आतंकवाद
सुनील प्रभाकर
“मार गयो रे! रसगुल्ला घुमाई के...! मार गयो रे!” दूध वाला भैया गुणीराम गाता हुआ उस छोटे से मकान के सामने पहुंचा।
मकान छोटा-सा था।
बमुश्किल दो-तीन कमरों वाला।
उसने साइकिल खड़ी की।
“बाप रे...! आज तो हमने देर कर दी। रजत बाबू फिर फजीता करेंगे—चाय के इंतजार में बैठे होंगे वे...! उफ्...!” वो बड़बड़ाया फिर उच्च स्वर में बोला—“नूरा बेटी...! दूध का बर्तन लाना...!”
कहते हुए उसने दूध की केन खोली।
भीतर झांका।
“बाप रे...! ये तो दूध भी कम है। अब पड़ेगी मार...! रजत बाबू कान खींचकर खरगोश की तरह लम्बा कर देंगे। अब क्या करूं—? आइडिया! थोड़ा पानी मिलाता हूं। अगर शिकायत हुई तो कह दूंगा कि भैंस पानी ज्यादा पी गई थी।” कहने के साथ ही उसने आसपास दृष्टि घुमाई।
तकदीर अच्छी थी।
निकट ही एक हैण्डपम्प नजर आ गया।
उसकी आंखें चमकी किन्तु तभी उसे याद आया कि अगर पानी भरने के दौरान ही दरवाजा भड़ाक से खुल गया तो? तो वो रंगे हाथों पकड़ा जाएगा। ये सोचते हुए उसने आशंकित दृष्टि से दरवाजे की ओर देखा।
दरवाजा बन्द था।
पूर्ववत्!
दरवाजे के पार कोई आहट नहीं।
फिर भी—कुछ भी हो सकता है—उसने सोचा।
व्यर्थ में पहले आवाज दे दी—अपना काम करके तब आवाज देनी थी। कोई बात नहीं—अगर पानी भरते किसी ने देख भी लिया तो वो कह देगा कि केन में कीचड़ लग गया था—उसे धोना है।
सोचते ही उसने अपनी पीठ ठोकी—बाकायदा एक हाथ घुमाकर—फिर आसपास देखा।
उस समय दुनिया का बच्चा-बच्चा उसे चुगलखोर नजर आ रहा था किन्तु यहां भी तकदीर ने उसका साथ दिया।
आसपास क्या दूर-दूर तक गली सुनसान पड़ी थी।
वो दौड़ा।
हैण्डपम्प की ओर...!
“हे कृष्ण मुरारी! ये नल पानी देने वाला हो। ये कम्बख्त नगरपालिका के नल पानी कम देते हैं और जगह अधिक घेरते हैं।”
उसने हैण्डपम्प का हैण्डल ऊपर नीचे किया।
हैण्डपम्प से जलधार फूटी।
वो खिल उठा।
केन का ढक्कन वो साथ लाया था।
उसने फौरन उसे नीचे लगाया—ढक्कन पानी से भर गया। वो उसे लेकर भागता हुआ दूध की केन तक पहुंचा—पानी केन में डालकर उसने फुर्ती से आसपास देखा।
कारण ये कि दरवाजा बन्द था। ज्यों का त्यों!
किन्तु ये उसकी आशंका मात्र थी। दूर-दूर तक गली सुनसान ही पड़ी हुई थी।
उसके होंठों पर वैसी मुस्कान आ गई, जो तेन सिंह हिलेरी के होंठों पर तब उभरी होगी जब उन्होंने एवरेस्ट पर विजय पाई होगी।
“रजत...बाबू...! दरवाजा खोलो...!” उसने दमदार आवाज में हांक लगाई।
कहीं कोई आहट नहीं।
गुणीराम को तनिक आश्चर्य हुआ।
उसने आंखें भैंगी करके सिर पर चढ़ आए सूरज को देखा।
तभी उसके पीछे साइकिल की खड़खड़ाहट का स्वर उभरा।
उसने देखा—वो खिलावन था।
न्यूज पेपर का हॉकर!
“क्या बात है भाई गुणीराम...?” खिलावन पेपर मोड़कर दरवाजे के नीचे सरकाते हुए बोला—“क्यों हकबकाए खड़े हो?”
