगा।
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