“कुछ नहीं अखबारी काका...! तुमने तो अखबार मोड़ा और नीचे सरकाकर चलते बने। हम दूध कैसे दें—दरवाजा खुल ही नहीं रहा है ना।”
“दूध भी दराज से नीचे डाल दो ना...! बह जाएगा भीतर...!”
“मजाक नहीं खिलावन भैया...! इस घर के लोग कहीं गए तो नहीं हैं—दरवाजा खुल ही नहीं रहा है।”
“तुम्हारा दिमाग खराब है, अगर वो कहीं गए होते तो दरवाजा बाहर से बन्द होता—तुमने दरवाजा धकेल कर देखा?”
“हां! भीतर से बन्द है।”
“आंख लग गई होगी। दरवाजा ठोक...! जाग जाएंगे। कुछ भी हो, रजत बाबू अमीर बाप की बिगड़ी औलाद ही तो हैं। वो तो ना जाने कैसे नूरा बीबी से प्रेम कर बैठे और घर से अलग कर दिए गए किन्तु शादी कर ली।”
“तुम ठीक कहते हो। मैं दरवाजा ठोकता हूं।”
कहने के साथ ही वो दरवाजा ठकठकाने लगा था।
खिलावन उसे हिदायत करके तेजी से आगे बढ़ गया था।
आज उसे भी देर जो हो गई थी।
¶¶
“हवलदार भुलक्कड़ सिंह!”
“यस सर!”
“लो लड्डू खाओ।”
“लड्डू सर...! किस खुशी में? आपके लड़का हुआ है क्या?”
“शटअप...! मर्दों के भी लड़का होता है?” इंस्पेक्टर हवा सिंह मुंह बनाकर बोला था—“भई बात ये है कि तुम्हारा ट्रांसफर हो गया है। मुझे तुम जैसे भुलक्कड़ से इतने लम्बे अरसे बाद निजात मिली है—म...मेरा मतलब तुम्हारी विदाई समारोह स्वरूप ये लड्डू...!”
“इस एक लड्डू से क्या होगा सर...? मेरा विदाई समारोह है...इसलिए आप...!”
“ओह समझा! दस-पांच लड्डू ले लो...!”
“दस-पांच नहीं पूरा थाल...दीजिए सर...! बच्चों को खिलाऊंगा। फिक्र मत कीजिए—रास्ते में जो मिलेगा बांटता हुआ जाऊंगा।”
“गुड...! ये लो पकड़ो थाल...! जाओ, बच्चों समेत मौज करो।”
हवलदार भुलक्कड़ सिंह ने थाल पकड़ा और उधर बढ़ा जिधर उसका फ्लैट पड़ता था।
इंस्पेक्टर हवा सिंह ने मीलों लम्बी राहत भरी सांस छोड़ी और घूमना ही चाहता था कि चौंक गया।
एक कॉन्स्टेबल हवलदार भुलक्कड़ सिंह को रास्ते में मिला था—उसने उसको लड्डू देते हुए कहा था—“लो धनीराम...लड्डू खाओ।”
“किस खुशी में सिंह साहब—?”
“वो...वो...हां याद आया...एस०ओ० साहब के लड़का हुआ है।”
“भूल गया...भूल गया साला...!” हवा सिंह ने दांत पीसे।
किन्तु कुछ बोला नहीं।
भुलक्कड़ सिंह से निजात जो मिल गई थी।
कहीं बधाइयों का तांता ना लग जाए—इसलिए वो अपने ऑफिस में घुस गया।
¶¶
“लीजिए सर...! लड्डू खाइए...!”
“क्या? क्या कह रहे हो हवलदार भुलक्कड़ सिंह?”
“यस सर...! आधे-आधे लड्डू फोड़कर अलग-अलग रखे हुए हैं, आप एक टुकड़ा उठा लीजिए किन्तु इससे ये मत समझिएगा कि मेरी खुशी भी टुकड़े-टुकड़े है। मेरी खुशी पूरी है। वो क्या है कि कल के आप वाले लड्डू बच रहे थे, सोचा इस खुशी के मौके पर बांट दूं।”
“ल...लेकिन बात क्या है हवलदार भुलक्कड़ सिंह—?” हवा सिंह उत्सुकता के साथ बोला।
“वो क्या है सर...कि सुनेंगे तो आप खुशी से उछल पड़ेंगे।”
“ऐसा?”
“बिल्कुल सर...!”
“बोलो भी...! सस्पेंस क्रिएट मत करो।”
“वो क्या है सर...? ऊपर वाला बड़ा कारसाज है, करिश्मेसाज है, जो कुछ करता है वही करता है। अपनी तो केवल हवा ही हवा है।” हवलदार भुलक्कड़ सिंह ने हवा सिंह की नकल उतारी थी।
प्रत्युत्तर में हवा सिंह ने उसे घूरकर देखा।
हवलदार भुलक्कड़ सिंह परे देख रहा था।
“बताओ भी हवलदार भुलक्कड़ सिंह! बात क्या है?”
“बता दूं सर...!”
“कम ऑन!”
“कुछ अहमकों ने मेरा ट्रान्सफर करा दिया था।”
“क्या?”
हवा सिंह चौंका था।
“यस सर...! किन्तु ऊपर वाले का शुक्र है कि मेरा ट्रान्सफर रुक गया है। अभी-अभी जब आप घर पर गए थे तब हैडक्वार्टर से फोन आया था।”
“क्या—?” हवा सिंह की आंखें फैल गईं—खोपड़ी भक् से उड़ गई।
“सर...! ये अधिकारी क्यों नहीं समझते कि मैं आपसे कितना लगाव रखता हूं? पूरे महकमे में आप ही मेरे अपने हैं, जिससे मेरी पटती है। आपको छोड़कर...मैं कहीं नहीं जा सकता।”
“य...ये हुआ कैसे...?” हवा सिंह भिंचे स्वर में बोला था।
“ऊपर वाला करिश्मेसाज है। अपनी तो...!”
“हवलदार भुलक्कड़ सिंह...!”
“मैंने कप्तान साहब की पसंद का पता लगाया। पता चला कि उन्हें हरे कद्दू की सब्जी बहुत पसन्द है। बस मैंने एक रेहड़ी पर आठ-दस कद्दू रखे और सुबह-सुबह जा पहुंचा और उनके पांव पकड़ लिए। बताया कि ये कद्दू मेरे खेतों में उगे हैं—सौगात के तौर पर लाया हूं, आप मेरा ट्रान्सफर रुकवा दें हुजूर...! बस फिर क्या था! छोटी-छोटी गोलियों का इतना बड़ा असर होता है—और फिर वो तो तोप के गोलों से भी बड़े कद्दू थे—असर कर गए हुजूर! और मैं आपके श्री चरणों में रह गया। लीजिए लड्डू का एक टुकड़ा और भी उठाइए ना...!”
प्रत्युत्तर में हवा सिंह का चेहरा देखने के लायक था।
तभी!
फोन की घण्टी बजी।
हवा सिंह ने क्रुद्ध दृष्टि के साथ फोन को घूरा।
किन्तु वो फोन था, उसका मातहत नहीं—इसलिए दहशत खाने का प्रश्न ही नहीं उठता था।
फोन की घण्टी बजती रही।
उसने रिसीवर उठाया।
हवलदार भुलक्कड़ सिंह लड्डू बांटने के लिए बाहर निकल चुका था।
¶¶
प्राइवेट जासूस सर डेरिक जेम्स ने अपने ऑफिस में कदम रखा।
उसकी दृष्टि सीधी अपनी असिस्टेंट चिन्ना पर पड़ी।
वो बड़ी ही तन्मयता से अपना काम कर रही थी।
रजिस्टर पर झुकी।
आहट पाकर उसने सिर उठाया।
डेरिक जेम्स पर दृष्टि पड़ते उसने बुरा-सा मुंह बनाया। रजिस्टर परे सरका दिया।
“चूजी डार्लिंग ये क्या? तुमने काम बन्द कर दिया?”
“हां...!” चिन्ना शुष्क स्वर में बोली—“जब कोई बेवकूफ निकट खड़ा हो तो दानिशमन्द को सबसे पहले उस बेवकूफ को दफा करने का प्रयास करना चाहिए।”
“यानी कि मैं बेवकूफ हूं—?”
“मैंने ऐसा तो नहीं कहा—हां अगर तुम कह रहे हो तो मैं यही कह सकती हूं कि मैं तुम्हारी राय से इत्तेफाक करती हूं।”
“चूजी! मैं तुम्हारा बॉस संकटा पांडे उर्फ सर डेरिक जेम्स इंडिया का सुप्रसिद्ध प्राइवेट डिटेक्टिव हूं। तुम हमें बेवकूफ कह रही हो?”
“चिन्ना ने ऐसा कुछ नहीं कहा, जो कुछ कहा तुमने स्वयं कहा। मैंने तुम्हारी राय से इत्तेफाकी का दवा इसलिए किया क्योंकि तुम मेरे बॉस हो और बॉस की राय से इत्तेफाक करना—हां-में-हां मिलाना हर मुलाजिम का कर्तव्य होता है। खास तौर पर उस मुलाजिम का जिसे तीन महीने से तनख्वाह ना मिली हो। वो अपने बॉस की हां-में-हां मिलाने पर बाध्य इस उम्मीद से होता है कि शायद उसकी अड़ी-फंसी तनख्वाह मिल जाए। रहा सवाल प्राइवेट डिटेक्टिव होने का, तो उपन्यास जगत में कामयाबी के नशे में चकनाचूर लेखक अक्सर ये दावा करते हैं कि वे इंडिया के ही नहीं एशिया के सबसे अधिक बिकने वाले लेखक हैं किन्तु ये दावा कितना सही होता है—तुम स्वयं जानते हो।”
“तुम कहना क्या चाहती हो चूजी डार्लिंग—?”
“यही कि आज तीसरे माह की उनतीस तारीख है, जब मुझे तनख्वाह नहीं मिली।”
“धीरज रखो चूजी डार्लिंग! वो कहते हैं ना कि आस कह रही श्वास से कि धीरज रखना सीख—बिन मांगे मोती मिले—मांगे मिले ना भीख...!”
“जेम्स...!”
“कहती रहो...!”
“अगर तुम्हारा यही रवैया रहा तो तनख्वाह मुझे कभी नहीं मिलेगी। कल इस माह का छठा केस आया और तुमने उसे भी इंकार कर दिया?”
“हां!” जेम्स ने उसके सामने की चेयर सम्भाली—“इसलिए कि उस केस में कोई दम नहीं था। केस के नाम पर कलंक था वो...!”
“क्या मतलब—?”
“मतलब ये कि सेठ मीरचन्दानी की ओर से केस आया था। उसका कहना था कि मैं उसकी बीवी की जासूसी करूं। वो किससे मिलती है—उसकी पीठ पीछे किससे इश्क फरमाती है—इसकी डिटेल सबूतों के साथ दूं। मैंने कहा कि ये कौन-सा केस हुआ भला...! इस पर वो बोला कि सेठ साहब का महत्वपूर्ण केस है। मुंह मांगी रकम देंगे। मैंने उसे खरी-खोटी सुनाई और कहा कि जाकर कहो उस सेठ के बच्चे से कि वो नोट छापने के बजाय अपनी इज्जत सम्भालना सीखे—शादी उसने की है सजा भी वही भुगते—रहा सवाल रकम का, तो वो उसे अपनी नाक में डाल ले...!” ऐसी रकम पर थूकता हूं मैं...!”
“जेम्स...!” चिन्नी उर्फ चिन्ना ने उसे घूरा—“बाहर बोर्ड पर लिखा है कि एक निश्चित फीस के बदले हर कोई हमारी सेवाएं हासिल कर सकता है। अधिक-से-अधिक मुंह मांगी फीस—बस—इससे अधिक हम कुछ नहीं कर सकते। फीस के बदले वो जो केस हमारे सुपुर्द करे उसे सॉल्व करना हमारा कर्तव्य है।”
“इसे तुम कर्तव्य कहती हो चूजी डार्लिंग! ये अमीरों के चोंचले हैं। कोई आता है कहता है, बीवी की जासूसी करो—बीवी आती है कहती है मियां की जासूसी करो। कोई कहता है कि उसकी बेटी अमुक लड़के के साथ भाग गई, उसे ढूंढो। ये क्या बात हुई भला? धन के नशे में चूर होकर खुद अय्याशी करेंगे तो बच्चे उनके नक्शे-कदम पर चलेंगे ही। उनके बाद अगर उनकी संतान किसी से प्रेम कर बैठेगी तो वो उस पर पहरे लगा देंगे और ये चाहेंगे कि वो वहीं शादी करे जहां वे चाहते हैं। जैसे संतान ना होकर खरीदा हुआ शेयर हो। ऐसे में बेटी प्रेमी के साथ भागी तो मैं क्या कर सकता हूं? अमां केस उसे कहते हैं जिसमें देश, समाज या इंसानियत में से किसी का भला होता हो।”
“जेम्स! तुम भूखे मरोगे।”
“ये आशीर्वाद सम्भालकर रखो। मत भूलो कि तुम भी हो मेरे साथ...!”
“मैं तुम्हारी तनख्वाह की मोहताज नहीं।”
“मैं भी ऐसे उटपटांग क्लाइंटो का मोहताज नहीं। एक बोर्ड और लगवाना पड़ेगा कि मियां-बीवी, प्रेमी-प्रेमिकाओं—प्रेमियों के साथ भागी लड़कियों को ढूंढने सम्बन्धित केस नहीं लिए जाते। न ही लव लैटर चुराने का काम किया जाता है।”
“जेम्स प्लीज...! समझने की चेष्टा करो।”
“मैं समझ चुका हूं। वैसे चिन्ता मत करो—मेरी छठी इंद्री कहती है कि शीघ्र ही मुझे कोई बढ़िया-सा काम मिलेगा। ऐसा जो दिलो-दिमाग की चूल हिला देगा। धन चाहे कम मिले लेकिन शोहरतों के झण्डे गड़ेंगे।”
“इंस्पेक्टर हवा सिंह इसी थाना क्षेत्र में है।”
“परवाह नहीं—उसकी हवा भी देख लेंगे किन्तु खबरदार जो ऐसे उटपटांग केस लिए।”
“अभी-अभी एक केस आया था।”
“अच्छा...!”
“एक अमीरजादी आई थी। उसकी शादी तय हुई है। वो जानना चाहती है कि उसके होने वाले पति के कुल कितने अफेयर हैं। आई मीन कितनी लड़कियों के साथ...!”
“फिर...?”
“मैंने वापस कर दिया। ये समझाते हुए कि बेहतर हो कि वे शादी करें ही नहीं क्योंकि जो शादी शक की बुनियाद पर ही खड़ी हो, वो केवल दु:ख दे सकती है सुख नहीं।”
“अरे वाह! बहुत अच्छा किया। आओ, तुम्हारा मुंह चूम लूं...!”
“शटअप जेम्स! खबरदार जो बेहूदेपन पर उतरे—मुंह नोच लूंगी तुम्हारा।”
“तुम मेरे प्यार को बेहूदापन कह रही हो...! लानत है! सौ बार लानत...! खैर! आओ चलें...!”
“क...कहां—?”
“थोड़ा घूम आएं। तुम्हारा उखड़ा हुआ मूड ठीक हो जाएगा—और जब रवि हलवाई के समोसे और टुनटुन के गुलाब जामुन खाकर लौटोगी तो तनख्वाह की बात भूल चुकी होगी।”
चिन्ना कुछ ना बोली—हां उठकर जरूर खड़ी हुई।
“मैं चलूंगी तो जरूर किन्तु तुम्हारी खटारा गाड़ी में नहीं, जो सड़क पर चलते हुए यूं आवाज़ किया करती है जैसे हवाई जहाज उतर रहा हो।”
“ठीक—किन्तु अपना पर्स ले लेना—रास्ते में जरूरत पड़ेगी।”
“इसी बूते पर बॉस बनते हो?”
“वो तो हूं ही—और रहूंगा। रहा सवाल बिल चुकाने जैसे छोटे-मोटे काम का तो वो तुम जैसे छोटे-मोटे मुलाजिमों को ही शोभा देते हैं।”
“जेम्स होश में रहो...! वर्ना तुम्हारी मंकी ब्राण्ड शक्ल का फजीता हो जाएगा।”
“यानी कि हूर के साथ लंगूर...! खैर...! आओ चलते हैं।”
और फिर!
दोनों बाहर की ओर बढ़ते चले गए थे।
सुबह-सवेरे का वक्त था।
इससे पहले कि कामकाज शुरू हो, वो अक्सर कुछ दूर तक का चक्कर लगा लिया करता था।
खासतौर पर मुम्बई के बाहर उस क्षेत्र का जो कि समुद्रतटीय था।
ऐसा उस दिन होता था जिस दिन जेम्स को मॉर्निंग वॉक की फुर्सत नहीं मिलती थी।
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admin –
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